!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( प्रीति प्रतिमा की झाँकी – “आवत श्रीवृषभानु दुलारी” )
गतांक से आगे –
श्रीराधा रूप की राशि हैं , सौन्दर्य की अधिष्ठात्री हैं । इनका रूप प्रतिक्षण वर्धमान रहता है और नित नूतन है …नित नूतन होने वाला रूप ही रमणीय होता है ।
निकुँज में विराजमान श्याम सुन्दर अपनी श्रीराधा से कहते रहते हैं …”प्यारी ! मैं जब जब तुम्हारा मुखारविंद देखता हूँ मुझे नया नया लगता है । और ऐसा भ्रम होता है कि अभी प्रथम बार ही आपको देख रहा हूँ “। ये बात नित्य विहार करने वाले श्याम सुन्दर अपनी प्यारी से कहते हैं । ऐसी शोभा का कौन वर्णन कर सकता है ! “मानों प्रिया जी ! आपने करोड़ों चन्द्रमा को अपने आँचल में छिपा रखा है ..जब देखो एक नवीन चन्द्र मुख पर उदित हो आता है “ । ये बात भी श्याम सुन्दर ही कहते हैं । ये है हमारी श्रीराधा का रूप सौन्दर्य ।
इनका नाम है “मदन मोहन” , मदन कामदेव को कहते हैं और मदन को मोहने वाले हैं मदन मोहन । पर ये श्रीराधा तो उन मोहन को भी मोह में डाल देने वाली हैं ….करोड़ों कामदेव जिनका रूप देखकर मूर्छित हो जाते हैं …उस रूप का क्या वर्णन किया जाये ।
मैं साधकों को एक बात यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि श्रीराधा रानी का रूप वर्णन स्थूलता से करने के बाद भी ….रसिकों ने उन्हें स्थूलता से बचा लिया हैं । ये बड़ी सूक्ष्म बात है इन रसिकों की श्रीराधारानी के लिए । श्रीराधा अपनी लगती हैं ….पूरी तरह अपनी लगती हैं ….मानवी लगती हैं ….किन्तु अपनी लगने के बाद भी …वो सर्वेश्वरी हैं ….ये साधकों को अनुभव हो रहा होगा । ये मानवी रूप में चित्रित होने के बाद भी ये आल्हादिनी ही हैं ….ये स्मरण दिलाने की आवश्यकता नही पड़ती कि ये “परात्पर तत्व” हैं….ये अनुभव में आता रहता है …किन्तु फिर भी यही “अपनी” लगती हैं …आपको लगती हैं ? जिस दिन अपनी लगेंगी समझ लो लाड़ली जू ने आपको अपना लिया ।
आवत श्रीवृषभानुदुलारी ।
रूपराशि अति चतुर शिरोमणि , अंग अंग सुकुमारी ।।
प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित , नील वरन तन सारी ।
गूँथित अलक तिलक कृत सुंदरि, सेंदुर माँग सँवारी ।।
मृगज समान नैंन अंजन जुत , रुचिर रेख अनुसारी ।
जटित लवंग ललित नासा पर , दसनावलि कृत कारी ।।
श्रीफल उरज कसूँभी कंचुकि कसि, ऊपर हार छबि न्यारी ।
कृश कटि उदर गम्भीर नाभि पुट , जघन नितंबनि भारी ।।
मनौं मृणाल भूषण भूषित भुज , श्याम अंश पर डारी ।
श्रीहित हरिवंश जुगल करनी गज , बिहरत वन पिय प्यारी ।45 ।
आवति श्रीवृषभानु दुलारी …………….
राधा बाग में आज श्रीहित चौरासी जी का पैंतालीसवाँ पद गूंज उठा था …..संगीत वृंदों ने बड़े उत्साह के साथ वाद्य आदि बजाये थे …वीणा को झंकृत करते हुये गौरांगी ने सुमधुर कण्ठ से इस पद का गायन किया था ।
अब बाबा शान्त भाव से रस निमग्न होकर ध्यान करायेंगे । आप सब भी ध्यान कीजिये ।
!! ध्यान !!
सन्ध्या की वेला अति सुन्दर है , श्रीवृन्दावन प्रमुदित है , हवा शीतल और लताओं को छूने के कारण सुगन्धित भी है ….सूर्य अस्त हो रहे हैं …पक्षियों का कलरव गूंज रहा है श्रीवन में ….कुँज में सखियाँ पहले से आकर बैठी हैं ….सन्ध्या कालीन दर्शन की कामना सबके मन में है …..वो कुँज जहां श्यामा श्याम विराजेंगे वहाँ फूलों के ही झालर से सजाया गया है ….सिंहासन फूलों का है तो छत्र भी फूलों का है …..सखियाँ बैठी हैं …और बड़े प्रेम से श्रीजी के ही नामों का उच्चारण कर रही हैं । कहाँ हैं युगलवर ? प्रश्न किया है हित सखी से अन्य सखियों ने । तो हित सखी ने उत्तर दिया …स्नान करके आरहे हैं । ये सुनकर फिर श्रीजी के नामों का सब उच्चारण करने लगीं ।
सबकी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही है …..सखियों की ही बात नही है पक्षी आदि भी , मृग आदि भी , और इतना ही नही लता आदि भी अपनी श्री लाड़ली को निहारना चाहते हैं ।
तभी श्रृंगार कुँज से श्रीराधा रानी निकलीं ….निकले तो साथ में श्याम सुन्दर भी हैं …पर यहाँ सबकी उत्सुकता श्रीजी को ही देखने में है …महारानी यही हैं इस श्रीवन की । राजा गौण हो जाता है अंतरंग महल में ….ये अंतरंग ही तो है …इसलिए यहाँ महारानी की ही पूँछ है ।
सब सखियाँ खड़ी हो गयीं …और जयघोष करने लगीं …”जय जय श्रीराधे”…..कहकर सब अपने दोनों हाथों को उठाने लगीं …हित सखी सबको कहती है …अब शान्त होकर निहारो इन श्रीवृषभानु दुलारी को …कितनी सुन्दर लग रही हैं ..उतारो इन्हें अपने हृदय में ….सखियों ! ये झाँकी सबको प्राप्त नही है …हमारे ऊपर ही कृपा है कि हम नित्य इन नयनों से इन्हें निहारती हैं ।
सामने से आरही हैं श्रीराधा , पीछे से ललिता सखी छत्र लेकर चल रहीं हैं …रंग देवि सुदेवी चंवर ढुरा रही हैं ….चित्रलेखा और तुंगविद्या आगे आगे पाँवड़े बिछाती हुयी चल रही है ।
तब हित सखी ने इस झाँकी का वर्णन किया –
अरे देखो ! हमारी वृषभानु दुलारी लाड़ली आरही हैं !
हित सखी आनन्द से उछलती हुयी बोली ।
सब सखियाँ हित सखी की बात सुनने के लिए उसके पास आगयीं ….क्यों की नयनों से तो रूप सुधा का पान करेंगे ही पर श्रवण से भी सुनकर उनको हृदय में बसा लेंगे ।
ये लाड़ली अत्यंत कोमल हैं ….
रूप की राशि हैं और चतुर भी हैं ….हित सखी मुस्कुरा के बता रही है ।
आत्मविस्मृत सी हो गयी है हित सखी …..स्नान करके आयीं हैं , पहले तो इनके अंगों में उबटन लगाया होगा …फिर स्नान कराया । साड़ी देखो ना ! कितनी सुन्दर साड़ी है …नीले रंग की साड़ी ….गौर अंग में नीला रंग कितना सुन्दर लग रहा है ना ! अच्छा सखियों ! तुम्हें पता है हमारी लाड़ली को नीला रंग ही क्यों प्रिय है ? सखियाँ हंसती हैं ….सबको पता है फिर भी पूछती हैं …हित सखी ! तू बोलती जा …..हमें आनन्द आरहा है । हित सखी बोली …नील वरण श्याम सुन्दर हैं ना इसलिये ये नीला रंग ओढ़कर मानों अपने में प्रीतम को ही अनुभव करती हैं ।
अलकावलि भी कितनी सुन्दर बनाई है …माँग में सिन्दूर कितनी शोभायमान लग रही है !
हित सखी ये कहते हुये मंत्रमुग्ध है …..वो कभी कभी देह सुध भी भूल रही है …तो साथ की सखियाँ उसे सम्भाल रही हैं ……
मृग जैसे नयनों में काजल कितना सुन्दर लग रहा है …..मोटा काजल लगाया है …और तीखा भी है कानों को छू रही है काजल की रेख । आहा ! ये रूप तो बड़ा ही सुंदर है …सारी सखियाँ बोल उठती हैं । हित सखी फिर आगे कहती है – सुन्दर नासिका में लौंग धारण किया है ….सुन्दर दंत पंक्ति मोतियों की तरह चमक रहे हैं ….क्या सुन्दर रूप माधुरी है ।
और देखो सखी ! श्रीफल जैसे उरोज को लाल रंग की चोली में कैसे कसा है । और उसके ऊपर हारावली ! शोभा अद्वितीय है ये तो । और मेरी लाड़ली का कटि भाग कितना कृश है ….और उदर भाग सूक्ष्म है ….नितम्ब स्थूल है ..और नाभि गम्भीर है ।
हित सखी कुछ देर तक निहारती रहती हैं उस रूप माधुरी को ….फिर कहना प्रारम्भ करती हैं –
आभूषणों से भूषित कोमल भुजाएँ कमल के नाल की तरह हैं ….और उन्हीं कमल नाल रूपी भुजा को अपने प्रीतम के कन्धे पर रखी हुई हैं । और श्याम सुन्दर ने भी अपनी भुजा को प्रिया के ग्रीवा में डाल रखा है ….इन दोनों की जोरी कितनी प्यारी लग रही है ना ! हित सखी को अतिआनन्द के कारण रोमांच हो रहा है …वो सुध बुध भूल रही हैं ।
सखियाँ भी निहार रही हैं इस झाँकी को ….और अपने आपको न्यौछावर कर रही हैं ।
हित सखी इतना ही बोली अंतिम में – ऐसा लग रहा है ….उन्मत्त हाथी अपनी हथनी के साथ वन विहार को निकला हो । इसके बाद हित सखी कुछ बोल न सकी ….वो बस अपलक निहारती रही …बेसुध होती रही …उसे कुछ भान न रहा । यही दशा सबकी थी । पक्षी लता आदि सबकी ।
“सुन्दरता तो इनमें है …कहाँ संसार में खो रहे हो ।”
बाबा भी इतना ही बोले …और मौन हो गये ।
गौरांगी ने अंतिम में फिर इसी पद का गायन किया था ।
आवत श्रीवृषभानु दुलारी ………
आगे की चर्चा अब कल –
