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August 30, 2025 11:00 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( मानिनी श्रीराधा – “ चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर”) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( मानिनी श्रीराधा – “ चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर”) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!

( मानिनी श्रीराधा – “ चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर”)

गतांक से आगे –

ये प्रेम है , ये प्रेम खेल है , यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म है ..यह भाव भूमि पर अधिष्ठित है , इसलिए तर्क को तो यहाँ कोई स्थान ही नही ….प्रेम का ये नित्य विहार अपने में पूर्ण तीव्रता लिए हुए है …जो विलक्षण है । प्रेम का अनुभव सबको होता है …किसी को कम किसी को ज़्यादा । प्रेम में मिले रहने पर भी एक बैचेनी बनी रहती है …ये लौकिक प्रेम में भी दिखाई देता है , यही बैचेनी प्रेम की आत्मा है ….मिल रहे हैं …मिले हुये हैं …देह देह से लिपटा है ..मन मन से उलझा है ..फिर भी लगता है …ये दूर है ….और दूर हो प्रिय , तो चिन्तन ऐसा बनता है कि लगता है वो मेरे पास है ।

प्रेम क्रीड़ा चल रही है …आनन्द उल्लास उमंग की फुहारें छूट रही हैं …पर कब क्या हो जाये कोई पता नही है …बात मात्र इतनी कि श्रीराधा ने अपने आपको ही मणि माला में प्रीतम के हृदय में देख लिया …बस उसी समय लगा कि ये कौन ? ये दूसरी स्त्री कौन ? मैं बाहों में हूँ तो ये इनके हृदय में कैसे ? क्या इसमें कोई तर्क काम देगा ? अजी ! ये प्रेम का विस्तार है ….ये नही होगा तो प्रेम की क्रीड़ा आगे आगे बढ़ेगी कैसे !

नभ में चन्द्रमा है ….श्याम सुन्दर ने अपनी प्रिया को चूमते हुए कहा …तुम्हारा मुख चन्द्र की तरह है …श्रीराधा प्यारी मान कर गयीं …चन्द्रमा में कलंक का धब्बा है क्या मेरे मुख में भी ?

बस मानिनी बन बैठीं श्रीराधा प्यारी ।

एक बार बृजलीला में जब वृषभान दुलारी को मनाने मनाते हार गये श्याम सुन्दर …उदास हताश निराश होकर उठे ..और दूसरे कुँज में जाकर बैठ गये …तब वहाँ ललिता सखी आयीं ….ये उदास हैं …क्या हुआ ? ललिता सखी पास में बैठते पूछने लगीं । माथे में मोतियों की तरह स्वेद बिन्दु छलक रहे हैं । ललिता सखी पोंछ देती हैं और फिर पूछती हैं….लालन ! क्या हुआ ?

तब नेत्र सजल हो उठे श्याम सुन्दर के ….बोले – ललिते ! मैंने उस आदि राक्षस हिरण्याक्ष को मारा जो पृथ्वी को लेकर रसातल में चला गया था …पर कोई श्रम नही हुआ । मैंने जनकपुर में शिव धनुष को तोड़ा …उस शिव धनुष को जिसे बड़े बड़े महावीर नही तोड़ नही पाये थे …पर कोई श्रम नही हुआ । पृथ्वी का सबसे बड़ा राक्षस रावण के दस मस्तक मैंने छेदे …पर उस समय भी कोई श्रम नही हुआ ।

लम्बी साँस लेकर श्याम सुन्दर ललिता से बोले ….जो श्रम इन श्यामा प्यारी को मनाने में हो रहा है ….ऐसा श्रम आज तक नही हुआ ।

ललिता मन्द मुस्कुराके बोली – प्यारे !
ये प्रेम कौ पंथ है …बड़े बड़े सूधे हैं जायें यहाँ । तुम का हौ !

तो साधकों ! ये प्रेम है …ये प्रिया कभी भी मानिनी बनकर बैठ सकती हैं …कारण कुछ नही …बस प्रेम को अपना खेल खेलना है ….इतनी सी बात है ।


राधा बाग में कुछ साधक इन दिनों पड़े ही रहते …आनन्द विभोर होकर वो सब निकुँज की केलि का ध्यान करते हैं …बाबा ने जो कल बताया उस पद को याद कर लेते हैं …पद गाते हैं फिर उसका ध्यान करते हैं ….इस तरह के “रस अभ्यास” से इनकी स्थिति उच्च होती जा रही है ।

ये सब मैं इसलिए लिखता हूँ ताकि आप भी यही करें …चातुर्मास आरम्भ हो चुका है …बना लो यही नियम , चार महीने हम यही “रस ध्यान” करेंगे । एक समय बना लो …उसी समय बैठो …और बस डूब जाओ । ये बात मैं अपने साधकों को कह रहा हूँ …उनको नही जो मात्र रोचकता के लिए मेरे ये लेख पढ़ते हैं ।

कभी कीजिए ध्यान , अभी अभी हमारी स्वामिनी सौंधे जल में नहाकर आयी हैं बैठी हैं …अकेली हैं …उनके अंग से सुगन्ध निकल रहा है ….उस सुगन्ध को अनुभव कीजिये ….तभी श्याम सुन्दर कुँज से आगये ….और पीछे खड़े होकर अपनी प्यारी को निहार रहे हैं ….स्वामिनी अपनें अलकें सुखा रही हैं …..कीजिए ध्यान । याद रखिये जिस दिन सुगन्ध का अनुभव आपको होने लगेगा …बस आपकी रस साधना परिवक्व हो गयी …ये समझ लेना । अस्तु ।

पागल बाबा हमें रस में डुबो रहे हैं …..वो सब कुछ दे रहे हैं …जिसे आज तक रसिकों ने छुपा कर रखा था ..उसे वो सरल सहज बनाकर हमारे सामने परोस रहे हैं बस हमें उसे उठाकर मुँह में रखना है …इतना तो करो ।

“वृन्दावनी सारंग राग” में आज भी पद गायन की बात बाबा ने की …..फूलों से भरा राधा बाग …..इत्र की सुगन्ध से महक रहा था ….गुलाब जल का छिड़काव वातावरण को और रसपूर्ण बना रहा था ।

कलाकार आगये थे ….सारंगी में राग सारंग बज उठा था …मुस्कुराती हुई गौरांगी आयी और आकर वीणा को सम्भाला , बैठी , और उसका गायन प्रारम्भ हुआ …पीछे से सब बोल रहे थे …आज सैंतीसवाँ पद था ,37 । इसका गायन हुआ ।


                  चलहि किन मानिनी कुंज कुटीर ।
तो बिनु कुँवरि कोटि बनिता जुत ,  मथत मदन की पीर ।।

 गदगद स्वर  विरहाकुल पुलकित,  श्रवत विलोचन नीर ।
 क्वासि क्वासि  बृषभान नंदिनी , विलपित विपिन अधीर ।।

   वंशी विशिख व्याल मालावलि ,  पंचानन पिक कीर ।
    मलयज गरल हुतासन मारुत , साखामृग रिपु चीर ।।

    श्रीहित हरिवंश परम कोमल चित , चपल चली पिय तीर ।
    सुनि भयभीत बज्र कौ पंजर ,  सुरत सूर रणवीर । 37 ।

चलहि किन मानिनी कुंज कुटीर …………

जब पद चलता है तब बाबा नेत्रों से अश्रु बहाते रहते हैं …..गौरांगी का पद गायन भाव सिक्त है ….फिर बाबा तो स्वयं भाव रूप ही हैं ….पद के भावों को समझते हुए ये डूब जाते हैं रस में ।

अब ध्यान । कीजिए ध्यान ।


                                   !! ध्यान !! 

सुन्दर कल्पतरु के नीचे श्यामा प्यारी बैठी हैं ….वो कल्प वृक्ष ऊपर से पुष्प बरसा रहा है ….हवा सुन्दर शीतल चल रही है …..तभी यमुना प्रिया जी के श्रम दूर करने के लिए निकट आगयीं …और पद पखारने लगीं ….ललितादि सखियाँ श्रीकिशोरी जी के चरण सेवा करने के लिए निकट जाकर बैठ गयीं हैं ….पर अभी प्रिया जी ने अपने चरण यमुना में ही रखे हैं ….नीली यमुना में गौर चरणों की जो शोभा हो रही है वो विलक्षण है …..कमल भी बहते हुए आते हैं और वहीं रुक जाते हैं …मुस्कुराते हुए प्रिया जी अपने चरणों को थोड़ा थोड़ा हिला भी रही हैं । ललिता सखी ने अब कहा ..थोड़ा चरण दांव दूँ ? पर प्रिया जी ने मना कर दिया ….अभी इन्हें यमुना के शीतल जल में ही चरणों को रखने में आनन्द आरहा है ….तब ललिता प्रिया जी के हाथों को ले लेती हैं और दबाने लगती हैं ….तभी श्याम सुन्दर आगये हैं …प्रिया जी अतिप्रसन्न होकर उठने लगती हैं तब श्याम सुन्दर मुस्कुराते हुए चले जाते हैं …..क्यों गये ? कहाँ गये ? मेरे पास क्यों नही आये ? प्रिया जी देखती रहीं ..प्रीतम पीठ फेरकर चले गये ? बस मुख मण्डल में मान छा गया । मानिनी हो गयीं श्रीराधा । उदासी मुखमण्डल में देखी जा सकती है सखियों के द्वारा । अनमनी सी बैठी हैं …अब तो हाथों को भी दबाने नही दे रहीं । सखियाँ सब समझ रही हैं …..

पर कुछ ही देर में सामने श्याम सुन्दर दीखे ….दूर हैं …उन्होंने दूर से हाथ जोड़कर प्रिया जू से विनय किया कि …इधर आइये । पर श्याम सुन्दर को देखते ही प्रिया जी ने मुँह फेर लिया ।

श्याम सुन्दर का मुख कमल उसी समय कुम्हला गया । और वो वहाँ से चले गये ।

ओह ! श्याम सुन्दर के ऊपर तो वज्राघात ही हो गया था ….वो अब क्या करें ? प्रिया ने उनसे मुँह फेर लिया …अब क्या ? कुँज में जाकर बैठ गये हैं ….हताश निराश , पीताम्बर अच्छी नही लग रही उतार कर फेंक दिया …बाँसुरी फेंट से निकाल रख दी ….नयन अश्रुओं से भर गये ….आह भरने लगे …अब क्या होगा ? प्रिया के बिना मेरा क्या होगा ?

तभी बाहर कुँज में हित सखी आगयी …..हित सखी को श्याम सुन्दर ने देखा …उसे देखते ही श्याम के नेत्रों से अश्रु बह चले …वो अवनी की ओर देखने लगे ….हित सखी समझ गयी कि ये कुँज प्यारे ने अपनी प्यारी के लिए सजाया था इसलिये वो वहाँ से आगये थे ……हित सखी सब कुछ समझकर वो प्रिया जी के पास आयी …..और हाथ जोड़कर बोली –


हे प्यारी सखी ! चलो उस कुंज कुटीर में ….चलो ।

हित सखी की ये बात सुनकर प्रिया जी ने एक बार सखी की ओर देखा फिर मुँह फेर लिया ।

ये देखकर हित सखी फिर बोली – इतना गर्व करना उचित नही है …आपको पता है ..आपके साथ मिलन के लिए श्याम सुन्दर ने कुंज की स्वयं ही सज्जा की है ! वो आकुल व्याकुल हो रहे हैं …वो बिलख रहे हैं …और ये सब देखकर मदन उनको निचोड़ रहा है ….वो आह भर रहे हैं बारम्बार …

क्यों ? मानिनी बनी प्रिया जी ने भृकुटी को बंक करके पूछा ।

इसलिये कि आपका स्पर्श उन्हें नही मिल रहा …और स्पर्श ही क्या आपका दर्शन भी उनको प्राप्त नही हो रहा …वो रो रहे हैं , प्रेम के अश्रुओं से ये अवनी भींग गयी है ।

मेरे दर्शन करने हैं तो आजाएँ …मैं दूर तो नही हूँ ? प्रिया जी ने गम्भीरता के साथ कहा ।

हाँ , वो सामने ही हैं …पर वो इस बात को भी भूल गए हैं कि आप इतने निकट हैं ….वो आह भरते हुए “प्यारी कहाँ हो ! मेरी राधे कहाँ हो ! “ बस यही पुकारे जा रहे हैं । आप प्रेमधर्म की प्रकाशिका हो , आप सब समझती हो चलिए वहाँ । हित सखी भी विलख उठी थी ।

अभी भी नही उठीं प्रिया जी …तो हित सखी बोली …उन्होंने वंशी फेंक दी है …उन्हें वंशी वाण प्रतीत हो रहे है …अपनी माला उतार दी है वो कण्ठ की मालाएँ उन्हें सर्प प्रतीत हो रहे हैं …पक्षी आदि सिंह से लग रहे हैं ये बहने वाली शीतल हवा उन्हें अग्नि सी लग रही है ।

पर क्यों ? प्रिया जी अभी मान को नही त्यागतीं ।

क्यों की आप उनके निकट नही हो , आपके बिना उन्हें सब कुछ व्यर्थ लग रहा है स्वामिनी ! अब आप चलिये ! नही तो …..क्या नही तो ? प्रिया जी अब बिलख उठीं ….वो उठीं ….उनके नेत्रों में प्रेम उतर आया ….हृदय प्रेम से भर गया ….वो भागीं ….वो दौड़ीं ….हित सखी आदि सब पीछे भागे ….कुँज में गयीं …श्याम सुन्दर अवनी में पड़े बिलख रहे थे …हा राधा ! पुकार रहे थे …प्रिया जी ने जाकर सीधे अपने प्यारे का हाथ पकड़ा …आहा ! श्याम सुन्दर को मानों सर्वस्व मिल गया था वो उठे और प्रिया जी ने अपने प्रीतम को बाँहों में भर लिया । दोनों नयन मुँदे मिलते रहे ..प्रिया जी ने अपने हृदय में अपने इस प्यारे को छुपा लिया था ।

सारी सखियाँ इस झाँकी का दर्शन करके आनन्द के अश्रु बहाने लगीं …..

और सब बोल उठीं ……युगल सरकार की ….जय जय जय हो ।


पागल बाबा बारम्बार बोल रहे हैं ….जय हो , जय हो , युगल सरकार की जय हो ।

गौरांगी ने इस पद का गायन नित्य की फिर किया ।

“चलहि किन मानिनी कुंज कुटीर ……..

अब आगे की चर्चा कल –

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