!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( पूर्णपुरुषोत्तम बना ‘श्याम सजनी’ – ‘वन की लीला लालहिं भावै’)
गतांक से आगे –
प्रेम में ही सब कुछ सम्भव है । प्रेम जो कराये कम है । ये प्रेम है – जो प्रिया को प्रीतम बना दे और प्रीतम को प्रिया । प्रेम के वश में जीव हो तो बड़ी बात नही है ….कथा तो तब बनती है जब ब्रह्म वश में हो जाये …और प्रेम जैसा चाहे उसे नचाये और वो नाचे । प्रेम में ही ताकत है कि वो बड़े को छोटा और छोटे को बड़ा कर दे । चमत्कार तो प्रेम दिखाता है । क्या ये चमत्कार नही है …जिसका दर्शन बड़े बड़े योगी नही पा पाते ….जिसकी एक झलक बड़े बड़े ज्ञानियों को प्राप्त नही होती वो ब्रह्म सखियों के पाँव पड़ रहा है कि “मुझे मेरी श्रीराधा से एक बार मिला दो …वो रूठ गयी है …मेरी सहायता करो”। ये परब्रह्म कह रहा है ।
और सुनो प्रेम का चमत्कार –
हे सखी ! मेरी प्रिया मेरी स्वाँस है …चाहे बाएँ चले या दाहिनें यानि चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल वो मेरी प्राण है …मुझे जीवन देने वाली है …मुझे उससे मिला दो , कृपा करो ।
परात्पर ब्रह्म की ये दशा प्रेम ने कर दी है ….आप और क्या चमत्कार देखोगे ?
“आप पत्र लिखो हम श्रीराधारानी को आपका पत्र दे देंगी …सखियों ने भी कह दिया ।
अब श्याम सुन्दर ने पत्र लिखा ..और सखी के हाथों दे दिया, सखी निकुँज के भीतर गयी ….वहाँ श्रीराधा बैठी हुयी हैं ….श्याम सुन्दर ने पत्र दिया है …जैसे ही सुना …श्रीराधा को रोमांच होने लगा ..उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे …आहा ! मेरे प्रीतम का पत्र ! ये प्रेम का चमत्कार ही तो है …कि वो पत्र छूती नही हैं ….सखियाँ कह रही हैं …पत्र तो पकड़िये ! श्रीराधा रानी कहती हैं …मेरे प्रीतम का पत्र है बड़ा ही सुकोमल है ….मेरा अंग उनकी याद में तप रहा है …सखी ! मैंने अपने हाथों से इसे पकड़ा ना तो जल जायेगा , सखियाँ कहती हैं ..हम पकड़ लेती हैं पत्र को आप पढ़ लो …श्रीराधा रानी कहती हैं ….देखूँगी पत्र को तो गल जायेगा ….क्यों अश्रु अभी तक जैसे तैसे रुके हुए हैं ।
तो चलो प्यारे बाहर ही तो बैठे हैं ……सखियों ने कहा ।
श्रीराधा बोलीं – अब चला भी नही जा रहा …उनसे कह कि वो आयें और मुझे अपने हृदय से लगायें तभी देह में चेतना आयेगी ।
सखियाँ बाहर गयीं ….और बोलीं – चलो प्यारे ! अब निकुँज के भीतर चलो ।
श्याम सुन्दर ने कहा – मेरी प्यारी ने क्या कहा ? उन्होंने बुलाया है …सखियाँ बोलीं ।
श्याम सुन्दर को ये सुनते ही हर्षोन्माद होने लगा ….उनका अंग अंग प्रेम रस से भर गया ….अब वो कह रहे हैं …सखी ! मुझ से अब नही चला जा रहा ….उन्हीं को बोल कि वो मेरे पास आयें ।
सखी श्याम सुन्दर की स्थिति देखकर भीतर गयी …तो वहाँ श्रीराधा नही थीं ..सखी बाहर आयी तो यहाँ श्याम सुन्दर नहीं हैं ….सखी भ्रम में पड़ गयी …वो समझ नही पा रही …तभी दोनों सामने से आते हुए सखी को दिखाई दिये …सखी प्रेम के कारण मूर्छित हो गयी ।
ये प्रेम है , ये प्रेम का चमत्कार है ।
समझ नही आयेगा , समझना भी नही है …ये रस है पीना है ।
पागलबाबा भी प्रेम पर बोल रहे हैं ….अजी ! ये प्रेम पर ही बोलते हैं ।
अरी राधा ! तुम्हारे भ्रु-भंग से बेचारे त्रिभुवन सुन्दर श्याम टेढ़े हो गये । तुम्हारे नयनों के अंजन ने उन्हें साँवरा बना दिया । वे पूरा “राधा” नाम नही ले पाते ….’रा’ कहते ही बेसुध हो जाते हैं ..’धा’तो वो बोल ही नही पाते । सखी आगे कहती है – बोल नही पाते क्या ? पूरा “राधा” नाम सुन भी नही पाते …कोई प्रेमी ‘रा’ कहता है ये रा सुनते ही दौड़ पड़ते हैं …और ‘धा’ सुनने के बाद तो उसके आगे दीन हीन बन जाते हैं ….वो उस प्रेमी के पूर्ण वश में ही हो जाते हैं ।
ये प्रेम का चमत्कार नही हैं ? बाबा भी पूछते हैं ।
प्रेम तत्व सर्वोपरि तत्व है …इसलिये इसको कम नही समझना चाहिये …ये ब्रह्म को भी खिलौना बनाने की शक्ति रखता है । ये प्रेम है ।
अब बाबा राधा बाग में आनन्द से विराजे हैं …जल वृष्टि खूब हो रही है इन दिनों …अभी कुछ देर से बंद है …मोर आदि पक्षी खेल रहे हैं …वातावरण दिव्य अद्भुत बन गया है ।
अब गौरांगी से आज का पद गायन करने के लिए बाबा ने कहा । पद का गायन राग वृन्दावनी सारंग में गाया जायेगा ….बाबा ने ही आज्ञा दी । वीणा के साथ सारंगी और बाँसुरी भी थी …और पखावज में पहले सारंगी के साथ जुगलबंदी हुयी …..उससे सब रसिकों को अति सुख मिला …सब राग-रंग में डूब गये ….सबको लग रहा था कि हम निकुँज में ही हैं ।
गौरांगी ने आज श्रीहित चौरासी का सैंतालिसवाँ 47, पद गायन किया । सबने गाया था इस पद को …पहले गौरांगी गाती है …फिर पूरा राधा बाग गाता है । आहा ! रसपूर्ण ऊर्जा का निर्माण वहाँ हो रहा था ।
वन की लीला लालहिं भावै ।
पत्र-प्रसून बीच प्रतिबिंबहि , नख सिख प्रिया जनावै ।।
सकुचि न सकत प्रकट परिरंभन , अलि लंपट दुरि धावै ।
सम्भ्रम देत कुलकि कल कामिनि, रति रण कलह मचावै ।।
उलटी सबै समझि नैंननि में , अंजन रेख बनावै ।
श्रीहित हरिवंश प्रीति रीति बस , सजनी श्याम कहावै ।47।
वन की लीला लालहिं भावै …………
बाबा ने आनन्द से पद का गायन सुना , स्वयं ने गाया भी । अब ध्यान की बारी थी ।
सबने नेत्र बन्द किये ….वाणी जी रख दी थी । बाबा सबको निकुँज लेकर चल दिये थे ।
!! ध्यान !!
सुन्दर श्रीवृन्दावन है , उनकी लताएँ पुष्पों से भरी हुई हैं …लताएँ भी इतनी प्रेममयी हैं कि वृक्षों से लिपट गयी हैं …मोर मोरनी के साथ विहार कर रहे हैं ..हंस हंसिनी जोड़े में जल क्रीड़ा कर रहे हैं …कमल कुमुदिनी दोनों परस्पर जुड़े हुये हैं । सब कुछ इस श्रीवन में प्रेम का शासन ही चल है ।
श्याम सुन्दर अकेले झूमते हुए आरहे हैं ….वनमाला उनकी घुटनों तक लटक रही है …मोर पंख सिर में सुशोभित है …पीताम्बर ओढ़े हुए हैं …..मुखचन्द्र से माधुर्य रस टपक रहा है । ये जब चल रहे हैं तो इनके अंगों से जो सुगन्ध निकल रही है उससे पूरा श्रीवन महक उठा है ।
एक साथ हंसती खिलखिलाती सखियाँ कुंज से निकलीं …..श्याम सुन्दर रुक गये ….वो दूसरे कुंज में जाना चाहते थे …पर सखियाँ इस नवीन कुँज से आरही हैं । इसका मतलब मेरी प्रिया इस कुँज में हैं ।
हाँ , रसिकवर ! आपने ठीक सोचा , आपकी प्रिया इसी कुँज में हैं ! ओह ! मुस्कुराये श्याम सुन्दर और उस कुंज की ओर चल पड़े । ना ! हमारे बिना इस कुंज में मत जाना । पीछे से सभी सखियाँ बोल उठीं थीं । श्याम सुन्दर फिर रुक गए । क्यों ? इसलिये कि इस कुँज की रचना विचित्र है ….हमारे बिना जाओगे तो ………
श्याम सुन्दर ने कुछ सोचा , ठीक है …आगे चलो । सखियाँ श्याम सुन्दर के आगे हो गयीं …और जैसे ही उस कुँज में पहले सखियाँ गयीं और पीछे श्याम सुन्दर गये ….तो वहाँ वो चकित हो गये ….उनके कुछ समझ में नही आया ।
क्यों ? हित सखी से ये प्रश्न किया उनकी सखियों ने ।
तो हित सखी ने उत्तर दिया –
वन , कुंज की लीला लालन को अत्यंत प्रिय है ।
पर सखी ! कुँज में प्रवेश करते ही लालन चकित रह गये …..क्यों की वहाँ के पत्र पुष्प आइना सरीखे थे …..उसमें सबका प्रतिबिम्ब दिखाई देता था …..
तो ? हित सखी से फिर पूछा ।
नही नही , प्रतिबिम्ब में श्रीराधारानी ही दिखाई देती थीं । जैसे – सखियाँ भी हैं पर उनका प्रतिबिम्ब पड़ रहा था उस कुँज के नाना पत्तों में फूलों में …पर उनके स्थान पर श्रीराधा ही दिखाई दे रही हैं…..चारों ओर श्रीराधा ही श्रीराधा । अब तो श्याम सुन्दर चमत्कृत थे….मानों वो शीश महल में ही आगये हों । और इतना ही नही …श्रीराधा को नख से शिख तक वो कुँज प्रकट कर रहा था ….प्रत्यक्ष हजारों श्रीराधा , जितने उस कुँज में लताओं के पत्ते थे उतनी श्रीराधा , जितने पुष्प थे उतनी श्रीराधा । बड़े प्रसन्न हुये श्याम सुन्दर । चारों ओर मेरी ही प्यारी ।
पर अब एक इच्छा जागी कि अपनी प्रिया को आलिंगन करूँ । वो आगे बढ़े …..तो पीछे से सखियाँ बोलीं …”इसको नही” । श्याम सुन्दर रुक गये …पीछे देखा तो सखी थी उसका प्रतिबिम्ब पड़ रहा था पर ये कुँज उसे श्रीराधा ही दिखा रहा था । श्याम सुन्दर फिर कुछ दूर गये वहाँ श्रीराधा को देखा तो उन्हें आलिंगन करने के लिए बढ़े ही थे कि ….”नही नही इसको भी नही”…श्याम सुन्दर फिर रुक गये ….पीछे देखा तो ये दूसरी सखी थी ….वो श्रीराधा दिखाई दे रही थी । अब क्या करें ? श्याम सुन्दर परेशान हो गये …अपनी प्रिया को चारों ओर देखने के बाद भी ये छू नही पा रहे , आलिंगन नही कर पा रहे ! अब उन्होंने ये प्रयास तो छोड़ ही दिया क्यों की समझ गये ….इनमें अधिकतर सखियाँ हैं जो प्रिया दिखाई दे रही हैं और मैंने जाकर किसी को आलिंगन कर लिया तो बड़ी हाँसी होगी । तब श्याम सुन्दर के मन में एक उपाय सूझा …क्यों न एक काम करें ….प्रिया के अंग की सुगन्ध तो मैं समझता हूँ ….तो ? मुस्कुराते हुए श्याम सुन्दर भ्रमर बन गये …और हर पत्र और पुष्प को सूँघने लगे । पर ये सब श्रीराधारानी ही कर रही हैं ….भ्रमर बनकर श्याम सुन्दर जैसे ही उनके पास आते …वो वहाँ से चली जातीं ….इस तरह रति रण “मधुर कलह” श्रीराधा जी और बढ़ाने लगीं ।
इस उपाय ने भी काम नही दिया तो श्याम सुन्दर सोचने लगे ….सखियों को तो प्रिया जू दिखाई दे रही हैं …मुझे ही क्यों नही ? तब उनके मन में एक विचार आया कि ओह ! उनका सखी देह है मेरा पुरुष देह है इसलिये मुझे श्रीराधा रानी दिखाई नही दे रहीं । क्या करें ? हाँ , उपाय सूझा तो सखी की ओर पीछे मुड़े …और बोले ..अपने आँखों का अंजन दे ना ! सखी ने कहा ,ना , ना , ना ।
प्रार्थना करने लगे ….सखी ने कहा ..मेरी आँख का अंजन लगा लोगे तो सजनी बन जाओगे । श्याम सुन्दर बोले …सजनी बनकर ही मुझे मेरी सजनी मिलेगी । नही तो मिलेगी नही ।
सखी को पकड़ कर उसके आँखों से अंजन लेकर श्याम सुन्दर ने जैसे ही अपने आँखों में लगाया ….चमत्कार हो गया , अब श्रीराधा रानी श्याम सुन्दर को दिखाई देने लग गयीं तो दौड़कर श्रीराधिका जू ने ही श्याम सुन्दर को आलिंगन कर लिया । और बहुत हंसीं । सारी सखियाँ हंस रही थीं । श्रीराधा रानी अब श्याम सुन्दर के कपोल में चूमते हुये कह रही थीं ….”श्याम सजनी” । मेरी प्यारी सजनी । उस समय श्याम सुन्दर प्रीति विवश हो कुछ बोल ही नही पा रहे थे ।
हित सखी बोली – ये है प्रीति का चमत्कार । सारी सखियाँ प्रमुदित हो उठी थीं ।
पागलबाबा हंसते जा रहे हैं ….ये है प्रेम देवता का प्रभाव । श्याम सुन्दर, जिसे वेद पूर्णपुरुषोत्तम कहता है …उसे निकुँज में सखियाँ सजनी बना देती हैं । और ये भी इसी में राजी है जी ।
इसके बाद गौरांगी ने फिर इसी पद का नित्य की तरह गायन किया था ।
“वन की लीला लालहिं भावै”
आगे की चर्चा अब कल –
