!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 83 !!
उद्धव द्वारा “गोपीप्रेम” का गान…
भाग 3
उद्धव विचार करते हैं ……….मैने अच्छे अच्छे ऋषियों को देखा है …..मैने अच्छे अच्छे मुनियों के जीवन और उनकी साधना तप सब देखा है ……..पर इन गोपियों को देखता हूँ ……….तो वो ऋषि मुनि इनकी पैर की धूल भी नही लगते ।
स्मरण , ध्यान का भी एक समय होता है…….पर ये कैसी विलक्षण स्थिति है……कि हर समय ….24 घण्टे……बस “प्रिय” की यादें …..बस उसका सुमिरन…….और फिर कुछ पानें के लिये भी नही !
उद्धव जी चकित हो रहे हैं स्वयं गोपी प्रेम पर विचार करते हुये ……
सब कुछ त्यागा अपनें प्रियतम के लिये…………सब कुछ तो महात्मा लोग भी नही त्याग पाते ……….पति को त्यागा , अपनें बच्चों को त्यागा ……उद्धव जी कहते हैं – इन गोपियों नें ….अपनें देह को भी त्यागा ।
हे महर्षि शाण्डिल्य ! देह कहाँ त्यागा है इन्होनें ?
श्रीराधारानी नें देह त्यागा ? वज्रनाभ नें प्रश्न किया ।
महर्षि शाण्डिल्य बोले ………..उद्धव कहते हैं श्रीराधारानी नें एक बार अपनें इस देह को भी त्याग दिया था ………..
ओह ! चौंक गए वज्रनाभ ! आप क्या कह रहे हैं महर्षि !
हाँ वज्रनाभ ! ये सत्य है …….ये कहते हुए उठे महर्षि शाण्डिल्य ।
आज पहली बार श्रीराधाचरित्र सुनाते हुये उठे थे…………….
वक्ता जब उठा तो श्रोता भी उठकर उनके पीछे पीछे चल दिया ।
कालिन्दी के किनारे आये ……..आचमन किया ….प्रणाम किया ।
“कालिन्दी ही श्रीराधा रानी को वापस लेकर आईँ थीं” महर्षि बोले ।
महर्षि ! मैं समझा नही ……वज्रनाभ नें पूछा ।
उद्धव के सामनें घटी घटना है ……..तभी उद्धव कह रहे हैं – देह तक त्यागनें वाली हो आप लोग …….ऐसा त्याग कौन कर सकता है ?
उस दिन श्रीराधारानी चेतना शून्य हो गयीं थीं …….उनका शरीर शीतल हो गया था……प्राण निकल गए , अपनें “प्राणधन” के वियोग में श्रीराधा रानी के प्राण ही निकल गए …..ललिता सखी रोनें लगीं …….रँग देवि सुदेवी मूर्छित ही हो गयीं थीं …..पूरा वृन्दावन रो गया था ।
पर श्रीराधारानी कृष्ण के वियोग में पहुँची सूर्यनारायण के मण्डल में……….वज्रनाभ ! मैं तुम्हे बता ही चुका हूँ ……….कि सूर्य के अवतार हैं वृषभान जी ……जो श्रीराधारानी के पिता बने ।
तो स्वाभाविक था कि अपनें पिता के पास ही जातीं श्रीराधारानी ……वो गयीं ………….पर वहाँ जाकर भी वो रोती ही रहती थीं ।
कालिन्दी यमुना भी पहुँच गयीं सूर्य के पास……क्यों की ये भी सूर्यपुत्री ही हैं…..तब कालिन्दी और पिता सूर्यदेव नें समझाया…..बहुत समझाया ….पर श्रीराधा रानी का विरह शान्त नही हुआ ……अब तो सूर्यनारायण नें विचार किया कि क्या करें ?
तभी अपनी पुत्री श्रीराधा का हाथ पकड़ कर ले गए वैकुण्ठ …….
सूर्यदेव को लगा कि ……भगवान नारायण का दर्शन करके राधा को शान्ति मिलेगी ……..क्यों की नारायण ही कृष्ण हैं ……..ऐसा मन में सोच, ले गए वैकुण्ठ ……..पर ये क्या !
श्रीराधारानी नें नारायण भगवान की ओर देखा भी नही ………….जब सूर्यदेव नें ज्यादा ही कहा …….तब श्रीराधारानी का उत्तर था …..श्याम सुन्दर के बिना ये आँखें अब किसी को नही देखेंगीं ………….
उदास सूर्यदेव अपनें मण्डल में आगये ………तब एकान्त में कालिन्दी नें समझाया था श्रीराधारानी को ……….हे राधिके ! मेरी बात आप मानिये ………चलिये वृन्दावन ! वहीँ हैं श्याम सुन्दर ……….और हमें जब तक उनके इस अवतार काल की लीला पूरी नही हो जाती , प्रतीक्षा करनी ही चाहिये ……..।
बस कालिन्दी की ये बात श्रीराधारानी को अच्छी लगी ……और वो वापस वृन्दावन में आगयीं ।
सखियों में आनन्द छा गया………….
उद्धव जी तो आनन्द के मारे उछल पड़े थे………..
हे वज्रनाभ ! इसीलिये उद्धव कहते हैं……..आप लोगों को तन का भी मोह नही है……..शरीर को भी आप लोग ऐसे त्याग देती हैं ….जैसे कोई वस्त्रों को त्याग कर स्नान करनें चला जाए……….
उद्धव स्तुति ही करते जा रहे हैं श्रीराधारानी की ……..
आपके इन्हीं त्याग के कारण ही पूर्णब्रह्म आपका सेवक बना ……
आपके त्यागमय प्रेम के कारण ही पूर्णब्रह्म आपके सामनें नाचा ।
सब कुछ त्याग कर…..सब कुछ फूँक कर…….आप लोगों नें जो प्रेम की होली खेली है………इससे आस्तित्व भी गदगद् है……..
हे महाभागाओं ! आपके चरणों में ये उद्धव बारम्बार प्रणाम करता है ।
इतना कहकर फिर साष्टांग प्रणाम करनें लगे थे उद्धव जी ।
शेष चरित्र कल –
