*श्रीकृष्णचरितामृतम्* *!! “वन भोज” – एक झाँकी !!* *भाग 1* नभ आज देवताओं से फिर भर गया है ………..देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शची के साथ पहले ही आगये हैं ……….देवता गण अपनें अपनें विमान में बैठे हैं ……….अकेले नही हैं आज ….उनकी अपनी अप्सरायें भी हैं …..जिद्द करके आगयी हैं …..इन्हें आज कन्हैया का “वन भोज” दर्शन करना है …….कल ही कह दिया था कन्हैया नें ………” कल का हमारा भोज वन में ही होगा” , “जय हो”, उछल पड़े थे सब ग्वाल बाल । सब अपनें अपनें घरों से कुछ न कुछ लेकर आना ………..हम कल वृन्दावन में ही आनन्द से भोज करेंगे । कन्हैया की बात ! सब ग्वाल सखाओं नें अपनें अपनें घरों में कहना शुरू कर दिया था शाम को वन से लौटते ही । “तू कल रबड़ी बनाना” एक सखा नें अपनी मैया को कहा ……….कल वन भोज है कन्हैया का ……..तू रबड़ी अच्छा बनाती है कन्हैया को एक बार तेरी बनाई रबड़ी मैने खिलाई थी तो उसे बहुत अच्छा लगा था । “मैया ! तू मठरी बनाना” कन्हैया को प्रिय लगती है मठरी …….कुछ तो नमकीन भी होना चाहिये ना ! मेरी बनाई मठरी कन्हैया को अच्छी लगेगी ? उस सखा की माँ ये पूछती है ……..मैया ! बहुत अच्छी लगेगी कन्हैया को ……तू मठरी बना । “तू बढ़िया खुटी हुयी खीर”………एक नें ये भी कहा । “तू दही भात बनाना” एक सखा नें अपनी माँ से दही भात बनवाई । आज इनको नींद आएगी ? उद्धव आनन्दित होकर बोल रहे हैं । ये सब आज सोयेंगे ही नही ………..इनका चिन्तन, मनन सब कुछ कन्हैया है……..ये जागते समय भी कन्हैया का चिन्तन करते हैं …..और सोते हुए भी कन्हैया ही इन्हें दीखता है ………..ये बड़े बड़े योगियों से भी महान हैं…….इनका चित्त ही बन चुका है कन्हैया । सुबह हुयी , सब आनन्दित होकर उठे …………उनकी माताओं नें वन भोज के लिये जो बनाया था……सब लिया …….स्नान इत्यादि जल्दी जल्दी में किया …..तैयार हुए और चल पड़े नन्द भवन की ओर । क्रमशः….