स्वामी रामकृष्णपरमहँस जी का अलौकिक जीवन🌹: कुसुमा गिरिधर

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🌹 स्वामी रामकृष्णपरमहँस जी का अलौकिक जीवन🌹
🦜 भाग 102 🦜
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श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के आध्यात्मिक वेदान्तिक गुरु श्रीमत तोता पुरी जी का परिचय आरम्भ हुआ कि वे धुनि तपते थे,नङ्गे बदन रहते थे,तन पर एक लँगोटी नहीं थी,किसी के घर नहीं ठहरते थे। भिक्षा में मिले हुए अन्न का पहले अग्निदेव को भोग लगाकर ,तब प्रसाद ग्रहण करते थे। दक्षिणेश्वर में रहते समय तोतापुरी जी पंचवटी के नीचे रहते थे और वहीं उनकी धूनी सदा प्रज्वलित रहती थी। ग्रीष्म ऋतु हो अथवा वर्षा उनकी धूनी सर्वदा जलती रहती थी। उनका खान-पान, चयन-विश्राम, उठना-बैठना सब उसी धूनी के पास होता था। रात्रि हो जाने पर जब थका मांदा सारा संसार अपनई चिंताओं और दुखों को भूलकर विश्राम दायिनी निद्रा देवी की गोद में सुख शांति का अनुभव करने में निमग्न रहता,तब भी तोतापुरी जी उस समय भी उठ कर अपनी धूनी को अधिक प्रज्वलित कर लेते और उसके समीप दृढ़ आसन जमाकर निष्णात निष्कम्प प्रदीप के समान अपने मन को गंभीर समाधि में मगन कर देते। दिन में भी में बहुत सा समय ध्यान-धारणा में बिताते थे। परंतु उनका ध्यान साधारण लोगों की समझ में नहीं आता था क्योंकि वे उस समय वस्त्र से अपने सारे शरीर को ढककर धूनी के समीप लेटे हुए दिखाई देते थे। देखने वाले समझते थे कि तोतापुरी जी अभी तक सो रहे हैं।
एक लोटा एक लंबा चिमटा और एक आसन यही तोतापुरी का सामान था। एक मोटी चादर से अपने शरीर को सदा ढके रहते थे। अपने लौटे और चिमटे को वह प्रतिदिन मांज कर चमकीला बनाए रखते थे। उन्हें रोज अपना बहुत सा समय ध्यान में बिताते देख श्री राम कृष्ण ने स्नेह से एक दिन उनसे पूछा कि आपको तो ब्रह्म ज्ञान हो गया है। आप तो सिद्ध हो चुके हैं। फिर आपको इस तरह प्रतिदिन ध्यान का अभ्यास करने की क्या आवश्यकता है ? 🟠तोतापुरी जी गंभीरतापूर्वक श्री रामकृष्ण की ओर देखते हुए बोले कि देखो ! मेरे इस लौटे की ओर। देखा,यह कैसा चमक रहा है ? और यदि मैं इसे रोज न मांजू तो क्या होगा ? तब क्या यह मैला नहीं हो जाएगा ? मन का भी ठीक यही हाल है। ध्यान अभ्यास द्वारा मन को भी यदि प्रतिदिन इसी प्रकार माँझ धोकर सफाई न करो तो वह भी मलिन हो जाता है। तीक्ष्ण बुद्धि श्री राम कृष्ण ने अपने गुरु का यह उत्तर सुनकर पूछा, परंतु यदि यह लौटा सोने का हो, तो ! तब तो रोज मांजे बिना भी वह स्वच्छ ही रहेगा न ? तोतापुरी हंसते बोले, हां ! यह तो सच है ।ध्यान अभ्यास की आवश्यकता की यह बात श्री रामकृष्ण के मन में सदैव बनी रहती थी और प्रसंगअनुसार में सदा इसका जिक्र किया करते थे।
🔵 वेदांत शास्त्र का कथन है कि ब्रह्म भाव हो जाने पर मनुष्य पूर्ण निर्भय हो जाता है। मैं स्वयं ही नित्य शुद्ध बुद्ध स्वभाव अखंड सच्चिदानंद स्वरूप सर्वव्यापी,अजर अमर आत्मा हूँ। यह प्रत्यक्ष अनुभव हो जाने पर उसके मन में भय ही किसका और कैसे उत्पन्न हो सकता है ? जगत में एक वस्तु के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है।
परमहंस तोतापुरी जी इसी उच्च कोटि के जीवन्मुक्त महापुरुष थे।चालीस वर्ष की कठोरतम साधना के द्वारा उन्हें यह दुर्लभ अवस्था प्राप्त हुई थी।
क्रमशः●●●●●●●●●●●●●●
जय श्री कृष्ण जी।
🙏🌹🙏🇮🇳

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