श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! इति रासपञ्चाध्यायी !!-भाग 1 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! इति रासपञ्चाध्यायी !!

भाग 1

तात ! ये अपूर्व प्रेम लीला थी ……..ये लीला न पहले कभी हुई न होगी ……ये रास था …….रस ही रस का सागर उमड़ कर समस्त को अपनें में डुबो रहा था …..रासेश्वर स्वयं नृत्य में डूबे हुए थे ……..गोपियाँ सुध बुध खोकर बस नृत्य में लीन हो गयीं थीं ……..पसीनें पसीनें हो गए थे गोपियों को ……….उन गौर अंग के पसीनें से सुगन्ध निकल रही थी ………वो वातावरण को और मादक बना रहा था ।

गौरांगी गोपियों का लाल मुख मण्डल ……..आनन्दातिरेक के कारण वो उन्मत्त हो गयी थीं ………..नभ का चन्द्रमा भी स्थिर हो गया था ……वो भूल ही गया कि भास्कर को उदित होना है ………वो तो जड़ वत् हो गया था ………..हँसे ये कहते हुये उद्धव ……….रामावतार में एक मास का दिन बना लिया था भास्कर नें ……तो यहाँ चन्द्रमा नें उसी रामावतार का बदला सूर्य से ले लिया था …….छ महिनें कि रात्रि बना ली ।

रुक गयीं गोपियाँ ……….श्याम सुन्दर वहाँ नही हैं …………कहाँ गए व्याकुल हो उठीं …….तभी देखा – सामनें कालिन्दी के शीतल जल में उतर गए हैं श्याम सुन्दर……..ये देखते ही दौड़ पडीं गोपियाँ ……तात ! ऐसे सब गोपियाँ यमुना कि और बढ़ रही थीं ……जैसे छोटी मोटी नदियाँ सागर में जाकर मिल जाती हैं……….वस्त्र अस्त व्यस्त हैं गोपियों के …..मर्यादा कहाँ यहाँ ! ये तो प्रेम नगरी है …..मर्यादा को छोड़कर ही इस नगरी में प्रवेश मिलता है ।

हजारों गोपियाँ जब यमुना में कूदीं ………..तब कालिन्दी के प्रसन्नता का कोई ठिकाना नही था ……….वो भी बढ़ गयीं …….उसमें भी जल बढ़ गया ……..कलिन्द नन्दिनी नें भी अपनी मर्यादा गोपियों कि तरह तोड़ दी थी ……….।

कमर कमर भर जल में खड़ीं हैं गोपियाँ ……..दूर श्यामसुन्दर हैं …..वो मुस्कुरा रहे हैं …………गोपियाँ उन्हें देख रही हैं …….और वो भी आनन्दित हो हँस रही हैं ।

कैसे पकड़ोगी उस छलिया को ए सखी ! श्रीराधारानी नें पूछा ।

गोपियाँ देखती रहीं, मुस्कुराके देखती रहीं ……….फिर एकाएक दौड़ पडीं यमुना में ही श्यामसुन्दर कि ओर ।

पर श्याम सुन्दर भी जल में दौड़े……..और पास में ही नीलकमल खिले हुए थे उनका झुरमुट था…….सहस्त्रों की संख्या में थे वे नीलकमल ……बस वहीं श्याम सुन्दर चले गए …….और अपनें आपको को उन नीलकमलों में छुपा लिया ।

अब सखियों नें वहाँ पहुँच के देखा ……….कि श्याम सुन्दर कहाँ हैं ?

ये तो नीलकमल है……..एक कमल को उठाकर देखतीं हैं ……..फिर दूसरे कमल को निकाल कर हाथ में लेती हैं ………..ये भी कमल ही है ।

अब गोपियों के समझ में नही आरहा …..कि नीलकमल कहाँ हैं और श्याम सुन्दर कहाँ हैं ? क्यों कि नीलकमल और श्यामसुन्दर का रंग एक ही है …….इसलिये गोपियाँ यहाँ पहचान नही पा रही हैं ।

तभी भौरों का झुण्ड कमलों को छोड़कर श्यामसुन्दर के मुख में मडरानें लगा ………श्याम सुन्दर नें अपनें हाथ निकाले यमुना से …..और जैसे ही भौरों को हटाया …….गोपियों नें पकड़ लिया ………..श्याम सुन्दर को पकड़ कर ले आईँ गोपियाँ …………अब तो सब गोपियों नें मिलकर जल उछालना शुरू किया श्याम सुन्दर के ऊपर ।

श्याम सुन्दर अकेले हैं …….और सब गोपियाँ एक और हो गयीं हैं ।

तभी श्यामसुन्दर जल के भीतर चले गए ………पर ज्यादा देर तक जल के भीतर भी रह नही सके ……..क्यों कि कालिन्दी में जितनी मछलियाँ थीं ……वो सब श्याम सुन्दर के नेत्रों को देखकर सोचनें लगीं ये कौन सी मछली और आगयी हमारे यहाँ …..ये तो हमसे भी अच्छी है ……सब मछलियाँ एकत्रित हो गयीं थीं …..तब श्यामसुन्दर फिर बाहर आगये ।

…….गोपियों नें पकड़ लिया …….और श्रीराधारानी कि नीली चूनरी लेकर बांध दिया……..अद्भुत दृश्य था वो……….चारों और गोपियाँ नाच रही हैं……मध्य में श्याम सुन्दर अपनी प्रिया श्रीराधारानी कि चूनरी से बंधे हुए हैं …….और मुस्कुरा रहे हैं ।

*क्रमशः …

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