श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! आँसू के पनारे – “उद्धव प्रसंग 9” !!
भाग 2
मधुमंगल धरती में गिर गया था …………अब हमारे पास कुछ नही है मथुरा वासियों ! हम तुम्हे क्या दें ।
मैं स्तब्ध रह गया था……..मुझे बारम्बार रोमांच हो रहा था ……कभी कभी मेरी ऐसी स्थिति हो रही थी ……कि मैं भी रोऊँ …..दहाड़ मारकर रोऊँ ……इनके साथ मिलकर रोऊँ ……….नही बनना मुझे मधुवन का ……..मुझे वृन्दावन अपना लग रहा था अब ……….ये क्या हो रहा है मेरे साथ मैं कुछ नही समझ पा रहा था, ओह !
मैं श्रीकृष्ण मित्र उद्धव !
मैने रथ को आगे बढ़ाया ……..और उन ग्वाल सखाओं के पास ले जाकर प्रथम अपना परिचय दिया था ……..मैं श्रीकृष्ण मित्र उद्धव !
अब मुझे लगता है रथ को छोड़ देना चाहिये था……..मुझे तो वहाँ के रज में लोट पोट होते हुए चलना चाहिये था……..उन ग्वाल सखाओं के चरणों को चूमना चाहिये था…….पर ये इतनी शीघ्र कैसे हो जाता …….मेरा अभिमान …..ज्ञान का अभिमान …….देव गुरु बृहस्पति के शिष्य होनें का अभिमान……विद्या मेरे समान किसके पास होगी ……….ऐसा अभिमान ! यही मुझे रोक रहे थे इस प्रेम रस में डूबनें से ।
उन ग्वाल बालों नें मुझे देखा ………..बड़े ध्यान से देखा ……फिर कुछ देर में बोले …….कन्हैया नही आया ?
मैं उनका मित्र हूँ उन्होंने ही मुझे भेजा है ……..मैने कहा ।
“दूत है कन्हैया का” ………मनसुख नें अन्य सखाओं को बताया ।
मैने तो मित्र कहा था …….पर उन्होंने मुझे दूत कह दिया था ।
वो सब सही कह रहे थे…….मैं कहाँ मित्र ? मित्र तो ये लोग थे अपनें कन्हैया के ।
हाँ , अब तो दूत ही भेजेगा कन्हैया ……स्वयं क्यों आनें लगा !
कितनें उदास हताश और निराश हो गए थे वो सब लोग ।
बड़ा हो गया है ना ! सुना है राजा बन गया है ……..बड़े बड़े लोगों के साथ उसका उठना बैठना है…….फिर हम क्या हैं उसके लिये !
वो सखा सब बोल रहे थे……पर मैने उनकी बातों को काटते हुये पूछा –
मैया यशोदा का महल कहाँ है ? बाबा नन्द जी का महल ?
मेरा प्रश्न सुनकर एक दूसरे का मुँह देखनें लगे थे सब ग्वाल बाल ।
ये , मनसुख नें ही मुझे एक बहते पनारे की ओर संकेत से दिखाया ।
इस पानी के पनारे के साथ साथ चले जाओ…….ये पनारा जहाँ से निकल रहा हो ……..बस वही है नन्द महल …….जाओ उद्धव ! मनसुख नें मेरा नाम लेकर मुझे जानें के लिये कहा था ।
पर ………ये पानी क्या है ? ये पानी का पनारा क्या है ? मैने जानना चाहा था ……………..
मनसुख रो दिया मेरी बात सुनकर ………….कुछ देर लगा उसे सहज होनें में ………जब सहज हुआ तब बोला ………”मैया यशोदा के आँसुओं के पनारे हैं ये उद्धव !” वो निरन्तर अपनें लाला को स्मरण करके रोती रहती है …………..उसी आँसुओं के पनारे बह रहे हैं ।
क्या !!!! आँसुओं के पनारे ! मेरी बुद्धि चकरा गयी थी –
उद्धव के मुख से ये प्रसंग सुनते हुये विदुर जी हिलकियों से रो दिए थे ।
शेष चरित्र कल-
