श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! प्रेम की पाती कैसे बांचें – “उद्धव प्रसंग 20” !!
भाग 1
तुम क्यों आये हो उद्धव ! अन्य गोपियों नें मुझ से पूछा था ।
मैं ! मैं तो सन्देश वाहक हूँ ……श्रीकृष्ण नें मुझे अपना दूत बनाकर भेजा है ……उन्होंने आपलोगों के लिये कुछ लिखा है ! और मुझे ये कहकर भेजा कि मेरी गोपियों को ये मेरा सन्देश पहुँचा देना ………….
हमारे प्रियतम नें हमें स्मरण किया ? गोपियाँ आनन्दित हो उठीं ?
क्या वो हमें स्मरण करते हैं ? और उद्धव ! गोपियों नें श्रीराधारानी की ओर दिखाते हुये कहा ……….ये हमारी सर्वस्व हैं …….इनकी दशा देखो ……….उद्धव ! समस्त बृज की दशा बस ऐसी ही है …….गोपियाँ दीन भाव से भर कर बोल रही थीं ।
तात ! श्रीराधारानी मूर्छित थीं ………उनको ललितादि सखियाँ सम्भाल रही थीं…….जब मैं मथुरा से चला था तब श्रीकृष्ण नें कुछ पत्र लिखे थे ………और मेरे हाथों में देते हुए कहा था मेरी गोपियों को दे देना ……
श्रीराधा को ? मैने उनसे पूछा था…….तब वो बस बिलख उठे थे श्रीराधा नाम सुनते ही …….नयनों से अश्रुओं को प्रवाहित करके बस उन्होंनें सिर “ना” में हिलाया था……श्रीराधा को मेरे पत्र की आवश्यकता नही है…….ये स्वयं कमल नयन नें कहा था ।
क्या सन्देश है ? गोपियों नें फिर पूछा ।
मैं उस तरफ दौड़ा जहाँ मैने अभी अधूरी सन्ध्या – गायत्री की थी …..क्यों की श्रीकृष्ण की पाती को मैने वहीं रखा था झोले में ……..मैं लेकर आया …….और सभी गोपियों को देंने लगा ……..सबके नाम से पत्र थे …..चन्द्रावली, ललिता, चित्रलेखा पद्मा सुदेवी इन्दु ……..सबको मैने पत्र दिए ………..”ये श्याम की पाती है” ………सबको कह रही थीं वो ……आनन्द आगया था उनको वो पाती हाथ में लेते ही ।
पर –
कुछ देर बाद रोते हुये वो पाती लौटा रही थीं गोपियाँ ………उद्धव चकित रह गए ……..वापस लौटा रही हो ? अरे ! तुम्हारे प्रियतम नें लिखा है क्यों लौटा रही हो पाती को ?
उद्धव ! अब तुम ही पढ़कर सुनाओ कि इसमें हमारे प्यारे नें क्या लिखा है ! पढ़ो उद्धव ! तुम ही पढ़ो ! गोपियों नें पाती लौटा दी थी ….और उद्धव से ही पढ़नें का आग्रह करनें लगी थीं ।
अरे नही …..किसी के लिये किसी नें पत्र लिखा है ……..और कई बातें प्रेमियों में गुह्य होती ही हैं …….सबको नही बताया जाता ……..मुझे भी तो नही बताया मेरे स्वामी नें …..फिर मैं कैसे पढूँ किसी का पत्र ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल-
