श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! लाला के लाला भयो है – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 32”!!-भाग 1: Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! लाला के लाला भयो है – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 32”!!

भाग 1

जीजी ! प्रणाम !

मैं ठीक ही हूँ ……..आप लोग भी कुशल होंगे ऐसी आशा रखती हूँ ।

जीजी ! आप कहोगी बहुत दिनों के बाद पत्र लिखा तुमनें रोहिणी !

तो क्या बताऊँ जीजी ! अपनें कृष्ण का विवाह ही होता गया …….और मैं व्यस्त होती गयी …….वैसे वृन्दावन को मैं भूली नही …….पर आनें जानें वाला कोई दूत उपलब्ध न हो सका ….क्यों की द्वारिका दूर है ना !

आज हस्तिनापुर के लिये एक दूत भेजा था आर्यपुत्र नें ……तो मैने इसी के हाथों आपको भी पत्र भेज दिया ।

जीजी ! अपनें लाला कन्हैया का विवाह हो गया है ……..पर रुक्मणी के साथ विवाह हुआ ये सूचना तो आपको मैने दे ही दी थी ……किन्तु एक विवाह ही नही ……….उसनें आठ व्याह किये हैं ……….जीजी ! आगे और कितने व्याह करेगा ये तो परमात्मा ही जानें !


आज ही काक नन्दालय के वृक्ष में बैठकर बोला था ……..बेचारी मैया यशोदा आज कल कम सुनती हैं ………मनसुख आज सुबह ही आगया …….इसे भोजन करनें के लिये नन्द जी नें अपने यहाँ बुलाया था ।

ब्राह्मण भी है और अपनें लाला का ये प्रिय सखा भी तो है ………..

खीर पूड़ी, पूड़ी मात्र दो ही खाईं थी इसनें और बस आचमन करनें लगा ।

अरे ! बस दो पूड़ी ? नन्द जी नें और देनी चाही ……पर नही ।

खीर तो ले ! नही बाबा ! दोनें को ही उलटा दिया था ।

तू आज कल कुछ नही खाता ………..वापस दुबला हो गया है देख तो अपनें आपको ! यशोदा मैया नें स्नेह से कहा ।

तो बुला ले ना अपनें लाला को …..वापस मोटा हो जाऊँगा !

ये कहते हुये उठ गया मनसुख…….और हाथ धोनें लगा ।

अब क्या बुलाऊँ ! कुछ समझ में नही आता ………..और मनसुख ! पहले तो हर महिंने पत्र भेजती थी रोहिणी भी …..पर अब तो कई मास हो गए हैं पत्र भी नही आया ………कुशल तो हैं ना सब द्वारिका में !

अरे ! मैया चक्क छन और घुट रही है द्वारिका में तो ……अकाल तो यहाँ पड़ गयो है बृज में ………….अपनें आँसुओं को छुपा लेता है मनसुख …..क्यों की मनसुख रो देगा तो मैया यशोदा की स्थिती तो और भयानक हो उठेगी ……………..

मैया ! ये काक आज ज्यादा ही बोल रहा है है ना ?

हाँ , ये कहते हुये ऊपर वृक्ष में देखा था मैया नें ।

कोई आएगा ! देखना मैया ! अवश्य कोई आएगा !

अब कौन आएगा वृन्दावन में …………मथुरा में भी अपनें लोग हैं नहीं …………द्वारिका बहुत दूर है …………सागर किनारे है ………मैया किंचित् मुस्कुरा देती हैं……….सागर कितनी दूर है मनसुख यहाँ से ?

बहुत दूर है मैया ! मनसुख इतना ही बोलता है ।

तभी – एक रथ रुका ……..उसमें से दो सुन्दर राजपुरुष उतरे ।

मनसुख उठकर खड़ा हो गया ….. …नन्दबाबा गौशाला जा रहे थे वे भी रुक गए ।

महाराज नन्द जी का महल यही है ? ये नये दूत थे ……….मनसुख से ही पूछ रहे थे ।

हाँ , ये रहे हमारे बाबा ! मनसुख नें बाबा की और इंगित किया ।

सिर झुकाकर प्रणाम किया उन दूतों नें ……और पत्र हाथों में देते हुये बोले ……..हम द्वारिका से आये हैं ।

मनसुख ! ये द्वारिका से आये हैं ? यशोदा जी का उन्माद बढ़ चला था …….जो स्वाभाविक ही था ।

हाँ, मनसुख नें कहा ………….और वो ध्यान से सुननें लगा था जो वो लोग नन्द बाबा को कह रहे थे ।

हम हस्तिनापुर के लिये आये थे ……..पर राजमाता रोहिणी जी नें हमें ये पत्र देकर कहा कि हस्तिनापुर के निकट ही है वृन्दावन ……..तो वहाँ अवश्य चले जाना ………और ये पत्र दे दे ना !

धन्यवाद ! नन्दबाबा प्रसन्नता में इतना ही बोले ।

अरे ! कहाँ जा रहे हो ….रुको तो ! मैया यशोदा ऐसे कैसे जानें देती ।

कुछ जलपान कर लो ….नन्दबाबा नें पूछा था ……पर उन्होंने मना कर दिया ………पर मैया तो मैया है ।

सुनो ! कब लौटोगे द्वारिका ?

दूतों नें मुस्कुराकर कहा ……….हस्तिनापुर से होकर आरहे हैं अब द्वारिका ही जा रहे हैं !

तो माखन ले जाओ ………बिगड़ेगा नही …….मैने आज ही निकाला है अपनें हाथों से …………ले जाओ ! मैया उठी ……जैसे तैसे उठी ……वो भीतर गयी …….और माखन को एक मटकी में रख दिया उसको बांध दिया …………ये मेरे लाला को दे देना ! मैया नें भेजा है उसको कहना ………मेरा लाला बहुत खुश होगा !

मैया बोलती गयी ……..दूतों नें कहा ….पर उनके जन्मे तो अभी चार दिन ही हुए हैं ! क्या ! मनसुख हंस पड़ा …….मैया ! तू समझी ?
नही, मैया नें सिर ना में हिलाया ….और वो समझी भी नही थी ।

“अपनें लाला के लाला हुआ है”………और चार दिन ही हुए हैं ।

मैया यशोदा तो ख़ुशी के मारे वहीं नाचनें लगी थी ……..नन्दबाबा के नेत्रों से ख़ुशी के अश्रु बह चले थे ।

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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