Explore

Search

August 30, 2025 6:31 am

लेटेस्ट न्यूज़

કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

Advertisements

श्रीराधाचरितामृतम्” 121-सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”भाग 3 & 122 भाग -1 : Niru Ashra

श्रीराधाचरितामृतम्” 121-सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”भाग 3 & 122 भाग -1 : Niru Ashra

🍃🌲🍃🌲🍃🌲

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 121 !!

सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”
भाग 3

🌲🌲🌲🌲🌲

युगलसरकार की जय …….लाडिली लाल की जय ……..

दोनों “युगलवर” को लेकर अष्ट सखियाँ चल पडीं ।

स्नान कुञ्ज में ………वहाँ स्नान होगा दोनों का ।

ललिता और विशाखा छत्र लेकर चल रही हैं …….चँवर लिया है रंगदेवी सुदेवी नें………बाकी सखियाँ पीछे पीछे सुन्दर गीत गाती हुयी चल रही हैं……….अभी भी उनींदीं हैं इन की आँखें …….सखी ! देख तो नींद अभी भी इन दोनों युगलों की पूरी नही हुयी ।

ये कहते हुए मुस्कुराती हैं सखियाँ…….अर्जुन देख रहे हैं ……और चकित हैं………चारों और सुन्दरता ही बिखरी पड़ी है…….संगीत बीच बीच में बज उठते हैं ……..वीणा , बाँसुरी …मृदंग ….झाँझ…….और बड़ी मादक ध्वनि है इनकी……..कुञ्जों की शोभा देखते ही बनती है……..हाँ अब जो छोटे छोटे सरोवर थे उनमें कमल खिल उठे थे …..पर सूर्योदय होनें में तो अभी समय है …….अर्जुन सोच रहे हैं ।

यहाँ के कमल सूर्योदय से नही खिलते ……यहाँ के कमल तो श्रीराधारानी के मुख चन्द्र को देखकर खिल उठते हैं ।

सखी नें उत्तर दिया था ।

निकुञ्ज के वृक्ष भी कल्पवृक्ष ही हैं …………यहाँ की लताएँ चिन्तामणि के समान हैं……..अर्जुन विचार करते हैं …….पर स्वर्ग के कल्पवृक्ष को मैने देखा है ………..मैं भी क्या क्या कहता हूँ …….कहाँ स्वर्ग का कल्प वृक्ष और कहाँ ये दिव्य निकुञ्ज का वृक्ष ! कोई तुलना ही नही है ।

स्नान कुञ्ज में आये दोऊ !

एक कुञ्ज है …………उसका नाम सखियों नें रखा है – स्नान कुञ्ज ।

बड़ा है कुञ्ज……..भीतर सुन्दर सुन्दर चित्रावली की गयीं हैं ।

दो हौद हैं……..उसमें जल भरा है ……स्वच्छ और निर्मल जल ।

हाँ एक हौद में गर्म जल है ……..दूसरे में शीतल जल है ……….

इत्र डाल देती हैं उस जल में ललिता सखी……जल सुगन्धित हो उठा ।

उस कुञ्ज के मध्य में एक झींना सा परदा डाला गया ………….

ताकि ये दोनों एक दूसरे को न देख सकें ……….।

सखियाँ हँसीं …….जोर से तालियाँ बजाकर हँसीं …….

अर्जुन का ध्यान कहीं ओर था ……….जब तालियाँ बजीं और सखियाँ हँसीं, तब अर्जुन को लगा….. क्या हुआ ?

सखी नें समझाया ……..इन दोनों को स्नान करानें के लिये हल्का पर्दा जो किया …….बस इतनें में ही ये श्याम सुन्दर बेचैन हो उठे ।

पर क्यों ? अर्जुन नें पूछा ।

आल्हादिनी से एक क्षण का वियोग भी कल्पों के समान विरह का दुःख दे जाता है हमारे श्याम सुन्दर को …………ये दोनों मिले हैं ……युगों युगों से मिले हैं …………पर इन्हें लगता है …….अभी तो अच्छे से देखा भी नही है ।

अर्जुन आनन्दित हो उठे थे , निकुञ्ज की इन लीलाओं का दर्शन करते हुए………

आहा ! नीला रँग है श्याम सुन्दर के देह का …………….वस्त्र उतार दिए हैं सखियों नें श्याम सुन्दर के ……….श्याम सुन्दर की सखियाँ हैं – विशाखा , सुदेवी, चित्रा, इन्दुलेखा , इनकी भी सखियाँ हैं …..।

उबटन लगा देती हैं श्याम सुन्दर के शरीर में…….कितना कोमल है इनका देह सखी ! आहा ! थोडा धीरे उबटन लगाओ नही तो कष्ट होगा इनको …..ये तो बहुत कोमल हैं ।

“सखी ! जल्दी कर ना ………..कितनी देर हो गयी है …अपनी प्रिया को मैने देखा भी नही है”……..आहा ! श्याम सुन्दर की मधुर वाणी ।

और हाँ , इतना कहकर परदा हटानें लगे श्याम सुन्दर तो सखियों नें मना कर दिया ।

इधर श्रीराधिका जी……..इनकी सखियाँ हैं रंगदेवी, ललिता, तुंगविद्या, हरिप्रिया……

इनकी भी अपनी अपनी सखियाँ हैं ।

गौर वर्णी हैं श्रीराधा ……..पर ऐसा गौर वर्ण …..जैसा सुवर्ण को तपाया गया हो ……….सुन्दर घुँघराले केश ………..सखियों नें उन केशों को खोल दिया है …………..उबटन शरीर में लगानें लगीं ……….

केशों में सुगन्धित खली लगाई ……………केशर और चन्दन प्रिया जी के मुख पर लगाया ……और हल्के कोमल करों से मलते हुए, जल प्रक्षालन के द्वारा उसे धोया ………..पहले शीतल जल के द्वारा उबटन छुड़ाया ……फिर गर्म जल द्वारा स्नान कराया ………।

श्याम सुन्दर का भी स्नान हुआ ………………

पर उचक उचक कर देखनें का प्रयास कर रहे हैं ………..श्याम सुन्दर श्रीराधा को देखनें के लिये तड़फ़ उठे हैं ।

सुन्दर अंगोछा से श्याम सुन्दर का देह पोंछा सखियों नें ।

इधर प्रिया जी का भी दिव्य देह सखियों नें पोंछा ।

इत्र फुलेल देह पर लगा दिए सखियों नें ………….सुन्दर घुँघराले केशों को फैला दिया …….आहा ! क्या शोभा बन गयी है श्याम सुन्दर की ।

पीली धोती ………..पीली पीताम्बरी श्याम सुन्दर को पहनाई ।

नीली साडी ……….नीला चादर प्रिया जी को धारण कराया ।

बस ……….परदा हटा दिया , सब सखियों नें …………

अब आमनें सामनें केवल युगल सरकार हैं …………श्याम सुन्दर देख रहे हैं अपनी प्यारी को …….और श्रीराधा अपलक निहार रही हैं अपनें प्यारे को ……………..कुछ ही देर तो लगी होगी स्नान में ……पर इतनें में ही ये बेचैन हो उठे थे ।

दोनों दौड़े ………और एक दूसरे को हृदय से लगा लिया ।

जयजयकार हो उठा …..सखियाँ झूम उठीं ।

निकुञ्ज गा उठा ………………..

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।

चलो अब …..श्रृंगार कुञ्ज में ……..जहाँ अब इन दोनों का श्रृंगार होगा ।

ललिता सखी नें कहा ……..और युगल वर को लेकर सखियाँ श्रृंगार कुञ्ज की ओर चल पड़ी थीं ।

शेष चरित्र कल –

🌸 राधे राधे🌸
[12/25, 7:05 PM] Niru Ashra: 🍃🍃🍃🍃🍃🍃

“श्रीराधाचरितामृतम्” 122 !!

जय जय नित्यविहार
भाग 1

🌲🌲🌲🌲🌲

इन “युग्मतत्व” के नित्य विहार को समझनें के लिये …….

गहन चिन्तन ……सत्वगुण का होना ….और अन्तरंग साधना की अतिआवश्यकता ………ये तीन वस्तुएँ होनी आवश्यक हैं तभी ये “नित्यविहार” रहस्य समझ में आएगा ।

इस नित्य विहार की नायिका हैं ……..श्रीराधारानी ।

त्याग – विराग अनुराग की मूर्ति हैं – श्रीराधारानी ।

कला की उत्स, काव्य की अधिष्टात्री, कारुण्य तारुण्य की जीती जागती छवि….भक्ति और अनुरक्ति की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति हैं – श्रीराधारानी ।

ज्ञेय, गेय, ध्येय, साध्या, एवम् आराध्या, साधना और आराधना की परिणति का नाम है – श्रीराधारानी ।

एक पवित्रतम , सुकुमार और मिश्री की डली सी मीठी – श्रीराधारानी ।

एक अनुभूति, एक माधुरी, और आस्तित्व के मूक संगीत का नाम है – श्रीराधारानी ।

वो श्रीराधारानी – जिसे उपनिषदों से लेकर लोक गाथाओं में भी स्थान मिला …..यन्त्र , मन्त्र , तन्त्र के किस ग्रन्थ में श्रीराधा नही है ?

उपनिषदों से लेकर प्राकृत साहित्यों की भी नायिका रहीं श्रीराधा एक रहस्य ही हैं……..वैष्णव धर्म द्वारा सेवित, तन्त्र की सर्वेश्वरी, पूर्ण रमणीयता को प्राप्त श्रीराधारानी , धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण कर …..दार्शनिक एवम् अध्यात्म क्षेत्र को भी पार कर ……परम व्योम से भी परे …….अकल्पनीय अलौकिक दिव्य परात्पर वैकुण्ठ से भी परे ……निकुञ्ज धाम……दिव्य श्रीवृन्दावन धाम में आप विराजती हैं ।

भगवती त्रिपुरा सुन्दरी आपकी सेवा में ललिता सखी के रूप में सदैव हैं ।

अवतार काल में आप बृषभान जी नामक गोप के यहाँ बरसानें में जन्म लेती हैं …………पर आपके साथ साथ आपकी जो भी शक्तियाँ हैं ……विभूतियाँ हैं सब अवतार लेकर पहुँचती हैं ।

पूर्व में बताया जा चुका है कि …….ललिता सखी ही त्रिपुरा सुन्दरी हैं ।

“वासुदेव रहस्य” नामक ग्रन्थ में लिखा है कि ……अवतार लेनें के बाद कृष्ण नें भी त्रिपुर सुन्दरी की उपासना की ……….तब जाकर श्रीराधा रानी कृष्ण को मिलीं थीं ………ऐसे ही समस्त सखियाँ अवतार काल की वेला में पृथ्वी में अवतरित हुयीं थीं श्रीराधा रानी के साथ ।

साधकों ! अवतारकाल में संयोग है ….वियोग है ….मिलन है , विछुड़न है ………..वृन्दावन से मथुरा जाना है कृष्ण को ….और फिर द्वारिका ।

पर ये लीला अवतार काल की है ……………अवतार कार्य पूरा होनें के बाद ……..निकुञ्ज लीला फिर प्रारम्भ हो जाती है ।

वो बन्द हुयी ही नही थी………ये नित्य विहार है……..जो निकुञ्ज में चलती ही रहती ……अबाध गति से ।

हाँ एक बात और समझनें की है ……………

निकुञ्ज में जो सखियाँ हैं – कुछ सखियाँ मुक्त जीव हैं ……..जिन्हें मुक्ति प्राप्त थी…..पर मुक्ति स्वीकार नही की……..प्रेम की तड़फ़ जागी ईश्वर के प्रति …….यही प्रेम विकसित होता गया ……..तो निकुञ्ज की सखी बन गयीं ……..कोई कोई ऋषि हैं …….जिन्होनें हजारों वर्ष तप करके ……….”क्लीं” नामक प्रेम बीज को सिद्ध करके ……….प्रेम लोक निकुञ्ज की प्राप्ति की ………….ऐसी कई बातें और उदाहरण हमारे पुराणों में और तन्त्र के ग्रन्थों में भरे पड़े हैं …..।

कई सखियाँ ऐसी भी हैं…………अर्जुन की तरह ………जो कुछ समय के लिये ही आयी हैं निकुञ्ज में……..कृपावश उन्हें निकुञ्ज का दर्शन लाभ प्राप्त हो रहा है ……….बस ।

“कृष्णयामल तन्त्र” में एक अद्भुत बात लिखी है ………..उसका उल्लेख भी यहाँ देना ठीक होगा –

त्रिकोण है ……….श्रीराधा कृष्ण और ललिता …..ये त्रिकोण हैं ।

अब षट्कोण का दिव्य वर्णन है – वृन्दा सखी, रंगदेवी , चित्रा, हरिप्रिया, तुंगविद्या, विमला ।

“राधे कृष्ण राधे श्याम” ……….ये चार नाम और आठ अक्षर ही अष्ट सखियाँ हैं ………….अष्टकोण अष्टसखियों से ही बनता है ………और मध्य में श्रीराधमाधव विराजमान हैं ।

वैसे युगलमन्त्र में जो सोलह अक्षर हैं …………..उनका चिन्तन भी इसी प्रकार करना चाहिये ………..।

साधकों ! ये सब गम्भीर बातें मैं लिख नही रहा था ……..मैं तो मात्र श्रीराधारानी के चरित्रों को गाकर अपना अन्तःकरण पवित्र बना रहा था …….पर मुझ से चार दिन पहले एक आर्यसमाजी बन्धु भिड़ गए ……कहनें लगे – श्रीराधा का कोई इतिहास नही हैं इसलिये हम नही मानते श्रीराधा को …………

मैं हँसा ……..मैने आपको कहा नही है कि आप श्रीराधा को मानें ।

रूचि है आपकी ……..मानों या ना मानों । मेरा उत्तर था ।

पर श्रीराधा का प्रमाण कहाँ है ? मात्र सात सौ या कुछ और वर्ष पहले गीत गोविन्द जैसे काव्य में ? या हिन्दी साहित्य की नायिका के रूप में ? वेद में कहाँ ? उपनिषद् में कहाँ हैं श्रीराधा ?

“राधोपनिषद है” ………….श्रीराधा जी के नाम का उपनिषद् है ………..अगर समझ न आये तो ……..श्रीराम शर्मा जी के द्वारा व्याख्या की हुयी “राधोपनिषद” पढ़ लेना …..मैने पढ़ी है ।

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

🍁 राधे राधे🍁

admin
Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

Leave a Comment

Advertisement
Advertisements
लाइव क्रिकेट स्कोर
कोरोना अपडेट
पंचांग
Advertisements