श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्ण सुदामा का हास परिहास” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 65!!
भाग 2
मैं द्वारिकानाथ की इक्यावनवी धर्मपत्नी , सुदामा अब इतना थक गए हैं की “सौभाग्यवती भवः” भी पूरा नही बोला जा रहा । बस अब तो भवः , भवः ही कहते हैं ।
मैं द्वारिकानाथ की पाँचसौवीं धर्मपत्नी , सुदामा के पसीने आ गए हैं । उन्हें अब घबराहट होने लगी है ।
अब तो बस श्रीकृष्ण पत्नियाँ अपना परिचय दे रही हैं , सुदामा सुन रहे हैं बस , कोई आशीर्वाद नही , पंक्ति खतम होने का नाम ही नही ले रही । आती जा रही हैं श्रीकृष्णपत्नियाँ, बस आती ही जा रही हैं ।
अब तो सुदामा से रहा नही गया , श्रीकृष्ण को इशारे से कहा इधर आ , श्रीकृष्ण ने भी हंसते हुए इशारे से ही कहा आशीर्वाद दो ।
थक गया हूँ यार ! श्रीकृष्ण से सुदामा ने ये बात भी इशारे में ही बोली थी ।
श्रीकृष्ण सुदामा के निकट आए ।
कान ला ! सुदामा ने कहा । श्रीकृष्ण ने अपने कान सुदामा के निकट किया ।
अभी और कितनी लम्बी कतार है ? सुदामा धीरे से बोले ।
श्रीकृष्ण खूब हंसे , अभी तो एक सहस्र ही हुये हैं सुदामा ।
“सब अपनी हैं” सुदामा धीरे से फिर पूछते हैं ।
और क्या सुदामा ! श्रीकृष्ण गम्भीर होने का स्वाँग करते हुए बोले ।
नही , मैं सोच रहा था कि………सुदामा चुप हो गए । वैसे कितनी हैं ? सुदामा फिर पूछते हैं ।
कौन तुम्हारी भाभी ?
नही , भाभी कहाँ , भाभियाँ , सुदामा ये कहते हुए खिलखिला उठे , वो अपनी हंसी रोक न पाए ।
सोलह हजार एक सौ आठ , श्रीकृष्ण ने भी सहजता के साथ उत्तर दिया ।
“अड़ोस पड़ोस की तो नही हैं “। क्या सुदामा ?
नही , कुछ नही । सुदामा बोले देख यार ! मैं थक गया हूँ , अब मेरा हाथ उठ ही नही रहा , थक गया हूँ ना ।
कोई बात नही सुदामा ! बस चरण छुवा लो । सोलह हजार मेरे पाँव छुएँगे ? सुदामा ने कहा भाई ! घिस जाएँगे मेरे पाँव तो । और मैं तब तक बैठ भी तो नही सकता ना ।
श्रीकृष्ण विनोद का कोई प्रसंग आज छोड़ना नही चाहते , और सखा से विनोद नही तो फिर किससे करेंगे ।
देखो सुदामा ! मेरी इन रानियों को तो देखो , तुम्हारा आशीर्वाद पाने के लिए ये कितनी लालायित हैं , तुम्हें कृपण नही होना चाहिए , खुल कर दो आशीर्वाद । श्रीकृष्ण मन ही मन हंसते हुए सुदामा को बोले थे ।
लम्बी साँस ली सुदामा ने , क्या करें अब श्रीकृष्ण भी तो नही मान रहा ।
तभी , सुदामा को एक उपाय सूझा ,
कृष्ण ! ज़ोर से नाम पुकारा था ।
हाँ , श्रीकृष्ण सुदामा से पूछने लगे , रानियाँ जहाँ खड़ी थीं वहीं खड़ी हो गयीं ।
सुनो कृष्ण ! शास्त्र में नियम है कि पति को अगर आशीर्वाद दे दिया जाए तो पत्नियों को भी प्राप्त हो जाता है ।
तो ? श्रीकृष्ण ने पूछा ।
तो ये , कहते हुए सिंहासन से सुदामा उठे और अपने पाँवों में श्रीकृष्ण को झुकाते हुए बोले ,
“चिरायुरस्तु”। मेरे मित्र ! तुझे लम्बी आयु मिले , मेरी आयु तुम्हें लग जाए ।
ये कहते हुए सुदामा ने श्रीकृष्ण के मस्तक में अपने हाथ रख दिए थे ।
कृष्ण ! अब मेरी सभी भाभियों को भी आशीर्वाद मिल गया , श्रीकृष्ण से हंसते हुए सुदामा ने कहा ….तो श्रीकृष्ण सजल नयन से बोले , तुम्हें मित्र के रूप में पाकर ये द्वारिकाधीश भी आज धन्य हो गया है । श्रीकृष्ण गदगद हैं ।
शेष चरित्र कल-


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