!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 64 !!
हंसदूतम्
भाग 3,
हे मथुराधीश ! आपके बाबा नन्द के बारे में तो मैं क्या कहूँ ।
गम्भीरता ओढ़ ली है उन्होंने……..समाज के सामनें गम्भीर बने रहते हैं ………..कोई कुछ कहता है आपके बारे में ……तो ज्ञान सुना देते हैं ….कौन किसका है ? ये जगत बिछुड़नें के लिये है !
पर अकेले में रोते हैं …..बहुत रोते हैं ……..और जब कोई उन्हें पकड़ लेता रोते हुए ……..तो कहते हैं आँखों में कुछ पड़ गया था ।
रात रात में अज्ञात से बातें करते हैं………”कैसे लाता मैं उसे यहाँ वृन्दावन ……….क्या इन लाठियों से उन जरासन्ध जैसे आतंककारी का हम सामना कर पाते ?……..और हमारी बात नही है ……हम तो मर भी जाएँ ….पर कृष्ण को हम कैसे बचाते ……पूरा बृज मुझ बूढ़े को ही दोष देता है …..कि मैं क्यों नही लाया कन्हाई को यहाँ !
इतना ही नही……हे गोविन्द ! गोप ग्वालों की दशा तो और विचित्र हो गयी है……वो तो रात रात भर सोते नही हैं ……..कब सुबह हो …कब सुबह हो …..और सुबह होते ही…..चल देते हैं मथुरा की ओर ।
साँझ तक, कभी कभी रात में भी खड़े रहते हैं मथुरा की सीमा में ……
आया ! वो धूल उड़ रही है ….शायद उसका रथ आया ……..आज तो आएगा ही…….मैं कह रहा हूँ ।
“आज नही आएगा”
एक ग्वाले नें क्या बोल दिया……”आज नही आएगा”…….बस सब लोग उसे पीटनें लगे….क्यों अशुभ अशुभ बोलता है……वो आएगा…..वो आएगा……ऐसे ही ग्वाल बाल अपना समय बिता रहे हैं ।
इतना कहकर हंस चुप हो गया था ………अश्रुओं से कपोल भींग गए थे कृष्ण के …………हिलकियाँ चल ही रही थीं ।
हंस ! और मेरी राधा ? इतना ही पूछ सके थे ।
श्रीराधा ! ओह ! उनके बारे में मैं क्या कहूँ ?
“कृष्ण” कहते ही उन्हें उन्माद चढ़ जाता है……वो मूर्छित हो जाती हैं ……….हे कृष्ण ! जब अकेले में मूर्छित हो जाती हैं वन में, तब तो स्थिति और विचित्र हो जाती है …………….
सखियाँ उनके पास हैं नहीं ………और अकेले में उन्माद के कारण मूर्छित हो गयी हैं ………उस समय हिरणियाँ सब दौड़ पड़ती हैं ……और अपना घेरा बना लेती हैं ………..अपनी जीभ से चाटकर उठाती हैं श्रीराधा रानी को ।
ओह ! कितनी भाग्यशालिनी हैं वृन्दावन की हिरणियाँ ……
कृष्ण रोते हुए कहते हैं ।
नही नही …….कुछ नही ….बस कृष्ण !……..श्रीराधा रानी अब केवल तुम्हे ही पहचानती हैं ……………
मोरकुटी जाती हैं…….गहवर वन में बैठती हैं……..साँकरी खोर में खड़ी रहती हैं ………पर आप नही आते तो फिर रोना शुरू कर देती हैं ………आश्चर्य ! श्रीराधा ही नही रोतीं …….पूरा बरसाना रोनें लग जाता है………वृक्ष पक्षी सब साथ देते हैं …….सब रोते हैं ।
जब से आप आये हो वृन्दावन से…….तब से श्रीराधा नें कुछ खाया नही है….हाँ तुम्हारी कसम देकर कोई खिला दे तो खा लेती हैं…..पर ।
हे कृष्ण ! कीर्तिरानी और बृषभान जी बहुत दुःखी रहते हैं …..स्वाभाविक है अपनी लाडिली की ऐसी स्थिति देख कौन दुःखी नही होगा………….
श्रीदामा भैया वो भी समझाते हैं सम्भालते हैं अपनी बहन श्रीराधा को…पर – भैया ! क्या कहा था तुमसे उन्होंने ? उफ़ ! ये प्रश्न हजारों बार कर चुकीं है फिर भी………राधा ! वो आएगा ….उसनें कहा था …….वो आएगा …….फिर क्यों नहीं आये ? कितना समय तो हो गया है ……….श्रीदामा कुछ नही कह पाते ।
हे कृष्ण ! मैं जा रहा हूँ ………मैं वृन्दावन में ही रहूंगा ……….मेरा इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा कि ……श्रीराधा के चरण रज की प्राप्ति मुझे होगी …….मैं आपके उन दिव्य सखाओं के साथ खेलता रहूंगा ………रोता रहूंगा आपकी सखियों के साथ ………….मैया यशोदा मुझे माखन देगीं …….मैं धन्य हो जाऊँगा …….।
कृष्ण नें हंस को चूमा……उस प्यारे से हंस को अपनें हृदय से लगाया…..अपनें गले से मोतियों की माला उतार कर उसे पहना दी ।
मैं जा रहा हूँ…..पर फिर ..हंस रुका……मैं एक बात पूछना चाहता था –
क्या पूछो हंस ! …..कृष्ण नें कहा ।
आपनें क्यों ऐसी दिव्य प्रेम की भूमि छोड़ दी ?
इतनें प्रेमीजन क्यों छोड़ दिए ?
कृष्ण इसका क्या उत्तर देते हंस को ।
पर यहाँ मथुरा में कुछ नही है………काम हो गया है आपका, कंस मर गया है ……अब चलो वृन्दावन ………नही नही, आपके लिये यहाँ कोई रोनें धोनें वाला नही है …………आप यहाँ से चले भी जाओगे तो मथुरावासियों को कोई दिक्कत नही होगी ……पर आप वृन्दावन चले आओगे ना ……तो बेचारे गोप, गोपी मैया, बाबा, श्रीराधा रानी सबके प्राण वापस आजायेंगे……..मुझे जो कहना था मैने कह दिया ….मैं अब जा रहा हूँ वृन्दावन ………वो हंस उड़ चला ……
कृष्ण देखते रहे उस प्यारे से हंस को …..और अश्रु बहाते रहे ।
शेष चरित्र कल –


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877