!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( ओह ! प्रीति न काहु की कानि बिचारै )
गतांक से आगे –
जो मर्यादा को मानें वो प्रेम ही क्या ? प्रेम तो मर्यादा के प्रति एक विद्रोह है । वो नही मानता तुम्हारे शास्त्रों को , वो नही मानता तुम्हारे वेदों को ….तुम्हारे कुल की कानि से उसे क्या मतलब ….वो तो अलमस्त प्रेमी है …प्रेम ही उसका धर्म है …प्रेम का मार्ग ही उसके लिए सर्व श्रेष्ठ है ….प्रीतम ही उसका इष्ट है …सत्य एक मात्र उसका प्रीतम ही तो है बाकी सब मिथ्या है झूठ है । यही ज्ञान उसके लिये मान्य है …बाकी सब बेकार है उसके लिए । तुम्हारे तीर्थ उस प्रेमी के लिए निरर्थक हैं ….उसका सबसे तीर्थ है प्रीतम की गली …उससे बड़ा तीर्थ और क्या हो सकता है !
प्रीतम का नाम ही उसके लिए सबसे बड़ा मंत्र है ….जल आचमन अश्रु हैं …उन्हीं अश्रुओं को बहाकर मानों वो आचमन करता है …फिर प्रीतम का नाम जाप करता है …साँसों की माला है …हृदय में प्रीतम छवि को निहारते हुए वो प्रेमयोगी साधना में लीन हो जाता है ।
ओह !
आज वर्षा हुई …अच्छी वर्षा हुई ….राधा बाग में मोर नृत्य कर उठे थे …पक्षियों का कलरव कितना मधुर लग रहा था …अवनी से रज की भीनीं सुगन्ध उठ रही थी …वृक्ष लता सबके पल्लव धुल कर साफ हो गए थे वो सब चमक रहे थे । अभी भी काले काले बादल हैं …आकाश में बदरा बने ही हुए हैं …ये फिर बरस सकते हैं । दो तीन तोते बाबा के पास आकर अपनीं चोंच में पानी भरकर पी रहे हैं…उसके बाद एक मोर भी आया है ….वो भी पानी पीने लगा है ….वर्षा के कारण गड्डों में जल भर गया उसको ही ये पी रहे हैं । कुछ पक्षी खेल रहे हैं ….छोटी छोटी गौरैया फुदकती कितनी अच्छी लग रही हैं । बाबा ये सब देख रहे हैं और मग्न हैं । बाबा इन्हीं को श्रीवृन्दावन की असल शोभा बताते हैं । ये रसोपासना में हमारे सहायक हैं …ये अपने हैं …आज का महत्वाकांक्षा में जलता मनुष्य रसोपासना में बाधक है …जो निरन्तर “मैं ये करूँगा , मैं वो करूँगा “, इत्यादि कामना में जलता रहता है …संकल्प विकल्प में फँसा है ….वो प्रेमी नही होता …इसलिए इस प्रेम मार्ग के लिए वो उपयुक्त नही है ….बाबा बोले …अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति का संग इस प्रेम मार्ग के साधक को सर्वथा त्याग देना चाहिए ।
अब समय हो रहा था ….तो बाबा ने गौरांगी से कहा …..चलो गायन प्रारम्भ किया जाये ।
लोग आगये हैं ….अपने साथ प्लास्टिक की पन्नी लाये हैं …उसको बिछाकर बैठ गये हैं ….बाबा सबको प्रणाम करते हैं …पखावज सारंगी वाले भी आये हैं …बाबा उनके लिए व्यवस्था बनवा देते हैं …ताकि वर्षा हो तो उनके वाद्य और कलाकार न भीगें ।
गौरांगी ने वीणा सम्भाल ली है …और गायन अब प्रारम्भ होने वाला है …श्रीहित चौरासी का बयालीसवाँ पद है ….गौरांगी का मधुर कण्ठ और चौरासी जी के पद …रस बरस पड़ा था ।
प्रीति न काहु की कानि बिचारै ।
मारग अपमारग विथकित मन , को अनुसरत निवारै ।।
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत , सनमुख सिंधु सिधारै ।
ज्यौं नादहि मन दियैं कुरंगनि , प्रकट पारिधि मारै ।।
श्रीहित हरिवंश हिलग सारंग ज्यौं, सलभ सरीरहि जारै ।
नाइक निपुन नवल मोहन बिनु , कौन अपनपौ हारै ।42 !
प्रीति न काहु की कानि बिचारै ………
बाबा हंसते हुए कहते हैं …ये प्रेम है …कानि कहते हैं मर्यादा को ….इसकी अपनी मर्यादा होती है …ये प्रेम तुम्हारी मर्यादाओं को नही मानता ।
इतना बोलकर बाबा ध्यान कराते हैं …और जब ये कहते हैं कि – चलो ध्यान करते हैं …तब आज ये बहुत हंसते हैं …..मेरा ये ध्यान भी तुम्हारे तथाकथित ध्यान का विद्रोह है ….ध्यान की जो मर्यादा होती है उसे हमने तोड़ दिया है ….क्यों की ध्यान से पहले प्राणायाम किया जाता है ..किन्तु हमारा प्राणायाम तो – “राधा” कहकर आह भर लेते हैं …”स्वामिनी” कहकर लम्बी साँस ले लेते हैं …“किशोरी” कहकर रो देते हैं …यही हमारा प्राणायाम है …और ध्यान कैसा है ये तुम लोग देख ही रहे हो ….ये प्रेम का ध्यान है …ये रस का ध्यान है – अब चलो निकुंज ।
!! ध्यान !!
सुन्दर श्रीवृन्दावन में सुन्दर सखियाँ बैठी हैं …तट यमुना का है …..स्वच्छ निर्मल जल यमुना में बह रहा है …सखियाँ प्रेममद से भरी हैं ….लता वृक्ष झूम रहे हैं …उसमें मदमाते पक्षी बैठे हुए हैं वो सब कलरव कर रहे हैं ….मोर सखियों के ही निकट घूम रहे हैं …मृग के बालक उछल रहे हैं …हंस हंसिनी जल में विहार कर रहे हैं । चारों ओर की शोभा तो सुन्दर है ही …पर यमुना के तट पर बैठी ये प्रेमरस माती सखियाँ बड़ी ही सुन्दर लग रही हैं ….इन हजारों सखियों का एक सा रूप , वस्त्र आभूषण एक से ….पीछे से नागिन सी लहराती वेणी एक सी ।
मध्याह्न की वेला है …हित सखी उन सहस्त्रों सखियों के मध्य बैठी रसमग्न है ….अभी अभी इसने प्रीति की रीति कौन जानता है ये बताया …”रंगीले श्याम सुन्दर ही प्रीति की रीति को जानते हैं”….ये कहते कहते ये रस में डूब गयी है ।
“प्रीति की मर्यादा क्या है सखी” ?
ये सुमधुर आवाज यमुना तट पर गूंजी ….इतनी मधुर आवाज़ किसी सखी की हो नही सकती ।
सखियों ने तुरन्त कुँज की ओर देखा ….सखियों ने ही नही …पक्षियों ने भी …मृग शावक और मृगों ने भी …हंस और हंसिनी ने भी …सब स्तब्ध हो गये थे….आवाज ही इतनी मधुर थी …मानों निकुंज में वीणा झंकृत हो उठी हो ।
ओह ! स्वामिनी श्रीराधारानी जाग गयीं थीं पर लाल जी नही जागे थे ….किन्तु वो लेटी ही थीं …अपने कपोल में हाथ रखकर वो सब देख-सुन रही थीं सखियों की ओर मुड़कर । बड़े ध्यान से “प्रीति की रीति” हित सखी के मुख से सुनकर ये गदगद हो रही थीं ….आहा , वो गौर वदनी कितनी सुन्दर लग रही थीं ।
बोल , हित सजनी ! बोल प्रीति की मर्यादा क्या है ? प्रिया जी ने फिर पूछा था ।
ये सुनकर हित सखी बोली …..प्यारी जू ! प्रीति किसी मर्यादा को नही मानती ।
क्या ! खुल कर हँसीं थीं श्रीराधिका जी ……
हाँ , प्यारी जू ! प्रीति अगर मर्यादा में है तो वो प्रीति ही कहाँ रही ?
हित सखी के मुख से ये सुनते ही श्रीजी इतनी आनंदित हो गयीं कि उठ कर बैठ गयीं …और बोलीं …प्रेम का मार्ग गलत हो तो ? हित सखी बोली …प्यारी जू ! सही गलत से परे चला जाता है प्रेमी ….चाहे सही हो चाहे गलत हो …उसे अब कोई नही रोक सकता है , न कोई उसे किसी मर्यादा में बांध सकता है …वो तो उन्मत्त हो गया , वो तो चल पड़ा पूरे बेग से …किसी में हिम्मत नही है उसके बेग को रोकने की । श्रीराधिका जी और आनंदित हो उठीं …दोनों हाथों को अपने कपोल में रखते हुये बोलीं …जैसे ?
जैसे – प्यारी जू ! सावन मास की उछलती उफनती नदी के बेग को कोई समुद्र मिलन से रोक सकता है ? वो तो दौड़ रही है ..भाग रही है अपने प्रियतम सागर से मिलने ..कौन रोके उसे ..सब तोड़ कर भाग रही है …मार्ग में आने वाले पहाड़-पर्वत सबको तोड़ती हुये चली जाती है और अपने प्यारे से मिल लेती है …कोई रोक सकता है ?
हित सखी की बात सुनकर श्रीजी इतनी प्रसन्न हुईं कि वो उठ गयीं …और धीरे धीरे सखियों के पास आने लगीं …सखियाँ आनन्द से भर गयीं थीं ….वो सब उठना चाहती हैं …पर श्रीजी उन्हें बैठे रहने के लिए कहती हैं ….आरही हैं श्रीजी ….हित सखी की ओर ही देखती हुयी आ रही हैं ……हित सखी ! और और उदाहरण दे ना ?
हित सखी भी उठ गयी …अब तो बस हिता और श्रीजी मात्र खड़ी हैं ….
प्यारी जू ! हिरण संगीत को सुनकर दौड़ पड़ता है ..”संगीत का नाद” उससे उसकी प्रीति है ….उसे कौन रोक सका है ..वो मर जाता है …बाणों से वो शिकारी उसे मार देता है …पर वो हिरण रुकता नही है …मर जाना स्वीकार है पर प्रीति से मुँह मोड़ना स्वीकार नही । हित सखी कहती है ।
पास में आगयीं हैं किशोरी जी ….और ? हित सखी के कन्धे में हाथ रखकर पूछती हैं ।
और प्यारी जू ! वो पागल पतंगा , दीपक जहां देखता है ….वहीं दौड़ पड़ता है …कौन मर्यादा उसे रोक सकी है ! किसकी बात उसने सुनी है ! वो तो प्रीति करता है दीपक से …जल जाता है …मर जाता है …पर रुकता नही है …ना वो रुकेगा । सजल नयन श्रीराधा से कहती है हित सखी ।
कोई मर्यादा प्रीति को बांध नही सकी है …इसलिए प्रीति किसी मर्यादा को मानती नही है ।
किशोरी जी हित सखी से अति प्रेमपूर्ण कहती हैं – और ? एक अन्तिम सबसे सुंदर उदाहरण !
हित सखी बैठ जाती है चरणों में और कहती है ….प्यारी जू ! सबसे बड़ा उदाहरण तो आपके नवल नागर मोहन हैं …ऐसे निपुण प्रेमी और कौन होगा ….कौन होगा जो प्रीति में अपने को हार जाये …अपना अभिमान – स्वाभिमान खो दे …प्रीति की वेदी में बलिदान हो जाये ….हे प्यारी जू ! आपके रसिक मोहन ही हैं ….जो प्रीति के लिए सब कुछ न्यौछावर करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं । हित सखी के मुख से इतना सुनते ही श्रीराधिका जू ने उसे उठा लिया और अपने हृदय से लगा लिया ….सखियाँ जयजयकार कर उठीं ।
प्रीति प्रतिमा श्रीराधिका नवल किशोरी जू की जय जय जय ।
रसिक रसीलौ छैल छबीलौ नवल किशोर जू की जय जय जय ।
बाबा बोले …प्रीति की कोई मर्यादा नही है ….वो तो मर्यादा को तोड़कर आगे बहती है ।
गौरांगी ने अंतिम में फिर इसी पद का गायन किया –
“प्रीति न काहु की कानि बिचारै …..”
आगे की चर्चा अब कल –


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