!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( नित नवीन नेह – “नयौ नेह नव रंग नयौ रस” )
गतांक से आगे –
प्रेम तत्व ही निकुँज का अधिष्ठाता है । प्रेम तत्व एक है …फिर वही एक खेलने के लिए दो बन जाता है …फिर वही दो लीला को पूर्णता नही दे पाता तो अनेक रूपों में भासित हो उठता है ।
पर वो तत्व फिर अपने स्व स्वरूप की ओर बढ़ना चाहता है ..जो उसका रूप है अद्वैत । इसलिए वो तड़फ उठता है – एक होने के लिए । प्रेम में जब दो से एक होने की चाह बढ़ जाती है …तब उसमें तरंगे जो उठती हैं ….वो सब नव नूतन ही होती हैं । और ये तो प्रेम का प्राकृतिक गुण ही है ना , कि -“दो से एक होने की चाह” । ये नित्य विहार, उस प्रेम की आत्म क्रीड़ा ही तो है ।
राधा बाग में शाश्वत जब प्रश्न करता है इस श्रीहित चौरासी जी के चौवनवे पद को लेकर कि – बाबा ! “निकुँज विहार में सब कुछ नित नूतन होता है”…इसका अर्थ समझ में नही आया ? पागल बाबा बोले – क्या समझ में नही आया ?
शाश्वत पूछता है – क्या श्रीकृष्ण अभी जो थे वो दूसरे ही क्षण बदल जाते हैं …या दूसरे श्रीकृष्ण दूसरी श्रीराधा या दूसरा श्रीवृन्दावन ! नित नूतन का अर्थ क्या है ?
बाबा ने बड़े प्रेम से समझाया – शाश्वत ! वो रस ब्रह्म है …ये तो वेदोक्ति ही है ना ? तो उसी रस की ये केलि है ….वही रस , कृष्ण आदि सब बनते हैं ….पर प्रेम की ऊँची अवस्था में ….एक अवस्था ऐसी होती है …जहां प्रेमी अत्यन्त विवश हो जाता है ….और उस विवशावस्था को आत्मविस्मृति तुम कह सकते हो। प्रेम में जब अपने आपको भूल जाता है प्रेमी …और फिर चैतन्यावस्था में आने पर पिछली कुछ भी स्मृति शेष नही रह जाती ….तब जो होता है …वो नया नया नूतन होता है । बाबा ने बड़े ही प्रेम से समझाया ।
गौरांगी आनंदित हो उठी …उसने भी पूछा …क्या ये दशा श्याम सुन्दर की होती रहती है ?
बाबा बोले …क्षण क्षण में होती है …..वो निहारते हैं अपनी प्रिया को …बस उसी समय हो गए “प्रेम विवश” , भूल गए अपने आपको भी …और जब प्रिया जी अपने अधर रस को पिलाती हैं ….तब उन्हें चैतन्यावस्था की प्राप्ति होती है …बाबा स्पष्ट करते हैं …पिछली बात सब भूल गये हैं ….तब वो फिर अपनी प्रिया को देखकर चमत्कृत हो उठते हैं ….और कहते हैं …ऐसा रूप ऐसा सौन्दर्य तो कभी देखा नही ….कभी सुना नही । “राधे ! तेरो रूप नित नवीन सौं लागै”….बाबा कहते हैं – अनन्त काल से देख रहे हैं …फिर भी । ये सब प्रेमतत्व का चमत्कार है …और प्रेम तत्व भी यही हैं । शाश्वत को स्पष्ट हो गया था ।
बाबा आनंदित होकर गवैयाओं से राग मल्हार गाने के लिए कहते हैं …वो सब भी अपने वाद्यों को खोल लेते हैं ….और गायन आरम्भ हो जाता है ….पखावज की थाप अद्भुत है …और उसमें सारंगी की जुगलबंदी और फिर मध्य मध्य में आलाप …वर्षा भी हो रही है …बिजली भी कड़क रही है ….बड़ा ही सुंदर सुखद वातावरण हो गया है । इसके बाद गौरांगी को आज के पद गायन के लिए बाबा कहते हैं …..गौरांगी मधुर आवाज़ में चौवनवें पद को अति आनन्द से गाती है ।
नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल श्याम वृषभान किशोरी ।
नव पीताम्बर नवल चूँनरी , नई नई बूँदनि भींजति गोरी ।।
नव वृन्दावन हरित मनोहर , नव चातक बोलत मोर मोरी ।
नव मुरली जु मलार नई गति , श्रवण सुनत आये घन घोरी ।।
नव भूषन नव मुकुट विराजत , नई नई उरप लेत थोरी थोरी ।
श्रीहित हरिवंश असीस देत मुख, चिरजीवौ भूतल यह जोरी ।54।
नयौ नेह नव रंग नयौ रस , नवल श्याम वृषभानु किशोरी ……………
बाबा तो रस में भींज ही गए थे ..दिव्य अद्भुत रस रंग बरस पड़ा था राधा बाग में आज ।
अब ध्यान ……….
!! ध्यान !!
सुन्दर हरीतिमा लिए श्रीवृन्दावन है …..उस श्रीवन में एक अद्भुत फुलवारी है …उस फुलवारी में अनेकानेक फूल खिले हुए हैं ….वहाँ की अवनी पन्ना आदि छोटे छोटे मणियों के टुकड़ों से बनी हुयी है ….उसकी शोभा अलग ही लगती है …..उसके मध्य में जल के फुब्बारे चल रहे हैं …वो फुब्बारे भी नाना रंगों को छोड़ते हुये से दिव्य लग रहे हैं । अब सामने एक सिंहासन है …वो सिंहासन पुष्पों का बना हुआ है …उसमें छत्र भी पुष्पों का ही है । तभी नभ से छोटी छोटी बूँदे बरसने लगीं …उसके कारण श्रीवन और सुगंधित हो उठा । अब उसी समय युगल सरकार वहाँ पधारे हैं ….पीताम्बर धारण किए हैं श्याम सुन्दर ने …..और नीलांबर धारण किया है श्यामा प्यारी ने , मुकुट श्याम सुन्दर और चंद्रिका श्रीराधा रानी ने । दोनों विराजे सिंहासन में । अष्ट सखियाँ सब सेवा में जुट गयी हैं …..कोई चँवर ढुरा रही हैं …तो कोई फूलों का पंखा कर रही हैं । कोई चरण में बैठ गयी है …तो कोई बीरी पान दे रहे है । सामने एक रास मंडप है …वो चौकोर है ….सुवर्ण की अवनी है रासमण्डप की …..सखियाँ मन्द मन्द संगीत बजाने लगी हैं ….नभ से बूँदे पड़ रही हैं तो मल्हार राग को बजाना इन सबने आरम्भ किया ।
तभी सामने रास मण्डप देखकर श्याम सुन्दर की इच्छा हुयी की नृत्य किया जाये …..श्याम सुन्दर ने धीरे से अपनी प्यारी के कानों में कहा …..आप की इच्छा हो तो रास में चलें ? मुस्कुराती हैं श्रीराधा और कहती हैं …चलो प्यारे । और दोनों जब नृत्य करने के लिए उस सुवर्ण के मण्डप में उतरते हैं …..तब तो सखियाँ और आह्लादित होकर जयजयकार करने लग जाती हैं ।
नृत्य आरम्भ हुआ है …तभी वर्षा तेज हो जाती है …अद्भुत ! ताल के साथ बूँदें बरस रही हैं ।
दोनों भींग रहे हैं …और नृत्य में मत्तता छा गयी है …लय ताल में दोनों के पाँव थिरक रहे हैं ….वर्षा हो रही है ….वर्षा के कारण श्रीजी और श्याम सुन्दर पूरे भींग गए हैं …गौर अंग से नीला वस्त्र चिपक गया है …ऐसा लग रहा है मानौं श्याम सुन्दर ही श्रीजी के अंग से लग गए हैं ।
श्याम सुन्दर देखते हैं …अपनी प्यारी का श्रीअंग और उसमें नीला वस्त्र देख कर ये सब कुछ भूल जाते हैं …अपने आपको भी भूल जाते हैं ….सब कुछ भुला दिया है श्रीजी के रूप सौन्दर्य ने ।
ये दशा देखकर प्रिया जी पास में जाती हैं और अपने अधर रस को पिलाती हैं ….चमत्कार ! श्याम सुन्दर को होश आजाता है …पर वो सब कुछ भूल गए हैं …..अब जो देख रहे हैं …वो सब नया नया नया है ……फिर नृत्य , फिर श्रीजी के सुन्दरतम , कोमलतम श्रीअंगों का दर्शन …फिर आत्मविस्मृति ….आहा ! विवश अवस्था को प्राप्त हो गए …प्रिया जी फिर पास में आती हैं …श्याम लाल जू के कपोलों को छूती हैं ..इनको फिर चैतन्यावस्था की प्राप्ति हो जाती है ..किन्तु भूल गए हैं सब कुछ ,अब जो देखते हैं फिर नया ,फिर नया ,हर पल हर क्षण नया-नया ।
हित सखी इस लीला को देख रही है …..और वो अपनी सखियों को बताती है ।
आहा !
आज तो हमारी नित्य किशोरी और नित्य किशोर दोनों ही रूप लावण्य से भरे पूरे लग रहे हैं ।
इन दोनों का प्रेम नया है …देखो तो ! और आज का रस-रंग भी नया है । हित सखी भी आज मत्त हो गयी है …पीताम्बर लाल जू का नया है सखी ! और चूनरी भी हमारी प्रिया जू की नई है ।
आनन्द की अतिरेकता के कारण हंसती है ये हित सखी …और जो बूँदे पड़ रही हैं चूनरी में वो बूँदे भी नई नई हैं ।
हित सखी के आह्लाद ने आज सीमा पार कर लिया है ……
इस श्रीवृन्दावन को देख रही हो ! ये कितना सरस और मनोरम है ….ये भी नया नया है ….वर्षा ऋतु के कारण कितनी हरियाली छा गयी है ना ! हित सखी कहती है ये हरियाली भी नई नई है ।
श्रीवन के मोर बोल रहे हैं …..ये मोर भी नये नये हैं ….कोकिल और चातक आदि भी नये नये …और इनकी बोली भी नई नई है ….आहा ! हित सखी के आनन्द का पारावार नही है ।
तभी नाचते नाचते श्याम सुन्दर रुक जाते हैं …अपनी फेंट से बाँसुरी निकालते हैं …..
सखी ! ये बाँसुरी भी नई है …..हित सखी बोल उठती है ……
बाँसुरी की ध्वनि पूरे श्रीवन में फैल जाती है ….सखी ! ये ध्वनि भी नई है । हमने आज से पहले नही सुनी थी ऐसी बाँसुरी ! हित सखी कहती है ।
मल्हार बजा रहे हैं ….मल्हार की नवीन गति बजा रहे हैं …..देख ! आकाश में काले काले बादल छा गए हैं ….ये बादल भी नये नये हैं ।
हित सखी कहती है – आज तो मोर मुकुट और प्रिया जी ने जो चंद्रिका धारण की है वो कितनी सुन्दर लग रही है ना ! ये नई है । मुकुट और चंद्रिका नई है । ये नृत्य कर रहे हैं …ऐसा नृत्य इस निकुँज ने आज तक नही देखा था …ये नृत्य भी नया है । दोनों प्यारे प्यारी कितने सुन्दर लग रहे हैं ….अपनी छाती में हाथ रखकर कहती है हित सखी ! आहा ! इन दोनों को मैं क्या दूँ ! मेरे पास ऐसा क्या है जो मैं इन्हें दे दूँ ! हित सखी परेशान हो उठती है …क्या न्यौछावर करूँ ? जब उसे कुछ नही मिलता तो वो अपने दोनों हाथों को उठाकर आशीर्वाद दे देती है …कि मेरे लाड़ली लाल आप ऐसे ही रस केलि अनन्त काल तक करते रहो ।
प्रिया प्रियतम दोनों अब मिल गये हैं । रसोन्मत्त पूरा श्रीवृन्दावन ही हो उठा है ।
नवीन नवीन , नया नया तो हित सखी को भी दिखाई दे रहा है …आपने कहा था कि श्याम सुन्दर को विवशावस्था ( आत्मविस्मृति ) और फिर चैतन्य अवस्था में आने के कारण ऐसा लगता है ?
शाश्वत ने अन्तिम में ये प्रश्न किया ।
बाबा बोले – मैंने ये भी तो कहा कि यहाँ सब कुछ रस तत्व ही है …रस ही कृष्ण, रस ही श्रीराधा , रस ही सखी रस ही श्रीवृन्दावन …..सबकी यही दशा है जी ! क्यों की सब रस तत्व ही हैं ….बाबा की ये बात सुनकर शाश्वत को पूर्ण समाधान मिल गया था ।
गौरांगी ने अब फिर इसी पद का गायन किया ।
“नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल श्याम वृषभान किशोरी”
आगे की चर्चा अब कल –


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