!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 69 !!
बृज के बिरही लोग बेचारे…
भाग 2
किस बात की क्षमा ? अरे ! हमें छोड़कर चला गया ……..हमें आँसू दे गया ……..हम पागल हैं ……जो यहाँ बैठे बैठे रोते रहते हैं ……कि अब आएगा ……अब आएगा ……आज आएगा …..कल आएगा …….
मनसुख बोला …….तुम जाओ …..मिलो उस कन्हाई से ……पर मैं नही मिलूँगा ………..मुझे वो मनायेगा ………मुझे वो …………
रथ पास में आगया था………..”क्या नन्दमहल इधर ही है ?
उद्धव नें ग्वाल बालों से इतना ही पूछा था ।
सब लोग देख रहे हैं………अपलक देख रहे हैं उद्धव को ।
मनसुख क्रन्दन कर उठा – नही आया वो निष्ठुर ।
तुम कैसे कह सकते हो ……………..श्रीदामा नें पूछा ।
आया होता ना …….तो अभी तक रथ में नही बैठा रहता ………वो कूदकर उतरता दूर से ही……..और हम लोगों को अपनें गले से लगा लेता……….नही आया ! आज भी नही आया ।
हमारा कन्हाई नही आया ? मधुमंगल नें डरते हुए पूछा ।
डरते हुए इसलिये वज्रनाभ ! कहीं नही आया तो ?
पर बड़े निर्मम स्वर से उद्धव नें कह दिया – “नही आये”……
बस इतना सुनते ही ……….वो खिले हुए चेहरे मुरझा गए थे …….
यही ग्वाल बाल जो रथ को देखकर उछल रहे थे ……….वही दुर्बल अतिदुर्बल लगनें लगे थे ………..
यही ग्वाल बाल जो बढ़ चढ़ कर बोले जा रहे थे ………….अब वही बोल भी नही पा रहे थे ।
नही आया ? ओह ! रोना, सुबकना , ये तो सामान्य बात है …………….जड़वत् हो गए थे कुछ देर के लिये ।
तुम कौन हो ? ये भी बड़ी मुश्किल से पूछ पाये थे ।
मैं कृष्ण दूत उद्धव !
……उद्धव नें अपनें आपको “कृष्ण दूत” कहकर परिचय दिया ।
मनसुख हँसा ……..ये हँसी दुःख के अति होनें पर आती है ।
अच्छा ! हमारा कन्हाई अब दूत भेजनें लगा ………देखो ! हमारे कन्हाई का ये दूत है ………….
क्यों ? तुम्हे क्यों भेजा है यहाँ उसनें …….मनसुख बोले जा रहा है ।
अब तो हमारे पास कुछ नही है तुम लोगों को देनें के लिये
हे मथुरा वासी !……….हमारी निधि तो कन्हाई ही था जिसे तुम ले जा चुके हो……..अब क्यों आये हो ?
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –


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