!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( जब प्रिया जू जीतीं – “आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं” )
गतांक से आगे –
जीतनी ही थीं प्रिया जू , जीत गयीं । नभ की घटा में चमकने वाली दामिनी से ये दामिनी कैसे हार जाये ! नभ की दामिनी तो श्याम घटा में चमककर खो जाती है …..पर ये श्याम घटा में जब चमकती है तो श्याम घटा इसमें खो जाता है । नभ की दामिनी घटा को विचलित नही कर पाती …पर ये दामिनी श्याम घटा को पूरी तरह से विचलित कर देती हैं ।
होड़ ही नही है इन दोनों दामिनी में …….
राधा बाग में रस में भींजें हैं इन दिनों पागलबाबा । वर्षा के कारण हरियाली बढ़ गयी है ….मोरछली के नन्हें नन्हें पुष्प मादक सुगन्ध फैला रहे हैं …..मोर यहीं पड़े रहते हैं ….बादल छा जाते हैं …तो ये नाचने लगते हैं ..बोलने लगते हैं ..पक्षियों की चहक से बाग गूंजता रहता है ।
बाबा ने आज कोई भूमिका नही बनाई , वो सीधे हमें निकुँज रस में ही ले जाना चाहते हैं ….वो बाहरी विषय बोलने के मूड में भी आज नही लगते । इसलिए उन्होंने गौरांगी को पहले ही “श्रीहित चौरासी जी” का पचपनवाँ पद गायन करने के लिए कहा ।
रसिक जन रस पीने के लिए पहले से ही आकर बैठे हुए हैं …वर्षा ज़्यादा है इसलिये अब वाद्यों का लाया जाना कठिन हो रहा है …क्यों कि कितना भी तिरपाल लगाओ …वर्षा की कुछ बूँदे तो पड़ेंगी ही ….फिर वाद्य बिगड़ जायेंगे …इसलिए बाबा ने बोल दिया ….कल से आप लोग पधारिये ….गायन कीजिये …पर सारंगी आदि तारों का वाद्य न लायें । पखावज है …..वर्षा के पानी से उसकी सुरक्षा शाश्वत करता है ……वीणा के स्थान पर सुर पेटी का प्रयोग किया गया …हाँ , बाँसुरी को बाबा ने लाने के लिए कहा ….बाँसुरी वाला भी आया था ।
राग कौन सा ? बाबा बोले …वही मल्हार । मल्हार में आलाप लेना आरम्भ किया गवैयायों ने …पखावज और सुर पेटी के साथ । बाँसुरी भी बाद में बज उठी थी ।
गौरांगी ने अब , आज के पचपनवें पद का गायन किया ।
आजु दोउ दामिनी मिलि बहसीं ।
बिच लै श्याम घटा अति नौतन , ताके रंग रसी ।।
एक चमकि चहुँ ओर सखी री , अपने सुभाय लसी ।
आई एक सरस गहनी में , दुहूँ भुज बीच बसी ।।
अंबुज नील उभै विधु राजत , तिनकी चलनि खसी ।
श्रीहित हरिवंश लोभ भेंटन मन , पूरन शरद शशि । 55 ।
आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं ……….
बाबा कहते हैं ये ध्यान करो । ये ध्यान करके इस रस में डूब जाओ ।
फिर बाबा इस पद का ध्यान कराते हैं ।
सबने वाणी जी रख दी है और अपने अपने नेत्र मूँद लिए हैं ।
!! ध्यान !!
ये कुँज ही वर्षा ऋतु का है , वर्षा का पूरा आनंद इस कुँज में ही आता है ।
घनघन बादल गरजते हैं , दामिनी चमकती है । बूँदे पड़ रही हैं ….उससे वातावरण और शीतल हो रहा है । सखियाँ आनंदित हैं । अभी अभी सुवर्ण के रास मंडप पे नृत्य करके ये दोनों आये हैं …तो सखियाँ इनको वर्षा कुँज में ही ले गयी हैं । यहाँ एक सिंहासन है उस पर युगल सरकार विराजमान हो गये हैं । इनके सामने ही फुलवारी है । तभी काले काले बदरा नभ में छा गये ….और उन्हीं काले बदरा में दामिनी चमकने लगी । अद्भुत झाँकी थी ये तो ….क्यों कि जैसे ही बादल छा गए थे नभ में …अंधकार हो गया ….तो हमारी लाड़ली डर गयीं …वो श्याम सुन्दर के अंक में छुप गयीं …..तभी बिजली चमकी ….अद्भुत ये था कि एक बिजली नभ में चमक रही थी …तो दूसरी बिजली निकुँज में चमक रही थी ….अजी ! होड़ लग गयी दोनों में ।
दामिनी बिजली को कहते हैं …..दोनों ही दामिनी हैं ….एक नभ की और एक निकुँज की हमारी श्रीजी का श्रीअंग । घटा एक नभ का , और एक घटा हमारे श्याम सुन्दर । डरते हुए जब प्रिया जी श्याम सुन्दर के अंक में छुप जाती हैं तो उनके केशों से फूल झरते हैं वही बूँदें हैं । इनकी पायल चंचलता के कारण बज उठती है तो यही वर्षा की झिल्ली है । वर्षा समय नदी में बाढ़ आजाती है ….ऐसे ही प्रिया जू का यौवन ही नदी है जिसमें बाढ़ आगयी है । प्रिया जी के दो नयन ये मछली हैं ….जो वर्षा के जल में तैर रहे हैं । वर्षा समय नभ में इन्द्रधनुष बन जाता है ….श्रीजी की साड़ी की किनारी इन्द्र धनुष लगती है ।
सहस्रों सखियां आनंदित हो रही हैं ….वो वर्षा में तो भींग ही रही हैं इन दोनों के रूप की वर्षा में भी ये पूरी भींजी हुयी हैं ….काले बादलों के कारण दिन में ही रात्रि का भान हो रहा है …इतना अंधकार हो रहा है कि सामने युगलवर भी दिखाई नही देते ….किन्तु प्रिया जी का श्रीअंग चमक उठता है ….और उसी समय आकाश की दामिनी भी चमकती है ।
सखियाँ चहकती हुयी कहती हैं – सखी ! देखो , आज तो इन दोनों दामिनी में होड़ लग गयी है कि कौन ज़्यादा चमके । “पर हमारी प्रिया जू के सामने इस नभ दामिनी की क्या चलेगी सखी “?
ये बात आगे आकर हित सखी बोली थी । सब सखियाँ हित को पकड़कर बोलीं ….हिता ! तू बोलती है तो लगता है कानों को तृप्ति मिल गयी ….नयनों को तो मिल जाता है …पर इन कानों को तू ही तृप्त करती है …बता ! इस झाँकी के विषय में कुछ तो बोल । हमें सुनना है ।
हित सखी ये सुनकर आनंदित होकर बताने लगती है ।
आहा ! आजु तो दोनों दामिनी में होड़ मच गयी है ।
सखियों ! किन्तु कोई होड़ नही हैं इन दोनों में । तुम ही देख लो ! हमारी प्रिया जी रूपी दामिनी निरन्तर रस बरसाते हुए भी कभी रिक्त नही होतीं …ये सदैव रस से भरी रहती हैं …पर ये नभ की दामिनी तो …चारों ओर चमकते हुये खो जाती है …न तो घटा को अपने में ले सकी , न उसके लिए मचली ….इसलिये वो दिखाई नही देती बस चमक कर खो जाती है । पर हमारी दामिनी तो श्याम घटा में खोने के बाद भी चमकती रहती है …देखो तो ।
तभी श्याम सुन्दर प्रिया जी के स्पर्श से चंचल हो उठे ….और कपोल को चूमने लगे ….तब हित सखी फिर बोली ….नभ की दामिनी में ये शक्ति नही है कि वो बादल को भी चंचल कर सके ….पर हमारी दामिनी तो स्वयं चंचला होकर अपने से भी ज़्यादा चंचल श्याम घटा को कर रही हैं ….देखो तो क्या अद्भुत झाँकी है । हित सखी के साथ सब इसका दर्शन करने लगी थीं ।
तभी रस मत्त हो गए थे श्याम सुन्दर …उन्होंने अपनी प्यारी को प्रगाढ़ आलिंगन में भर लिया था …
हित सखी मन्द मुस्कुराते हुए एक गम्भीर बात कहती है –
“विजयी वो दामिनी होगी जो श्याम घटा को विचलित कर दे”.;
क्या नभ की दामिनी बादल को विचलित कर सकती है ? नही ना ।
पर यहाँ देखो –
प्रिया जी को अपने बाहु पाश में बाँध लिया है श्याम ने …..कैसी लग रही हैं इस समय हमारी प्रिया जू ! हित सखी ही बोली ….ऐसी लग रही हैं ….जैसे दो नील कमल के मध्य चन्द्रमा हो ।
नील कमल क्या हैं ? अजी ! दोनों बाहु श्याम सुन्दर के नीले नही हैं ? तो ऐसे नही लग रहे नील कमल और प्रिया जी का मुख , चन्द्रमा है । पर सखी ! एक आश्चर्य , कि इतने निकट होने के बाद भी ….इतने नज़दीक होने के बाद भी …नील कमल के मन में ये लोभ है कि मैं इस पूर्ण चन्द्रमा को कुछ भेंट दूँ ! पर क्या दूँ ? वो नील कमल सोच रहा है , इस चन्द्रमा को चूम लूँ ।
सारी सखियाँ आनन्द से उछल पड़ीं और बोलीं …..हमारी दामिनी जीत गयीं ….क्यों की श्याम घटा को विचलित करने की शक्ति हमारी दामिनी में ही है ….उस नभ की दामिनी में नही ।
हित सखी ये कहते हुये नाच उठती है …वर्षा और शुरू हो गयी थी ….सब भींग रहे थे …..ये वर्षा रूप की भी वर्षा है …ये आनन्द की वर्षा है । ये हमारे युगल के मिलन की वर्षा है ।
अब तो श्याम घटा में निकुँज की दामिनी निरन्तर चमकती ही जा रही है । नभ के दामिनी ने चमकना छोड़ दिया है ।
आहा !
राधा बाग में भी तो वर्षा हो रही है ….सब भींजे पड़े हैं ।
और अब गौरांगी ने फिर इसी पद का गायन किया ।
“आजु दोउ दामिनि मिलि बहसीं ……..
आगे की चर्चा कल –


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