!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( रस वर्षण – “खेलत रास दुलहिनी दूलहु” )
गतांक से आगे –
रस वर्षण निकुँज में नित्य है ,यहाँ रस की वर्षा होती ही रहती है ,पर उसका रूप हर बार नवीन नवीन ही रहता है । रास नित्य है ,पर नित्य रास, अद्वितीय हर बार है । एक बार जो रास हुआ उसमें जैसा रस मिला वैसा आगे न मिलेगा न मिला था ..किन्तु हर रास नयी उमंग नयी तरंग नये रस का अनुभव कराती है ..इसलिये श्रीहित चौरासी में रास का जितना वर्णन है वो हर रास नूतन ही है ।
रास का अभिप्राय यहाँ उस शरदकालीन महारास से नही है …रास का अभिप्राय “रस के समूह” से है । रस जब इकट्ठा हो जाता है ….वही रास का रूप ले लेता है ।
पागलबाबा कहते हैं – उत्सव मनाओ , संगीत गाओ , नृत्य करो , प्रेम रस में डूब जाओ ।
बताओ कितना जीयोगे ? बीस वर्ष या तीस वर्ष ? या फिर ये क्या सच नही है कि कुछ भी नही पता …कब काल आजाए ! फिर दूसरा जन्म , वो जन्म कहाँ होगा ? किस योनि में होगा ? पशु योनि में या वृक्ष या कीट पतंगा ? ये स्वीकार है ? चलो ! तुम सोचोगे हमने तो पुण्य किए हैं क्यों हम पशु बनेंगे ? तो भैया ! पितर योनि में जाओगे ? वो कौन सी श्रेष्ठ योनि है । आस लगाकर बैठे रहोगे कि बेटे पिण्ड दान देंगे तब खायेंगे …..या उससे अच्छे कर्म होंगे तो चलो देव योनि में चले जाओगे ….या उससे अच्छे कर्म होंगे तो इन्द्र ही बन जाओगे …ब्रह्मा बन जाओगे पर पुण्य ख़त्म होने के बाद तो फिर गिरोगे …..फिर चौरासी लाख में सुख दुःख भोगोगे । बाबा आज करुणा से भर गए थे ….उनके नयनों के कोरों से अश्रु बह रहे थे , बोले – भैया ! ये मानव जीवन तुम्हारे पुण्य से नही मिलता …ये पता है ना ? पुण्य से स्वर्ग मिलता है ..पाप से नर्क आदि मिलते हैं …..कहीं नही लिखा कि पुण्य से मानव जीवन मिलता है …मानव जीवन मात्र भगवान की कृपा से मिलता है ….कृपा हुई है तुम्हारे ऊपर फिर क्यों व्यर्थ इसे गँवा रहे हो । मत गँवाओ ।
भगवान की भक्ति करो ….भक्ति करते करते उनसे प्यार करने लगो …प्यार निष्काम करो …यहाँ तक पहुँचो …..प्यार भगवान से कोई भी कर सकता है …क्यों की भगवान ही अपने हैं ..सबके अपने हैं …ब्राह्मण के अपने हैं तो चाण्डाल के भी अपने हैं ….पुण्यात्मा के अपने हैं …तो महापापी के भी हैं । आप पुण्यात्मा हो तो भी आजाओ भगवान से प्यार करो । और पापी हो ..महापापी हो तो भी आजाओ ….प्रेम में कोई विधि निषेध नही है । यही मार्ग है श्रेष्ठ , श्रेष्ठतम …और कोई नही है मार्ग । विचार करो । रस को पीयो ….प्रेम ही रस है …इसी से तुम आगे बढ़ोगे …इसी से तुम निकुँज विहार के रास का दर्शन कर पाओगे ….यहाँ तक पहुँचो …समय अनुकूल है …भैया ! हमारी प्रार्थना है …मेरी इतनी बात मान लो ….ये जीवन व्यर्थ गया तो फिर कब मिलेगा मानव जीवन , कुछ पता नही है । बाबा करुणा में भरकर रो उठे थे ।
आहा ! भक्त कितना करुणा से भरा होता है …ये सारी बातें एक युवक को बाबा कह रहे थे …जो युवक बड़ा सुन्दर गौर वर्ण का था …पर व्यभिचार में लिप्त था …लाखों रुपये वो फूंक चुका था अपने …बाबा करुणा से भरकर उसे इस प्रेम रस में लाना चाह रहे थे …उसका जीवन सुधरे यही सोच थी ।
बाबा की वाणी में तेज है …..बाबा ने ठान लिया था तो बस उसमें परिवर्तन आना ही था ।
मैं क्या करूँ ? सुधार इतनी जल्दी दिखाई देने लगा ।
सुनो , ध्यान से ….श्रीहित चौरासी का ये पद ….निकुँज में रास चल रहा है …रस बह रहा है …सब कुछ चैतन्य है वहाँ ….सब कुछ । बाबा ने बांसठवाँ पद गाने के लिए गौरांगी से कहा ….और वीणा की झंकार में पद चल पड़ा …वो युवक झूम उठा था ।
खेलत रास दुलहिनी दूलहु ।
सुनहु न सखी सहित ललितादिक , निरखि निरखि किन फूलहु ।।
अति कल मधुर महा मोहन धुनी , उपजत हंस सुता कैं कूलहु ।
थेई थेई वचन मिथुन मुख निसरत , सुनि सुनि देह दशा किन भूलहु ।।
मृदु पदन्यास उठत कुमकुम रज , अद्भुत बहत समीर दुकूलहु ।
कबहुँ श्याम श्यामा दसनांचल , कच कुच हार छुवत भुज मूलहु ।।
अति लावण्य रूप अभिनय गुन , नाहिंन कोटि काम समतूलहु ।
भृकुटी विलास हास रस वरषत , श्रीहित हरिवंश प्रेम रस झूलहु । 62 ।
खेलत रास दुलहिनी दूलहु ………
बाबा उस युवक से बोले ….ये है रस की उपासना …इसमें बस रस ही रस है ….रस का चिन्तन करते हुए रस निकुँज में रास में सम्मिलित होना है ….भैया ! दर्शन करो ।
चलो , अब ध्यान करते हैं , बाबा बोले ।
सब लोगों ने वाणी जी रखकर आँखें बन्द कर लीं थीं , और उस युवक ने भी ।
!! ध्यान !!
वो कुँज तो अद्भुत तैयार था …..सब सखियाँ सजाने में लगी रहीं और सजकर जब तैयार हुआ तब तो उसका स्वरूप देखने जैसा था । वियाह मंडप था वो । सखियाँ उत्साहित थीं …सखियों ने मंडप तैयार किया था…उसमें युगल वर को बिठाकर , आहा ! श्याम सुन्दर सेहरा बांधे हैं …श्यामा जू ने घेरदार लहंगा और चूनर ओढ़ी हुयी हैं …..उनका स्वरूप देखते ही बन रहा था ।
वियाह सम्पन्न हुआ …..सखियों ने जय जयकार किया ।
अब मध्य में एक रास मंडल है …विस्तृत मंडल है …उसमें अष्ट सखियाँ जो प्रिया जू की निज सहचरी हैं …वो चढ़ गयी हैं ..और मुस्कुराती हुयी दुलहिन को देखने लगीं हैं….श्रीराधा जी ने मुस्कुराकर ही संकेत किया …क्या है ? ललिता दौड़ पड़ी और प्रिया जी के कान में आकर बोली …चलिये ! अब रास हो जाये । ना , प्रिया जी के मन में है पर बाहर से मना कर देती हैं …किन्तु सखियाँ कहाँ मानने वाली हैं , दुलहिन को रास मण्डल में ले जाकर खड़ा कर देती हैं । इधर सिंहासन में दूलह लाल अकेले हैं ..प्रिया जी अपनी नथनी ठीक करती हुई ललिता के कान में कहती हैं ….उनको तो लाओ , सखियाँ हंसती हैं …जोर जोर से हंसती हैं और ललिता फिर दौड़ कर दूलह लाल के पास आती है और बड़े प्रेम से उन्हें भी लाकर रास मंडल में खड़ा कर देती है ।
अब दोनों युगलवर खड़े हैं उस विस्तृत रास मंडल में …नीचे सखियाँ हैं जो संगीत कला में निपुण हैं ….कोई मृदंग तो कोई वीणा आदि लेकर बैठ जाती हैं और बजाने लगती हैं ।
लालन तो थिरकने लगते हैं …पर प्रिया जी नही । लालन रुककर कहते हैं ….नृत्य कीजिए ना !
प्रिया जी देखती हैं अपनी रंगदेवि सुदेवी आदि सखियों को और उन्हें अपने पास बुला लेती हैं ….मुस्कुराती हुयी श्रीराधा रानी नृत्य करने लगती हैं …लालन भी नृत्य में सम्मिलित हो जाते हैं ..अष्ट सखियां खड़ी हैं वो सब वर्तुल घूमने लगती हैं । अद्भुत रास प्रारम्भ हो गया था ।
हित सखी आदि सखियाँ देखकर ही आनंदित हैं …समस्त सखियों के सामने हित सखी इस रास का वर्णन करती है । जो अद्भुत से भी अद्भुत है ।
देखो तो ! नित्य नव दुलहिनी और नित्य नव दूलह लाल आज कैसे रास खेल रहे हैं ।
फिर हित सखी ललिता को कहती है …रंग देवि को कहती है ….कि अरे ! तुम दूलह दुलहिन के साथ नाच रही हो ….फूलती क्यों नही हो ! ललिता सखी हंसती हैं हित सखी की बात सुनकर ।
आहा ! आज तो दिव्य रास हो रहा है …यमुना का तट है …और उसमें महामधुर मोहन ध्वनि प्रकट हो रही है । दोनों रास रसिक अपने मुख से मधुर स्वर में “थेई थेई” बोल रहे हैं ये सुनकर हे सखियों ! तुम अपनी देह दशा क्यों नही भूलती हो ? हित सखी की बात पर रंगदेवि मुसकुराईं ।
हित सखी प्रमुदित होकर आगे कहती है – जब नृत्य की गति लेते समय युगलवर अपने चरण उठाते हैं और फिर रखते हैं ….तब मण्डल में बिछी कमल पराग उड़ने लग जाती है । नीलांबर और पीताम्बर जब फहरते हैं …तब वायु में उसकी सुगन्ध उठती है तब तो मादकता फैल जाती है …आहा ! सखियों ! लग रहा है हम सब देह सुध भूल जायेंगी । या सुध भूल गयी हैं ।
प्रेम में मत्त हो गए हैं दोनों ..श्याम सुन्दर तो कभी कपोल श्रीजी के स्पर्श कर रहे हैं तो कभी वक्ष …प्रेम में डूबे वो कभी अधर को भी छू लेते हैं । आहा ! इस झाँकी का दर्शन करते हुए हित सखी सब कुछ भूल गयी है ….और चढ़ जाती है मंडप पर और अपने दोनों हाथों को उठाकर आशीष देती है …कहती है …ऐसे ही रास करते रहो …ऐसे ही प्रेम रस में झूमते रहो । ऐसे ही मुस्कुराते रहो ।
यही आशीष समस्त सखियाँ देती हैं …..और देह भान भूल जाती हैं ।
उस युवक को प्रेम देवता ने छू लिया था ….वो रस मग्न हो रस में ही लीन हो गया था ।
गौरांगी ने फिर इसी पद का गायन किया ।
खेलत रास दुलहनि दूलहू……..
आगे की चर्चा कल –


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