!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 88 !!-उद्धव का दिव्य प्रेमानुभव भाग 3 : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 88 !!

उद्धव का दिव्य प्रेमानुभव
भाग 3

उद्धव ! पहली बार जब मैने उन्हें देखा था ना ……उन्मादिनी तो मैं तभी हो गयी थी…….मैं शुरू से ही ऐसी पगली हूँ…….एक दिन कुञ्जों में हम दोनों बैठे थे …….मैं उनके बाहों में थी ………वो मुझे निहारते ही जा रहे थे………पर पता नही मुझे क्या हुआ ! मैं चिल्ला पड़ी ….हे श्याम सुन्दर कहाँ गए ? मेरे बाँहों में वो थे …..पर मुझे लग रहा था कि वो मुझ से दूर चले गए……..पर आज ?

श्रीराधारानी कहती हैं – आज मुझे लगता है …….वो मेरे पास हैं ….वो मेरी बाँहों में हैं ………….

अब चलें स्वामिनी जू ! ललिता सखी नें श्रीराधा से कहा ।

उद्धव ! मेरा उन्माद इन मेरी प्यारी सखियों को कितना कष्ट देता होगा …………ये बहुत स्नेह मयी हैं ……….मेरे लिये वन वन में भटकती रहती हैं ……….मेरे साथ अँधेरी रात में भी कहीं भी चल देती हैं ……….रात रात भर सोती नही हैं ……..मेरा ख्याल रखती हैं ……..ओह ! मैं इन्हें क्या सुख दे पाऊँगी ……..मैने इन्हें भी सदैव कष्ट ही दिया है ……..मैने सब को कष्ट ही तो दिया है ……….तभी मुझे छोड़कर चले गए मेरे कृष्ण …..बहुत मानिनी हो गयी थी मैं ………..अपनें श्याम सुन्दर को भी मैने बहुत दुःखी किया ………मैं जिद्दी ………वो सरल …………कितना हा हा खाते थे ….मेरे पाँव तक दवाते थे वे ………ओह ! ठीक किया उन्होंने जो मुझ जैसी को छोड़कर चले गए ………..

इतना कहते हुये …….हा कृष्ण ! ये शब्द श्रीराधारानी के मुँह से निकला …..और वो मूर्छित ही हो गयीं ।

सखियों नें उन्हें सम्भाला………और महल में ले गयीं थीं ।

श्रीराधारानी के चरण की धूल उद्धव नें अपनें माथे से लगा ……..यमुना किनारे आकर बैठ गए थे ………रात्रि घनी हो रही है ।

चिन्तन करते हैं उद्धव – प्रेम का साकार रूप हैं श्रीराधारानी …..

उनके मुखारविन्द से जो भी प्रकट होता है …….वो प्रेम के सूत्र हैं – सिद्धान्त हैं ………..आहा ! प्रेम ! उद्धव रात्रि में बरसानें यमुना के किनारे बैठकर चिन्तन कर रहे हैं ……………

यहाँ के परमाणु में बहुत कुछ है …….प्रेम सहज है यहाँ के वातावरण में ।

संयोग में वियोग, और वियोग में संयोग ……..ये अनुभूति प्रेम कि है ।

उद्धव चिन्तन करते हैं जो जो श्रीराधारानी अभी कहकर गयीं हैं ……..

“जब श्याम मेरे बाँहों में थे तब लगता था कि ……..वो कहीं चले न जाएँ …..आज वो चले गए तब लगता है ……यहीं कहीं हैं “

ये अभी अभी कहकर गयीं श्रीराधिका जी ………….

प्रेम की स्थिति विलक्षण है……..प्रेम को इतना सरल नही है समझना …..मैं उद्धव जितना सरल समझता हूँ …..उतना सरल है कहाँ ?

ज्ञान कठिन है …….प्रेम सरल है ………यही सोच थी मेरी ……

पर यहाँ आकर पता चला……..कि प्रेम सबसे कठिन मार्ग है ।

अपनें आपको बर्बाद करके चलना पड़ता है इस मार्ग में……..अपनें “मैं” को बिना मिटाये . ….इस मार्ग में पैर भी रखना मना है ……।

इस प्रेम गली में वही आसकता है……..जो मान अपमान को खूंटे में लटकाकर चलता है …………..

यमुना बह रही हैं…………यमुना नही …….उद्धव को ऐसा लगता है मानों कृष्ण ही स्वयं बह रहे हैं इस यमुना में तो ।

उद्धव पूरी रात बरसानें में यमुना के तट पर बैठे रहे …………प्रेम नें उन्हें छू लिया है ………….और बदल दिया है ।

हे वज्रनाभ ! उद्धव छ महिनें तक वृन्दावन में ही रहे ………कभी बरसानें रहे ….कभी नन्दगाँव , कभी गोवर्धन ………..इस तरह से पूर्ण प्रेमी उद्धव बन गए थे ………….प्रेम है ही ऐसा तत्व !

शेष चरित्र कल –

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