!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 25 – “धर्म की बात अधर्म के लक्षण” )
गतांक से आगे –
हृष्यच्चकोरनयनस्य हसन्मुखस्य नृत्यद् भ्रुवो नवरंगज्ञ ! बिना रसज्ञाम् ।
माधुर्यरंगमिदमंग तवान्गमंगमंतर्मुहुर्वदति धर्ममधर्ममेव ।।
अर्थ – हे प्यारे ! आपकी जिह्वा ही मात्र धर्म बोल रही हैं अन्यथा आपके प्रसन्न नेत्र , हँसता आपका मुख , नृत्य करती आपकी भ्रू भंगी , और मधुर रस की रंगस्थली आपका प्रत्येक अंग… अधर्म को ही धर्म बता रहा है , हे नव रसज्ञ ! हम क्या समझें ?
***यही है प्रेम की बात, जहां ‘ना’ को ‘हाँ’ समझा जाये , और ‘हाँ’को ‘ना’ …जहां धर्म को अधर्म और अधर्म को धर्म समझा जाये ।
प्रेमनगर में सब गोपियाँ आगयीं अपने प्यारे के पास, आयी हैं रास करने , इनके साथ नृत्य करने , थिरकने । इनके अंग संग के लिए । किन्तु सब कुछ उलट पुलट कर दिया श्यामसुन्दर ने ।
उन्होंने कहा …हे गोपियों ! तुम जाओ , रात्रि में अपने पति को छोड़कर इस तरह मेरे
आस आना उचित नही है ….जाओ । तुम्हारे पति तुम्हारी बाट देख रहे होंगे ….देखो ! अपना पति कैसा भी हो ….कैसा भी ….चाहे दुबला हो , चाहे शील स्वभाव से विपरीत हो ….या दुर्भाग्यशाली हो ….या वृद्ध हो …..हे गोपियों ! इतना ही नही ….जड़ भी हो यानि मूर्ख हो ….या रोगी हो …तो भी पत्नी का धर्म है अपने पति को न छोड़े …अपने पति के ही सेवा में लगी रहे ।
लो ! ये धर्मगुरु बन गये श्यामसुन्दर आज ।
बेचारी गोपियाँ भागी आयीं हैं …सब कुछ छोड़कर आयी हैं ….और इनके लिए ही छोड़ा है …..किन्तु ये क्या ? रंग में भंग डाल रहे हैं ….क्या क्या सोचकर आयीं थीं ये सब ….कि शरद की चाँदनी में रास होगा ….नृत्य होगा । श्याम सुन्दर के अंग का संग मिलेगा ….किन्तु ये क्या रसिकशिरोमणि आज धर्म की बातें करने लगे थे ।
तब गोपियों ने रोना आरम्भ किया …..अपने पद के अंगूठे से धरती को कुरेदने लगीं ।
ये क्या कर रही हो ?
श्याम सुन्दर ने पूछा तो गोपियों का उत्तर था – हम धरती माता से कह रही हैं…..हम भी तुम्हारी बेटी हैं …मात्र वैदेही ही आपकी पुत्री नही हैं….हमारे लिए भी फट जाओ और हम उसमें समा जाती हैं । श्याम सुन्दर ये सुनकर भी गम्भीर ही बने रहे ….वो फिर आगे कहने लगे ….अरे ! धर्म को नही मानोगी ? तो पाप लगेगा । धर्म को नही मानोगी तो नर्क जाना पड़ेगा …..सोच लो ।
सोचो तुम ! हम नही सोचतीं अब ….
ललिता सखी को क्रोध आगया और वो आगे आकर बोलने लगी थी ।
तुम्हारे वेणु ने ही अधर्म की प्रेरणा दी है हमें …इसलिए हमें कोई पाप नही लगेगा । अपने इस बाँसुरी से कहो ….क्यों अधर्म को फैला रहा है ! क्यों हमारी मर्यादा को तार तार कर रहा है ….ललिता सखी बहुत ग़ुस्सा हो गयी ….बोली ….पहले सब कुछ छुड़ाया ….पति पुत्र भाई माता पिता सब , और अब जब हमने सब का परित्याग कर तुम्हारे पास आयीं तो हमें धर्म सिखा रहे हो ….अजी ! बहुत हो गया अब बन्द करो ये धर्म अधर्म का खेल । हम क्या करें ये बताओ ।
ललिता इतने पर ही चुप कहाँ हुयी …….सुनो ! हम तो सेवा ही कर रहीं थीं अपने पति की …..अपने पति को खिला रहीं थीं ….पाँव दबा रहीं थीं …..वो रोटी माँग रहे थे हम उन्हें बड़े प्रेम से दे रहीं थीं …..उनको पंखा झल रहीं थीं …..फिर क्यों हमारी मर्यादा को तार तार कर दिया ।
मैंने क्या किया ? श्याम सुन्दर ने पूछा ।
क्या किया ? ललिता चिल्लाई ….अरे ! बाँसुरी क्यों बजाई ? बाँसुरी में हमारा नाम लेकर हमें क्यों पुकारा ? अगर ये अधर्म है , तो इस अधर्म की प्रेरणा देने वाली तुम्हारी बाँसुरी ही है ….वेन बन गयी है बाँसुरी ….चारों ओर अधर्म को फैला रही है ….देखो ! रोको इसे ….ललिता बोली ….प्यारे ! हम तो अबोध हैं …हमें ज्ञान नही हैं …फिर क्यों हमारी मर्यादा को बिगाड़ने पर तुल गयी ये वेणु ।
इतना कहकर ललिता रुकी ….फिर देखा श्याम सुन्दर के नेत्रों में ….फिर उनके मुस्कुराहट को …..फिर उनके हाव भाव को …तब ताली बजाती हुयी बोली …प्यारे ! धर्म की बात तो मात्र तुम्हारी जिह्वा कर रही है ….बाकी तो तुम्हारे अंग अधर्म की ही बातें कर रहे हैं ….देखो ! क्यों मटका रहे हो इन कमल नयनों को ….हमें अधर्म में डालने के लिए ? क्यों मुस्कुरा रहे हो …गम्भीर रहो ….हम विवाहित हैं ….विवाहित स्त्री को देखकर इस तरह मुस्कुराना नयनों से कटाक्ष चलाना ….ये जार पुरुष का काम है ….अरे ! अधर्म तुम कर रहे हो ….तुम्हारा अंग अंग अधर्म कर रहा है ….और हमें सीख दी जा रही है कि ये धर्म नही है ?
ललिता बहुत बोली है …उसे बड़ा क्रोध आरहा है ।
आज तक तो तुम्हें कभी धर्म अधर्म याद नही आया ! आज ही क्यों ?
मत मुस्कुराओ , मत नयनों के कटाक्ष चलाओ , मत करो हमारे साथ ये धर्म अधर्म का खेल ।
अब रो पड़ी थी ललिता सखी ! हम क्या जानें धर्म-अधर्म …..हम तो गाँव की गँवारन हैं …तुम्हें ही सब कुछ मानती हैं ….अब तुम्हें प्रेम करना धर्म हो तो ठीक …अगर अधर्म हो तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं । किन्तु प्यारे ! संसार की सेवा करके अगर स्वर्ग मिले तो ठोकर मारती हैं हम और तुम्हारी सेवा से अगर नर्क भी मिलता हो तो हम नर्क में ही जाना पसंद करेंगी ।
हे प्यारे ! सत्य , अहिंसा , तप , पवित्रता आदि आदि यही तो धर्म हैं ना ? और झूठ , लोभ , दम्भ, मद ये अधर्म है ….ललिता पूछती है …है ना ? श्याम सुन्दर को “हाँ” कहना पड़ता है ….तब ललिता सखी कहती है – जिस सत्य में तुम्हारा प्रेम न हो ….जिस अहिंसा में तुम न मिलो …..जिस तप में तपने से तुम्हारी झलक न मिले ….और जिस पवित्रता में तुम्हारी याद न आए ….हे प्यारे ! भाड़ में जाए ऐसा धर्म ! और अधर्म ? झूठ ….झूठ कहते ही तुम्हारी झूठी बातें स्मरण में आजाती हैं …मन आनन्द से भर जाता है …कि तुमने उस दिन हमसे झूठ बोला था ….उस झूठ से हमें प्रेम है । लोभ ….ये अधर्म है ना ? पर कितने लोभी हो …नौ लाख गौ घर में होने पर भी माखन चुराते हो …लोभ की हद्द है ….इस लोभ का चिन्तन करते ही मन में खुशी दौड़ जाती है । दम्भ …कितने दम्भी हो …..और अहंकार से भरे हो ….पर ये सब सोचते ही मन में एक तरंग दौड़ पड़ती है …मन में मीठी गुदगुदी सी होने लगती है ….मन तुम्हारे प्रेमरस में डूब जाता है ।
ललिता कहती है –
इसलिए प्यारे ! अधर्म ही हमारे लिए धर्म है …धर्म तो हमारे लिए अधर्म बन गया है ।
हे रसिकों ! ये प्रेम नगरी है …यहाँ धर्म को अधर्म और अधर्म को धर्म माना जाता है ।
जय हो , जय हो ।
अब कहाँ बेचारा प्रेमी धर्म अधर्म को समझे !
वो तो बस खो गया है अपने महबूब की गली में ….
“तेरी गली में आकर खो गए हैं दोनों ,
दिल मुझ को ढूँढता है , मैं दिल को ढूँढता हूँ ।”
अब दोनों ही खो गए हैं ….अब धर्म किसे समझावें ?
शेष अब कल –
