श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! वत्सपाल कन्हैया !!-भाग 2 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! वत्सपाल कन्हैया !!

भाग 2

मैया नें गोद में उठा लिया कन्हैया को ……….और माखन खिलानें लगीं ……क्यों कि अभी तक इसनें कुछ भी नही खाया ।

मैं नही खाऊँगा ! फेंक दिया माखन ……..हटा दिया मैया का हाथ ।

“मैं पिटूँगी तुझे”…….बस इतना ही बोलीं थीं मैया, कि जोर से रोना शुरू ……गोपियाँ सब इकट्ठी हो गयीं थीं ……क्या हुआ , क्या हुआ ?

हमारा कलेजा ही फट जाएगा ऐसा लगा इसका रुदन सुनकर ……….क्या कह रहा है ये बृजरानी ? गोपियों नें पूछना आरम्भ कर दिया था ।

अब इसकी हर जिद्द थोड़े ही मानी जायेगी ………….अरे ! गैया सींग मार दे …….उनके खुर, इसके कोमल पाँव में लग जाये …….गिर जाए ………कुछ भी हो सकता है …………मैं कैसे भेज दूँ इसे ।

गोपियों को भी कोई समाधान नही मिल रहा …………बृजरानी भी दुःखी हैं ……..गोप ग्वाल भी देख रहे हैं ।

मैया ! हम हैं ना ! हम सब सम्भाल लेंगे !

मनसुख नें आगे बढ़कर मैया को समझाते हुए कहा ।

सम्भालोगे तुम ! तुम भी तो छोटे छोटे हो …………हाँ ……..मैया बोली ……….लाला ! तुम भी जाओ और तुम्हारे साथ जो गैया चरानें जाते हैं वो भी जाएंगे…….कन्हैया नें मैया की बात सुनी सुननें तक रोये नही……….फिर रोना शुरू ……..नही ….बड़े नही जाएंगे …….हम छोटे छोटे ग्वाल ही जायेंगे ……..कन्हैया नें अपनी बात जोर देकर कही ।

दाऊ भैया तो हैं ना ! वो सब को बचा लेंगें ।

छोटा सखा भद्र बोला । ………इन सबको लगता है बलराम हैं तो डर किस बात का ………..वो सब देख लेंगें ।

चुप करो ! तुम्हीं लोगों नें इसे बिगाड़ा है ………दाऊ भी तो बालक ही है ……..बृजरानी नें सबको चुप करा दिया ………पर कन्हैया की बात का समाधान न निकला…….तो कन्हैया का रोना शुरू ही था ।


हे भगवन् ! मैं सन्ध्या को अपना कार्य इत्यादि देखकर जब महल में गया …..तो वहाँ कन्हैया का रुदन !………ओह ! मैं तो काँप गया ।

क्या हुआ ! क्या तुमनें फिर इसे दण्डित किया ?

मैने बृजरानी से पूछा था भगवन् !

कन्हैया मेरे सामनें आगया था रोते हुए ……………और मेरी गोद में बैठ गया ……………क्या चाहिये मेरे लाला को ? बोलो !

मैने उसके आँसू पोंछे ………….तो वो मुझ से बोला ……….

बाबा ! गैया चरानें जाऊँगा !

पर ! तुम छोटे हो !

नहीं …..मुझ से छोटे भी जाते हैं …….मैं बड़ा हो गया हूँ ।

मैं उसकी बातें सुनकर असमंजस में पड़ गया था ………….मुझे बृजरानी नें सारी बातें बता दीं थीं ………….मैं क्या करता !

मेरा प्राण है कन्हैया तो…………मैं तुरन्त बोला ………तुम बछड़े चरानें जा सकते हो ।

ठीक है………..मेरी गोद से उछल कर वो भागा बाहर ……..और सब ग्वाल सखाओं को इकठ्ठा करके बतानें लगा ………..मैं बछिया बछड़े चराऊँगा……छोटे छोटे बछड़े ………मेरी “भूरी” भी जायेगी ।

बछिया बछड़े ये दूर तक नही जाएंगे भगवन् ! ……….पास से ही उछलते हुए वापस गोष्ठ में ही आजायेगें…….मैं क्या करता ?

नही बृजराज ! तुम्हारे यहाँ सच में भगवान नारायण ही कोई लीला कर रहे हैं…….इसलिये तुम निश्चिन्त हो जाओ …..कल “वत्स पाल” हो जाएगा तुम्हारा युवराज । ऋषि शाण्डिल्य नें बड़ी प्रसन्नता से कहा ।


सोया कहाँ कन्हैया ! कल मुझे बछड़े चरानें जाना है ………..नही नही ……..पूरा नन्दगाँव ही नही सोया ………क्यों की उनका युवराज वत्सपाल बननें जा रहा था ।

उठ गए जल्दी ही ………….स्नान करानें की जिद्द करनें लगे मैया से ।

मैया नें स्नान करा दिया ……..घुँघराले बालों में तैल लगाकर उन्हें सम्भाल दिया …….काजल आँखों में ……..मोतियों की माला गले में ……..पीली पीताम्बरी ……….क्या दिव्य रूप हो गया था ।

तभी महर्षि शाण्डिल्य भी विप्रों के साथ पधारे ।

बछड़ों बछियाओं को सामनें लाया गया ……..आहा ! कोई दूध की तरह सफेद बछिया है कोई सफेद और काली …..भूरी तो है ही है ।

सुन्दर पूजन की थाली लेकर चलीं बृजरानी …….पर ये क्या ! वो थाली मैया के हाथों से लेकर स्वयं ही चल पड़े थे कन्हैया ।

बाबा नें गोद में लेना चाहा , पर नही ….चलकर ही गए ……आहा ! नन्हे से कन्हैया …….उनके हाथों में पूजन सामग्री ………….

ऋषि शांडिल्य नें मुस्कुराते हुए मन्त्रोच्चार प्रारम्भ किया था ……कन्हैया नें अपनें नन्हे करों से तिलक किया ।…..अरे ! पहला तिलक तुझे करूँ ?

उछलती हुयी आगयी थी आगे “भूरी” ………मानों कह रही थी पहला तिलक मेरा ………कन्हैया नें उसका तिलक किया ……फिर सबका किया………लकुट ली ………तभी बृजरानी भीतर गयीं और एक काली कमरिया कन्धे में डाल दी कन्हाई के……..ताकि नजर न लगे ।

सब लोग देख रहे हैं ……..निहार रहे हैं कन्हैया के इस रूप को ।

गोपियाँ पुष्प चढ़ा रही हैं…..गोप लोग अपनें बृज के युवराज को ऐसे देख कर गदगद् हैं आहा !…….सच में नेत्र इन्हीं नें सफल किये हैं तात !🌹

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