श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! कुश्ती दंगल – “गौचारण प्रसंग” !!
भाग 1
अनन्त कि लीलाएँ भी अनन्त हैं …….मैं कहाँ तक गाऊँ ?
तात ! ये लीलाएँ रुकी नही हैं…….आज भी चल रही हैं ……..उद्धव कहते हैं – हाँ उस समय अधिकारी अनधिकारी सबको लीलाओं का सुख मिल जाता था, अवतार काल था वो ……पर अब मात्र अधिकारी के सन्मुख ही वो लीलाएँ प्रकट होती हैं ।
तात ! ब्रह्म कि लीलाएं हैं ये ….और मैं पूर्व में ही कह चुका हूँ – लीला का कोई उद्देश्य नही होता …….बस एक ही उद्देश्य है – अपनें आनन्द कि अभिव्यक्ति ……….तो हम लोगों का भी यही उद्देश्य होना चाहिये कि हृदय का आनन्द छलकनें लगे ………कन्हैया कि लीलाओं को सुनते गाते हुये हम अपनें भीतर के आनन्द को प्रकट होनें दें ……क्यों कि लीला का यही लक्ष्य है – अपनें आनन्द को चारों ओर फैलाना ।
विदुर जी आनन्दित हो उठते हैं…….सच कहा उद्धव ! क्यों कि ये कन्हैया आनन्द रूप ही हैं …….देखो उद्धव ! नभ में देखो ! बड़े बड़े तपश्वी बड़े बड़े सिद्ध योगिन्द्र तुम्हारे द्वारा गाई जा रही इन लीलाओं को सुनकर अपनें हृदय के सूखे आनन्द के सर को पुनः भर रहे हैं……….
क्यों बेकार में ज्ञान के शुष्क अरण्य में भटकें ? क्यों बेकार में नाक कान दवा कर योगी होनें का भ्रम फैलाएं …………..ये देखो ! आओ वृन्दावन ……….यहाँ वो ज्ञान का परमतत्व कन्हैया नृत्य कर रहा हैं ………योग का लक्ष्य वो आत्म तत्व यहाँ ग्वालों के साथ क्रीड़ा में मग्न है ………इसे देखो ! यही है जीवन का सार !
विदुर जी नें उद्धव से कहा – आप अब सुनाइये उन आनन्द पूर्ण गोपाल कि लीला………मैं जितना सुनता जा रहा हूँ मेरी प्यास और बढ़ रही है ……….उद्धव ! मुझे पिलाओ “श्रीकृष्णचरितामृतम्” ।
उद्धव सुनानें लगे –
कन्हैया ! तुझे किसनें मारा ?
दाऊ नें अपनें पास बुलाया आज वन में ………..और कन्हैया कि पीठ देखनें लगे थे ………ओह ! नेत्र सजल हो उठे दाऊ के ……..कन्हैया के सुकुमार पीठ में एक नन्हीं सी खरोंच आगयी थी ।
रक्त तो नही आया …….पर खरोंच अच्छे से ही लगी थी ।
नेत्र के जल छलछला आये थे दाऊ के……..तुझे ये चोट किसनें दी ?
कन्हैया को तो पता भी नही है कि उसके चोट भी लगी है ……..कहाँ ? कहाँ है चोट ?
यह क्या है ? दाऊ नें चोट को हल्के से छूते हुए कहा ।
अच्छा ये ? ये तो उस लता से है ………….कन्हैया नें सामनें कि एक लता बता दी ………….
तू उस लता के पुष्प लेनें गया था ? दाऊ अपनें छोटे भाई कि खरोंच भी कैसे देख लेते …….यह तो प्राणों से प्यारा है दाऊ भैया का ।
नही …..नही दाऊ भैया ! ……….मैं पुष्प लेनें गया था उधर ………….फिर दूसरी ओर दिखा दिया ।
तू उधर गया था पुष्प लेनें ? किधर ? दाऊ पूरी छान बीन करनें की सोच रहे हैं और क्यों न करें ……सुकुमार पीठ में खरोंच ?
मैं कदम्ब के पुष्प लेनें उधर गया था ….कन्हैया अब डर रहे हैं दाऊ से ।
क्यों की इनके मूड का कोई भरोसा नही है ………..कहो तो बड़ी बड़ी बातों को भी हँस कर टाल देते हैं ……….और कहो तो छोटी बातों को भी बड़ा बनाकर हंगामा कर देते हैं …………वैसे ये छोटी बात हो कैसे सकती है ….कन्हैया के खरोंच ? कठोर हृदय भी पिघल जाए ।
कितना सुकुमार तो है हमारा लाला ।
झूठ बोल रहा है तू ! लता उधर है और कदम्ब इधर है ……..पुष्प तोड़े तेनें कदम्ब से और खरोंच आयी लता से …….हैं ? दाऊ भैया को समझते देर न लगी कि ये साफ़ साफ़ झुठ बोल रहा है ।
पर ये क्या –
*क्रमशः …
