श्री सीताराम शरणम् मम 153भाग 2″तथा अध्यात्म पथ प्रदर्श : Niru Ashra

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[1Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग1️⃣5️⃣3️⃣ 🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 2

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

जीजी ! मना मत करना……आपको और आर्य को मेरा उद्यान देखना ही पड़ेगा…..मैं भोजन कर रही थी ….तब बड़ी जिद्द करनें लगी उर्मिला ।

अच्छा ! अच्छा ! ठीक है ………..पर तू पहले आर्यपुत्र से तो आज्ञा ले ले छोटी !

क्या कह रही हैं उर्मिला ! नींद थोड़े ही ली जाती है दोपहर में …..बस कुछ समय लेट जाते हैं …………बात सुनी तो मेरे आर्यपुत्र श्रीराम उठ गए थे ।

ये कह रही है कि एक उद्यान बनाया है इसनें …………..आर्य ! ये चाहती है कि हम उस उद्यान को एक बार देख लें ।

तो हो आओ ना वैदेही ! मेरे श्रीराम नें मुस्कुराते हुए कहा ।

नही ये चाहती है कि आप भी ! ……..मैने उर्मिला की ओर देखते हुए कहा ……….है ना उर्मिला ! उसनें ‘हाँ” में सिर हिलाया ।

तो चलो ! कुछ देर वहीं बैठते हैं ………उर्मिला नें कैसा उद्यान बनाया है हम भी तो देखें ………मेरे प्राणनाथ मेरा हाथ पकड़ कर चल दिए थे ………मैं उन्हें देखती – उनके पीछे चली ……..ऐसा आज तक कभी किया नही ।

मेरा मन नाच उठा था ।

उर्मिला भागी पहले ……जो जो उद्यान में था उसे वहाँ से हटा दिया ।

और दुष्ट ! उर्मिला भी चली गयी………मैं हँसी मन ही मन ।

आहा ! कितना सुन्दर उद्यान था…….उस उद्यान में कुञ्ज भी बने हुये थे …….उस कुञ्ज में फूलों की सेज भी थी……..उद्यान में सरोवर भी था ……..उस सरोवर के मध्य में फुब्बारे चल रहे थे ।

मैं नाच उठी थी ……..नाथ ! कितना सुन्दर उद्यान है ।

पर तुम्हारे जनकपुर जैसा नही है ……..इतना कहकर मेरी आँखों में देखा था ……….मेरे हाथ को चूमा ।……वहाँ बैठें ? मुझे इशारे में कहा । सामनें सरोवर था उसमें हंस खेल रहे थे ।

पास में ही एक कुञ्ज था ……….उस कुञ्ज की दीवारों पर चित्रकारी की गयी थी……फूलों के रँग से………….

क्रमशः….
शेष चरित्र कल ……

🌹जय श्री राम 🌹
[1] Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                       *भाग - ४६*

                 *🤝 २. संसार 🤝*

                _*संसार में सार क्या है*_ 

   शास्त्र में एक वचन मिलता है-

 *यत् सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमिश्रात् ॥*

   भाव यह है कि संसार में जो सार वस्तु हो, मनुष्य उसीका सेवन करे, अर्थात् पुरुषार्थ द्वारा सार वस्तु को प्राप्त करे और असार वस्तुओं में न फँसे। दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि जैसे दूध और पानी मिलाकर हंस को दो तो वह साररूप दूध को ग्रहण करेगा और असार वस्तु पानी को छोड़ देगा, उसी प्रकार मनुष्य को भी करना चाहिये।

   *अतएव यदि सार को ग्रहण करना है तो संसार में सार वस्तु क्या है—यह जान लेना चाहिये। जिस मनुष्य में विवेक-बुद्धि जाग्रत् नहीं हुई होती, वह तो विषयभोग के साधनों को ही साररूप मानता है, इस कारण सारे जीवन को इन साधनों के जुटाने में ही लगा देता है। भोग से कभी तृप्ति नहीं होती, बल्कि उससे भोगतृष्णा दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है; परिणाम यह होता है कि मनुष्य मृत्यु की अन्तिम घड़ी तक विषय-चिन्तन में ही लगा रहता है और उसके फलस्वरूप आसुर योनियों को ही प्राप्त होता है। यह बात हुई उन मनुष्यों की-*

   जो *‘कामोपभोगपरम'* हैं अर्थात् काम्य वस्तुओं को प्राप्त करके उनका भोग भोगने में ही जीवन को सार्थक समझते हैं। ऐसे मनुष्यों को शास्त्रों में पामर और विषयी की संज्ञा दी गयी है।

   *परंतु जो मुमुक्षु पुरुष हैं, वे इस बात को जानते हैं कि भोग-पदार्थ दुःखयोनि और आगमापायी हैं, अत: उनसे कोई सच्चा और स्थायी सुख नहीं मिलता। इससे वे लोग विषयों को विषवत् त्याग देते हैं और संसार में साररूप क्या है - इसका विचार करते हैं। सारे संसार का सार खोजना तो एक बहुत व्यापक प्रश्न है; इसलिये पहले छोटे-छोटे परिचित उदाहरणों को देखें, जिससे मूल प्रश्न का समझना सहज हो जाय।*

   एक आदमी के पास एक सोने की अँगूठी है। उस अँगूठी को निहाई पर रखकर उसपर हथौड़ा मारा जाय तो क्या होगा? अँगूठी का आकार नष्ट हो जायगा और हथौड़े से पीटा सोने का टुकड़ा दीख पड़ेगा। वह सोना एक समय अँगूठी के रूप में था, ऐसी केवल स्मृतिमात्र रह जायगी। अब उसको एक बर्तन में रखकर भट्ठी पर चढ़ायेंगे तो वह अँगूठी गलकर एक छोटी सोने की गुटिका बन जायगी और तब यह स्मृति भी शेष नहीं रहेगी कि वह गुटिका पहले अँगूठी के रूप में थी। इस सारे प्रयोग का सार इतना ही है कि अँगूठी जब उत्पन्न नहीं हुई थी, उस समय भी सोना तो था ही। पीछे सुनार ने उस सोने से एक आकृति तैयार की और उस आकृति का नाम *'अँगूठी'* रखा । नाम तो आकृति बनने के बाद ही पड़ा। पीछे जब उस आकृति को नष्ट कर दिया गया, तब उसका नाम भी नष्ट हो गया और सोना अवशेष रह गया। *नरसी मेहता* ने अपने एक भजन में यही बात इस प्रकार कही है- *'घाट घड़या पछी नामरूप झूजवाँ, अन्ते तो हेम नुं हेम होय।'* अर्थात् आकृति गढ़ने के बाद नाम-रूप का अस्तित्व होता है, फिर अन्त में सोने-का-सोना ही रह जाता है। यही बात दूसरी तरह कहें तो कह सकते हैं कि पहले सोना था, पीछे उसने एक रूप धारण किया और उस रूप का नाम अँगूठी रखा गया। फिर सोने ने अपनी उस आकृति को अपने में समेट लिया और इस प्रकार नाम-रूप दोनों का नाश हो गया और सोना फिर अपने मूल स्वरूप में आ गया। अब अँगूठी के विषय पर फिर आइये । अँगूठी में से सोना निकाल लें तो क्या बच रहेगा? यह हम पहले ही कह चुके हैं कि सोने ने ही नाम-रूप धारण किया था, इसलिये अँगूठी में से सोना निकाल लेनेपर कुछ भी बाकी नहीं रह जाता; क्योंकि नाम और रूप दोनों ही सोने में कल्पित थे। परंतु अँगूठी में से सोना प्रत्यक्षरूप में निकाला नहीं जा सकता, अतएव इसको समझने के लिये सूक्ष्म रीति से विचार करना पड़ता है।

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
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