[24] Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣5️⃣5️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 1
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
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“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे
मैं वैदेही !
आप मेरे सर्वस्व हैं …………ये राज्य आपका है ……..
ये क्या ? ये “आप” कह कर सम्बोधित क्यों कर रहे थे अपनें छोटे भाइयों को मेरे श्रीराम ! पर व्यक्ति जब अतिशय शोक में होता है …..तब वह ऐसे व्यवहार करता ही है ।
सामनें खड़े हैं हाथ जोड़े तीनों भाई ………भरत , लक्ष्मण, शत्रुघ्न ।
अश्रु भरे नेत्र , शोकाकुल……कान्तिहीन मुख मण्डल ……….
अपनें अग्रज श्रीराम को ऐसी अवस्था में देखा तो स्तब्ध रह गए थे ये तीनों भाई ।
आप कहना क्या चाहते हैं आर्य ! आगे बढ़कर भरत नें ही पूछा था ।
तुम लोगों नें सीता के बारे में क्या सुना है ?
ये क्या प्रश्न था ! एक दूसरे का मुँह देखनें लगे थे ।
देखो ! राम लड़खड़ाते उठे अपनें आसन से ……………
तुम लोग जानते हो……..मेरी सीता का जन्म सत्कुल में हुआ है ।
वह बहुत अच्छे और ज्ञानी परिवार की बेटी है ………अयोनिजा है ।
रावण नें उसका हरण किया…….मुझे पता था ये बात कोई कह सकता है ….इसलिये मैने सीता की अग्नि परीक्षा भी ली ……..अगर तुम लोगों को विश्वास नही है तो पूछो इस लक्ष्मण से ….ये साक्षी है ।
क्रमशः….
शेष चरित्र कल ………….!!!!!
🌹 जय श्री राम 🌹
[ Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

*💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*
*भाग - ५१*
*🤝 २. संसार 🤝*
_*संसार मनोमात्र है*_
*मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।*
*बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥*
अर्थात् मन ही जन्म-मरणरूप संसारबन्धन का कारण है, उसी प्रकार मोक्ष देनेवाला भी मन ही है। जो मन विषय-भोग में आसक्ति रखता है, वही संसारबन्धन करता है और जब वह विषय-विमुख होता है, तब मोक्ष भी वही दिलाता है। इस सम्बन्ध में श्रीशंकराचार्य जी कहते हैं-
*संसार: स्वप्नतुल्यो हि हि रागद्वेषादिसंकुलः।*
*स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद् भवेत् ॥*
निद्राकाल में मन जैसे स्वप्नसंसार की सृष्टि करता है, वैसे ही राग-द्वेषादि से युक्त मन बाह्य संसार की रचना करता है। इस प्रकार जाग्रत्-प्रपंच भी स्वप्न-प्रपंच के समान ही मनोमात्र है; स्वप्न जैसे निद्रा-काल में सत्य जान पड़ता है, उसी प्रकार जाग्रत्-प्रपंच भी ज्ञानरूपी जागृति जबतक नहीं आती, तभीतक सत्य जान पड़ता है।
इसी बात को और भी स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं-
*तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिका रजतं यथा ।*
*यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ॥*
एक चमकती हुई बड़ी सीप पड़ी है। उसके ऊपर सूर्य का प्रकाश पड़ता है। दूर से वह ऐसी लगती है मानो चाँदी हो। परंतु यह चाँदी तभीतक दीख पड़ती है, जबतक पास जाकर सीपी का ज्ञान नहीं प्राप्त कर लिया जाता। जिस क्षण यह निश्चय हो जायगा कि वह सीप पड़ी है, उसी क्षण चाँदी का दीखना बन्द हो जायगा।
*इसी प्रकार एक और अद्वितीय ब्रह्म का जो इस जगत् का अधिष्ठान है (उसी प्रकार जैसे सीप चाँदी के ज्ञान का अधिष्ठान थी, चिथड़े की लीरी जैसे सर्पज्ञान का अधिष्ठान थी) जबतक ज्ञान नहीं होता, तभीतक यह जगत् दीख पड़ता है- ठीक उसी प्रकार जैसे अधिष्ठान के ज्ञान के पहले चाँदी और सर्प दीख पड़ते थे।*
इस ज्ञान का अनुभव करने के लिये श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाना चाहिये। शरण में जाते समय गुरु के प्रति कैसा भाव होना चाहिये-- यह बतलाते हुए श्रुति कहती है-
*यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ ।*
*तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥*
पहले तो ईश्वर के प्रति परम भक्ति होनी चाहिये । ईश्वर के प्रति यदि परम अनुराग न हो तो भला, उनको प्राप्त करने का प्रयत्न ही कैसे हो सकता है? फिर ईश्वर के प्रति जैसा भक्ति-भाव हो, वैसा ही गुरु के प्रति होना चाहिये। गुरु में ईश्वरबुद्धि न हो तो यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता। इस प्रकार की योग्यतावाले शिष्य को बोध कराने से ज्ञान तुरंत अपने-आप स्फुरित होता है।
अब गुरु के पास किस प्रकार विनय से जाना चाहिये, यह समझाते हुए श्रीकृष्ण भगवान् गीता में कहते हैं-
*तविद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।*
*उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥*
अत्यन्त दीनभाव से साष्टांग दण्डवत्-प्रणाम करना, अर्थात् बहुत ही नम्रभाव से गुरु की शरण में जाना चाहिये। गुरु बोध प्रदान करें, उस समय जो बात समझ में न आये, उसको प्रश्न करके विवेकपूर्वक पूछना चाहिये, जिससे मन में संशय न रह जाय। इन दोनों से बढ़कर आवश्यक बात तो यह है कि गुरु की सेवा करके उनको सन्तुष्ट रखना चाहिये। ऐसा करते-करते गुरु प्रसन्न होकर एक दिन अवश्य ज्ञान का स्वरूप समझा देंगे और साधक कृतकृत्य हो जायगा।
*जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिप्रपञ्चो यः प्रकाशते ।*
*तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वपाशैः प्रमुच्यते ।*
जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिकाल में जो कुछ प्रपंचरूप में दिखलायी देता है, उसका अधिष्ठान ब्रह्म है। इसलिये प्रपंच की सत्ता ब्रह्म की सत्ता से भिन्न या स्वतन्त्र नहीं है। (जैसे चाँदी की सत्ता सीप की सत्ता से तथा साँप की सत्ता चिथड़े की लीरी की सत्ता से भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार उससे स्वतन्त्र भी नहीं होती।) इस सारे प्रपंच का अधिष्ठानरूप जो ब्रह्म है, वही मैं स्वयं हूँ-यह बात जब संशय-विपर्यय से रहित होकर निश्चय हो जाती है, तब साधक सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है, जन्म-मृत्युरूप संसार से तर जाता है, *'ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति'* -- के अनुसार ब्रह्मरूप हो जाता है।
क्रमशः.......✍
*🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

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