Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣4️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 1
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐
“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे
मैं वैदेही !
उस सन्ध्या को एकाएक शत्रुघ्न कुमार आये थे ।
12 वर्ष के बाद आये ……..मथुरा से आये थे ।
कुश लव नही थे आश्रम में ………….वो अल्हड़ , वो अभय बालक ज्यादा रहते ही कहाँ हैं मेरे पास ……….
मैं अनाज पीस रही थी ….तभी मैने देखा महर्षि के साथ कुमार शत्रुघ्न ।
महर्षि स्वयं लेकर आये थे उन्हें मेरे पास ………….कुमार शत्रुघ्न को मेरे पास छोड़कर चले गए …….”आज रात्रि मेरी कुटिया में ही विश्राम करना कुमार ! ” इतना बोलकर जानें लगे तो कुमार नें हाथ जोड़कर कहा …..क्षमा करें महर्षि ! ……मुझे रात्रि में ही अयोध्या पहुँचना है ।
.महर्षि नें ज्यादा आग्रह नही किया ……”राजाओं से प्रजा प्रार्थना ही कर सकती है कुमार !”
मुस्कुराते हुये इतना कहकर वो चल दिए थे ।
मैने देखा कुमार शत्रुघ्न को और पूछा……….कैसे हो कुमार ?
मेरे सामनें साष्टांग दण्डवत की मुद्रा में थे …….भाभी माँ ! आपके आशीर्वाद से सब ठीक है …………।
मैने कुशासन सामनें रखा शत्रुघ्न कुमार के ।
मैं आया था जब ये आश्रम प्रफुल्लित था ……हमारे आर्य को पिता बनानें के लिये आपका धन्यवाद ।
श्रुतकीर्ति कैसी है ? मेरा पहला यही प्रश्न था ।
सजल नयन से मेरी ओर देखा कुमार नें …….फिर कुछ देर चुप रहे …….वो भी आयी है …….रथ में बैठी है ।
यहाँ क्यों नही आयी ?
वो आपको इस अवस्था में देख नही सकेगी………….इसलिये ।
मैने आग्रह नही किया…….इसलिये नही किया कि उस छोटी को मैं जानती हूँ…….मेरी लाड़ली बहन है वो…….उसे दुःख होता, मुझे वनवासिनी के रूप में देख कर…………मैं चुप हो गयी ।
अब कहाँ जाना है मथुरा या अयोध्या ?
नही भाभी माँ ! मथुरा राज्य मैने 12 वर्ष तक संचालित किया …….वो भी आर्य की आज्ञा से …….श्रुतकीर्ति को भी मैने वहाँ रखा था अपनें साथ ……..पर …………कुमार शत्रुघ्न बोलते बोलते रुक गए ।
पर ? पर क्या कुमार ?
उसे महारानी बनना अच्छा नही लगता …………..वो कहती है महारानी तो एक मात्र मेरी जीजी हैं………मुझे नही बनना ये महारानी ।
मथुरा का राजा मैं था………पर श्रुतकीर्ति महारानी के रूप में कभी सिंहासन में नही बैठी……..भाभी माँ ! मेरा भी मन नही लगता था मथुरा में ……….मैने आर्य श्रीराम के चरणों में प्रार्थना की ……..बार बार प्रार्थना की …….तब जाकर उन्होनें मुझे अयोध्या में बुलाया है ।
मेरे पुत्रों की और से आपके चरणों में प्रणाम …..कुमार नें सिर झुकाया ।
मैं चहक उठी, तुम्हारे पुत्र हुए हैं ? मेरी छोटी श्रुतकीर्ति माँ बनी है !
मुझे आनन्द आ रहा था………क्या नाम रखा है ? मैने पूछा ।
“सुबाहु और श्रुतसेन”……..कुमार नें संकोच के साथ उत्तर दिया ।
क्रमशः….
शेष चरित्र कल…..!!!!
🌹 जय श्री राम 🌹
[] Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼
*💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*
*भाग - ७५*
*🤝 ४. चिन्तन 🤝*
_*पुरुषार्थ*_
*दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि ।*
तल्लब्ध्वा परलोकार्थं यत्नं कुर्याद् विचक्षणः ॥
यह मानव-शरीर जो आज अनेकों पुण्यों के प्रताप से और ईश्वर की कृपा से मिला है, अत्यन्त मूल्यवान् होने के कारण बहुत दुर्लभ है। इसको देवदुर्लभ भी कहते हैं; क्योंकि देवता भी मानव-शरीर पाने के लिये सदा उत्सुक रहते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य के सिवा सभी योनियाँ—यहाँतक कि देवादि योनि भी केवल भोगभूमि हैं। अर्थात् उन-उन जन्मों में जीव को प्रायः केवल प्रारब्ध-प्राप्त भोग-भोगकर शरीर को छोड़ देना पड़ता है। उन शरीरों में कोई भी नया कर्म करके परलोक सुधारने की योग्यता नहीं होती। ऐसी योग्यता केवल मानव-शरीर में ही है और इस कारण यह कर्मभूमि कहलाती है। ऐसे दुर्लभ मानव-शरीर को पाकर परलोक सुधारने के लिये पुरुषार्थ करने में ही मानव-जीवन की सार्थकता है। इसी कारण श्रीव्यासजी कहते हैं, कि *'जो मनुष्य वर्तमान जीवन में परलोक सुधारने का प्रयत्न करता है, वही विचक्षण या बुद्धिमान्, समझदार या चतुर है और जो पुरुष परलोक का विचार न करके इस लोक में ही सुख-साधन प्राप्त करने के लिये जीवन व्यतीत करता है, उसे तो मूर्ख ही जानो।'* श्रीशंकराचार्य भी कहते हैं-
*दुर्लभं त्रयमेवैतद् दैवानुग्रहहेतुकम् ।*
*मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥*
*इस जगत् में तीन पदार्थ दुर्लभ हैं* और वे दैव के अनुग्रह के बिना नहीं मिलते। *मनुष्य-जन्म प्राप्त होना बहुत ही दुर्लभ है*; क्योंकि इसी शरीर से नर नारायण हो सकता है। *इससे भी बहुत दुर्लभ है मुक्ति-प्राप्ति की इच्छा होना*; क्योंकि मनुष्य-जन्म तो पूर्वजन्म के पुण्य के योग से मिल जाता है, पर यदि संसृतिचक्र से मुक्त होने की इच्छा ही जाग्रत् न हो तो मनुष्य-जन्म को यों ही गया समझो और *सबसे अधिक दुर्लभ है उन सद्गुरु की प्राप्ति*, जो मार्ग दिखलाते हैं। मनुष्य जन्म मिला हो, मुक्त होने की इच्छा भी हो, परंतु यदि मार्ग-दर्शक सद्गुरु न मिलें तो कोई साधन नहीं हो सकता और हाथ में आया अमूल्य अवसर यों ही चला जाता है। इसलिये आज हमें *पुरुषार्थ के स्वरूप* के विषय में विचार करना है, जिससे उसका सम्पादन भलीभाँति हो सके और सोचे हुए फल की प्राप्ति में विलम्ब न हो।
*यह पुरुषार्थ है कर्मज*। इस जन्म में मनुष्य समझदार होने के बाद जो-जो कर्म करता है, वह उसका *पुरुषार्थ* कहलाता है। ऐसे कर्म को शास्त्रीय भाषा में *‘क्रियमाण कर्म'* कहते हैं और इसका अर्थ है कि वर्तमान जन्म में समझ के साथ होनेवाले कर्म ।
क्रमशः.......✍
*🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣4️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 2
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐
“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे
मैं वैदेही !
मथुरा का राजा मैं था………पर श्रुतकीर्ति महारानी के रूप में कभी सिंहासन में नही बैठी……..भाभी माँ ! मेरा भी मन नही लगता था मथुरा में ……….मैने आर्य श्रीराम के चरणों में प्रार्थना की ……..बार बार प्रार्थना की …….तब जाकर उन्होनें मुझे अयोध्या में बुलाया है ।
मेरे पुत्रों की और से आपके चरणों में प्रणाम …..कुमार नें सिर झुकाया ।
मैं चहक उठी, तुम्हारे पुत्र हुए हैं ? मेरी छोटी श्रुतकीर्ति माँ बनी है !
मुझे आनन्द आ रहा था………क्या नाम रखा है ? मैने पूछा ।
“सुबाहु और श्रुतसेन”……..कुमार नें संकोच के साथ उत्तर दिया ।
कितनें बड़े हैं ?
एकादश वर्ष के हैं……….अपनें अग्रज “कुश लव” से एक वर्ष छोटे ।
कुमार नें मुझे बताया ।
पर भाभी माँ ! कुश लव दिखाई नही दे रहे ? कहाँ गए है ?
कुमार ! वनवासी हैं ये बालक तो ………..अल्हड़ हैं और अभय हैं ……इसलिये कब आयेंगें कहाँ गए मुझे पता नही रहता ।
महर्षि ही शिक्षा दे रहे हैं उन बालकों को ……………..और बड़ा वात्सल्य है उनके मन में ……………..।
आपका मैने वनवासिनी के रूप में चित्रकूट में दर्शन किये थे भाभी माँ ! …….पर वहाँ आप मुझे तपश्विनी लग रही थीं !
यहाँ कैसी लग रही हूँ कुमार ?
मैने सहजता में पूछा ।
यहाँ आप मुझे जगत्जननी लग रही हैं……..महिमामयी लग रही हैं ।
सजल नयन हो गए थे कुमार शत्रुघ्न के ………….
“अपनें प्राणधन श्रीराम के वियोग की अग्नि को अपनें हृदय में छुपाये आप विश्व् को प्रकाश बाँट रही हैं भाभी माँ ! “
कुमार और भी बहुत कुछ कहनें जा रहे थे ………….पर मुझे कहाँ प्रिय थी अपनी स्तुति ……….।
“सम्राट का मंगल हो” मौन होकर मेरी ओर से प्रणाम निवेदित कर देना आर्य श्रीराम के चरणों में……..कुछ मत कहना मुझे कोई शिकायत नही है उनसे ।
कुमार शत्रुघ्न रोते रहे मेरे पाँव में ही उनकी दृष्टि थी ।
एक बार देख लेता अपनें कुश लव को ……..मेरी बहुत इच्छा थी ।
कुमार से मैने इतना ही कहा …….आज रात्रि रुक सको तो ही उन्हें देखना, मिलना सम्भव है …….वो बालक अरण्यवासी हैं कुमार ।
कुमार शत्रुघ्न का रुकना सम्भव नही था …….उन्होंने अपनें आर्य को बता दिया था कि वो रात्रि तक अयोध्या पहुँच जाएंगे ।
क्रमशः….
शेष चरित्र कल…..!!!!
🌹 जय श्री राम 🌹
[] Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼
*💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*
*भाग - ७६*
*🤝 ४. चिन्तन 🤝*
_*पुरुषार्थ*_
अधिकांशतः देखा जाता है कि मनुष्यमात्र की प्रवृत्ति सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति के लिये ही होती है, परंतु सुख कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है, इसका ज्ञान न होने के कारण वह अनेकों व्यर्थ और परस्परविरुद्ध प्रवृत्तियों में फँस जाता है, फलतः सुख के बदले दुःख की परम्परा में जकड़ जाता है। ऐसे मनुष्यों की स्थिति समझाते हुए श्रीव्यासजी कहते हैं-
*शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च।*
*दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥*
इस जीवन में मनुष्यों को दिन-प्रति-दिन सहस्रों शोक के प्रसंग आते हैं और सैकड़ों भय के भी प्रसंग आते हैं। अविवेकी पुरुष ऐसे प्रसंगों में घबरा जाते हैं और कभी-कभी न करने योग्य कार्य कर बैठते हैं। इसके विपरीत विवेकी मनुष्य उसमें रास्ता निकालकर अपने जीवन को शान्तिपूर्वक बिताता है।
इसीलिये शास्त्रों ने मनुष्य के लिये चतुर्विध पुरुषार्थ की योजना बनायी है। सूक्ष्मदृष्टि से देखनेपर यह प्रत्यक्ष दिखायी देगा कि मनुष्य-जीवन की सारी प्रवृत्ति इन चार के अन्तर्गत आ जाती है। इस *चतुर्विध पुरुषार्थ के स्वरूप हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष*। यह मनुष्य जीवन की एक सर्वांग योजना है। अब प्रत्येक अंग के स्वरूप को समझें।
(१) धर्म– धर्म का स्वरूप इतना अधिक व्यापक है कि इसके बारे में पुस्तकें लिखी जायँ तो भी इसका सर्वप्रकार से विवेचन होना सम्भव नहीं है। यहाँ तो महिम्नः स्तोत्र में श्रीपुष्पदन्त के इस कथन को दुहराकर विराम करना पड़ता है-
*लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥*
अर्थात् 'सरस्वती स्वयं यदि विपुल साधन-सामग्री लेकर सदा लिखा ही करें तो भी, हे भगवन्! तुम्हारे गुणों का पूरा-पूरा वर्णन नहीं हो सकता।' धर्म के लिये भी यही बात है। यह सारा विश्व अपने धर्म में ही स्थित है। इसके अन्तर्गत सारे प्राणी-पदार्थ भी अपने-अपने धर्म में ही रहते हैं। अग्नि अपने धर्म उष्णता का त्याग नहीं करता, जल अपना धर्म शीतलता नहीं छोड़ता। सिंह-व्याघ्रादि अपना हिंस्र-धर्म नहीं छोड़ते तथा गाय-बकरी अपनी सीधाई को नहीं छोड़तीं। पत्थर अपनी कठोरता को नहीं छोड़ता। दृष्टि हो तो पत्थर में भी गुण देखा जा सकता है, अतएव सुभाषित कहता है-
*न द्विषन्ति न याचन्ते परनिन्दां न कुर्वते ।*
*अनाहूता न चायान्ति तेनाश्मानोऽपि देवताः ॥*
पत्थर भी पूज्य है, इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि वह किसी से द्वेष नहीं करता तथा किसी से कुछ माँगता नहीं। इतना ही नहीं बल्कि बिना बुलाये वह किसी के यहाँ जाता भी नहीं । इन सद्गुणों से पत्थर भी पूजा जाता है, तो फिर मनुष्य क्यों नहीं पूजा जायगा । इसीसे
धर्म के विषय में कहा जाता है –
*धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥*
धर्म का तत्त्व इतना अधिक गूढ़ है कि इस विषय में हमें उसी मार्ग से चलना श्रेयस्कर है, जिससे महापुरुष लोग गये हैं। अतएव धर्म के विवेचन को आगे के लिये छोड़कर, यहाँ अर्थ, काम और मोक्ष पर विचार कीजिये ।
क्रमशः.......✍
*🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣4️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 3
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐
“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे
मैं वैदेही !
कुमार शत्रुघ्न का रुकना सम्भव नही था …….उन्होंने अपनें आर्य को बता दिया था कि वो रात्रि तक अयोध्या पहुँच जाएंगे ।
फिर आर्य प्रतीक्षा करें ये तो उचित नही होगा ना माँ ?
नही तुमको जाना ही चाहिये ………जाओ कुमार, जाओ !
इतना कहकर मैं उठी ……….कुमार शत्रुघ्न मुझे प्रणाम करनें लगे ।
पर मैने सामनें देखा ………..रथ पर बैठी श्रुतकीर्ति को ।
वो मुझे देख रही थी ……….मेरी छोटी बहन श्रुतकीर्ति !
मेरे कदम बढ़ चले रथ की ओर ………….
ये क्या वो अपनें हार , गहनें सब उतार रही थी ………..और गंगा जी में फेंकती हुयी मेरी ओर बढ़ी …………
मर्यादा मेरी बहनों को अच्छे से आता है …..मुझ वनवासिनी के सामनें कैसे गहनों से लदी वो आती ………….
मैं दौड़ पड़ी उसके पास……………मुझे कुछ सुध नही थी …….बस मेरी “छोटी” मुझे दीख रही थी मेरे सामनें …………
उधर से वो दौड़ी …….जीजी ! जीजी ! वो चिल्लाती हुयी दौड़ी थी ।
पगली है ……….मेरे गले से आकर लग गयी …………हम दोनों बहुत रोये …..बहुत …………हमारे साथ पूरा “अरण्य” भी रो उठा था ।
कैसी है तू ? मैने आँसू पोंछते हुए उसे चूमते हुए पूछा ।
जीजी ! आपके बिना कैसी होंगी मैं !………आप नें जब से अयोध्या छोड़ा है …..तब से अयोध्या अयोध्या कहाँ रहा …….मसान से ज्यादा और कुछ नही है अयोध्या अब ।
जीजी ! हमारी हँसी खतम हो गयी है ………….हँसें वर्षों हो गए …….हर समय आपकी याद आती रहती है …….हिलकियों से रोते हुये बोले जा रही थी ……..।
अयोध्या में माण्डवी हैं …….उर्मिला हैं ……….हम सब अब जड़वत् हो गयी हैं ……..आपकी चर्चा भी नही करती ………मन ही मन में घुटती रहती हैं ……..क्यों की जीजी ! आपकी चर्चा होगी तो आँसुओं की बाढ़ आजायेगी ……..डूब जाएगी इन रघुवँशियों की अयोध्या ।
फिर रहें आर्य राजा राम वहाँ ………………
इससे ज्यादा वो कुछ बोल न पाई …………..उसकी हिलकियाँ रुक नही रही थीं……….जीजी ! आपनें कितना दुःख सहा ……….आपको दुःख के सिवाय कुछ नही मिला ।
मैनें श्रुतकीर्ति को चुप किया …………..छोटी ! वो दोनों कौन हैं ?
मैने देखा – सामनें दो बालक हैं………खड़े हो गए हैं रथ से उतर कर ।
आओ ! इधर आओ………..श्रुतकीर्ति नें अपनें आँसू पोंछे ।
बालक बड़े सुन्दर थे …………..ये दोनों तो कुमार शत्रुघ्न और तेरे बालक लग रहे हैं ? हैं ना ?
मेरे मुख मण्डल में प्रसन्नता फ़ैल गयी थी …………….
वो बालक आये ………..मेरे पैर छुये बड़ी श्रद्धा से ।
मैने उनके सिर में हाथ रखा ……..आयुष्मान् भवः ।
ये सुबाहु और ये श्रुतसेन ……….श्रुतकीर्ति नें बताया ।
जीजी ! इनके बड़े भाई कहाँ हैं ? अयोध्या के युवराज कहाँ हैं ?
मुझे उनसे मिलना है …….जीजी बताओ ना !
मैं कुछ बोलती कि उससे पहले ही एक सुमधुर आवाज अरण्य में गूँज उठी …….
“मिथिला की राजकुमारी की हम कथा सुनाते हैं”
कुश और लव गा रहे थे ………..वो आवाज मुग्ध कर देनें वाली थी ।
“मिथिला की जनक दुलारी की हम कथा सुनाते हैं”
पक्षी शान्त सुन रहे थे ………गंगा नदी मानों रुक सी गयी थी उनकी मोहक वाणी सुनकर …….हिंसक पशु भी प्रेमपूर्ण हो गए थे ।
पर शत्रुघ्न कुमार को आज्ञा थी आर्य की, उन्हें पहुँचना ही था अयोध्या रात्रि में ही …….न चाहनें के बाद भी रोती हुयी श्रुतकीर्ति गयी ….मैं छोटी को देखती रही …..उनके प्यारे बालकों को देखती रही !
शेष चरित्र कल…..!!!!
🌹 जय श्री राम 🌹
Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

*💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*
*भाग - ७७*
*🤝 ४. चिन्तन 🤝*
_*पुरुषार्थ*_
*(२-३) अर्थ और काम*- इसका संक्षेप अर्थ है केवल शरीर-निर्वाह का साधन। अर्थ अर्थात् धन और धन से खरीदने योग्य भोग के साधन, जैसे कपड़े-लत्ते, गहने, घर-द्वार आदि। काम अर्थात् धन से न खरीदे जा सकें; परंतु केवल पूर्व के ऋणानुबन्ध के कारण प्राप्त हुए जीवन के साधन, जैसे माता-पिता, स्त्री-पुत्रादि तथा अन्य सम्बन्धी आदि।
ये साधन प्रत्येक देहधारी के लिये उसके जन्म लेने के पूर्व ही निश्चित हुए रहते हैं। इन्हीं भोगों को शास्त्रों में *'प्रारब्ध'* कहते हैं। योगदर्शन में इस विषय को यो समझाया है- *'सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः'* अर्थात् जबतक कर्माशयरूपी मूल है, तबतक देहरूपी वृक्ष उत्पन्न होता ही रहेगा और उसमें जाति, आयु और भोगरूपी फल लगते ही रहेंगे। तात्पर्य यह है कि जबतक संचित कर्म का नाश नहीं होता, तबतक जन्म-मरण का अन्त नहीं आता। इस प्रकार प्रत्येक देह के उत्पन्न होने के पहले ही उसके प्रारब्ध का निर्माण हो जाता है और उसमें तीन बातें निश्चित हो जाती हैं-(१) कर्मफलभोग (अर्थ और काम) अर्थात् शरीर को कैसे और कितने भोग भोगने हैं, इसका निर्माण हो जाता है, (२) इस भोग के अनुकूल जाति का निर्णय भी हो जाता है और उसीके अनुसार जीव को शरीर भी धारण करना पड़ता है और (३) उस भोग के अनुसार आयु की मर्यादा भी निश्चित हो जाती है। इस प्रकार अर्थ-काम के विषय में मनुष्य को कोई पुरुषार्थ करना नहीं रहता; क्योंकि यह तो जन्म लेने के पहले ही निश्चित हो जाते हैं। पुरुषार्थ करना होता है - केवल धर्मप्रधान जीवन बिताकर मोक्ष की प्राप्ति के लिये ही।
*(४) मोक्ष –* यह बहुत ही सहज काम है। धर्माचरण करके उसके लिये योग्यता प्राप्त करने में ही परिश्रम करना पड़ता है। मोक्ष के लिये कोई बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता। धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीभीष्मपितामह ने मोक्ष का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है-
मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ॥
मोक्ष का किसी देश में वास नहीं है, जिससे वहाँ जाकर उसे प्राप्त किया जाय तथा मोक्ष किसी दूसरे ग्राम में नहीं रहता कि उसे लेनेके लिये वहाँ जाना पड़े। अविद्या के कारण हृदय में जो गाँठ पड़ गयी है, उसके नाश को ही प्राज्ञ पुरुष *'मोक्ष'* कहते हैं।
हम मनुष्य में दो तत्त्व देखते हैं-एक जड़ और दूसरा चेतन है। चेतन तत्त्व आत्मा है और जड़ तत्त्व यह शरीर है। आत्मा जब अपने चेतन-स्वरूप को भूलकर अपने को जड़ देहरूप मानता है, तभी वह जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है। वही जब अपने को शरीररूप नहीं मानकर ऐसा निश्चय कर लेता है कि *'मैं चैतन्यस्वरूप हूँ'*, तब बन्धन से मुक्त हो जाता है और इस स्थिति को *'मोक्ष'* कहते हैं। तात्पर्य इतना ही है कि *'मैं देह हूँ'* यह भ्रान्ति ही हृदय की गाँठ है और *'मैं आत्मा हूँ'* ज्ञानपूर्वक ऐसा निश्चय होना (केवल बोलना ही नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय होना) हृदय की गाँठ का खुलना कहलाता है और यही मोक्ष है- यह वहाँ बतलाया गया है। इस प्रसंग को योगवासिष्ठ में इस प्रकार समझाया गया है-
अनात्मन्यात्मधीर्बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
बन्धमोक्षौ न विद्येते नित्यमुक्तस्य चात्मनः ॥
देहादि अनात्मपदार्थों में आत्मबुद्धि होना ही *'बन्धन'* है और उसका नाश *'मोक्ष'* कहलाता है। तात्पर्य यह कि *'मैं शरीर हूँ'* यह मानना ही बन्धन का स्वरूप है, अतएव *'मैं आत्मा हूँ'* ऐसा संशय विपर्ययरहित दृढ़ निश्चय होना ही मोक्ष का स्वरूप है। आत्मा तो स्वरूप से ही नित्यमुक्त है, अतएव उसमें बन्ध-मोक्ष की कल्पना ही नहीं होती, यदि होती है तो वह भ्रम है।
क्रमशः.......✍
*🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877