Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣6️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 1
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
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“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !
हे सीता पुत्री ! शम्बूक का वध करनें के बाद राजा राम का मन ग्लानि से भर गया था ……देवर्षि नारद नें बहुत प्रयास किया ….पर श्रीराम का मन शान्त नही हो पा रहा था ।
महर्षि वाल्मीकि मुझे ये घटना सुना रहे थे ।
देवर्षि ! यहाँ से ऋषि अगत्स्य का आश्रम निकट लग रहा है मुझे ……अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं ऋषि के दर्शन करता हुआ अयोध्या जाना चाहता हूँ ।………….हे पुत्री ! देवर्षि नारद जी से आज्ञा लेकर राजा राम अगत्स्य आश्रम में आ गए थे ।
ऋषि अगस्त्य बहुत प्रसन्न हुए …..उनकी धर्मपत्नी लोपामुद्रा उनके भी आनन्द का ठिकाना नही था ……।
हे राम ! क्या कारण है आपका मुख मण्डल उदासी से भरा हुआ है ?
तब राजा राम नें “शम्बूक वध” की पूरी घटना सुनाई ऋषि अगत्स्य को………तब ऋषि अगत्स्य नें प्रेम से राजा राम को झिड़का –
अज्ञानी के समान कैसे तर्क कर रहे हो हे राम !
तुम तो स्वयं आत्मज्ञान से भरे हुये हो ……सच्चिदानन्द स्वरूप तुम्हारा है फिर अज्ञ की तरह बातें करना शोभा नही देता आपको ।
शम्बूक के तप से देवता भी दुःखी थे ……..वो जबरन उनके स्वर्ग में जाना चाहता था …….देवताओं के भोगों में अपना अधिकार जमाना चाहता था …………क्या ये उचित था ? ऋषि अगत्स्य नें राजा राम से ही पूछा ।
पर राजा राम कुछ नही बोले ……बस हाथ जोड़कर बैठे रहे ।
इस तरह म्लान मुख बनाकर बैठनें से हे राम ! कुछ लाभ नही होगा ….इसलिये इस दुर्बलता को हटाइये ।
आप सत्य कह रहे हैं……….हे भगवन् ! पर मानव की मर्यादा तो यहाँ टूटती है ना ? एक तपस्वी का वध ! भले ही वह शुद्र हो ….पर वो था तो तपश्वी ही ……….।
राजा राम नें ऋषि अगत्स्य को अपनें हृदय की बात बताई ।
हे राम ! ये क्यों भूल रहे हो कि आप एक राजा भी हो ….प्रजा का मंगल देखना ये भी तो आपका कार्य है ना !
क्रमशः….
शेष चरित्र कल…..!!!!
🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹
Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼
*💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*
*भाग - ८१*
*🤝 ४. चिन्तन 🤝*
_*प्रारब्ध*_
*इस तरह का संघर्ष जागने ही न पाये, इसीके लिये ऋषि-मुनियों ने वर्ण-व्यवस्थाका निर्माण किया था। जो मनुष्य जिस वर्ण में जन्मा हो, वह अपने धर्म के अनुसार ही अपनी आजीविका प्राप्त करे। बढ़ई का लड़का बढ़ई का ही काम करे और दर्जी का लड़का दर्जी का, लोहार का लड़का लोहेका काम करे और कुम्हार का लड़का मिट्टी के बरतन बनाये। इसमें एक दूसरे से ऊँचा है, ऐसी कोई भावना ही नहीं थी, क्योंकि प्रत्येक वर्ण अपने-अपने काम के गौरव का अनुभव करता और अपनी कला को खूब विकसित करता । आज इस व्यवस्था को सुधार के नामपर मिटा दिया गया है और व्यक्ति-स्वातन्त्र्य के नामपर यह निश्चय कर दिया गया है कि कोई भी आदमी, अपने को अच्छा लगे वही धन्धा कर सकता है। फलतः हम अपनी आँखों से देखते हैं कि आज आजीविका के लिये संघर्ष अत्यन्त तीव्र होता जा रहा है, परंतु अबतक हमारे दुःख का अन्त नहीं हुआ और इस दिशा में किसी की आँख नहीं खुलती।*
यों वर्ण-व्यवस्था के द्वारा समाज-रचना सुदृढ़ बनाकर, अन्तिम ध्येय मोक्ष की प्राप्ति के लिये आश्रम की व्यवस्था बनायी गयी थी। चाहे जिस वर्ण का मनुष्य आश्रम में रहता हुआ मोक्ष-साधना कर सकता है। अन्तिम ध्येय को प्राप्त करने में सबको समान अधिकार है, यहाँ पूर्ण वैयक्तिक-स्वातन्त्र्य है।
*क्रिया शरीरोद्भवहेतुरादृता प्रियाप्रिये ते भवतः सुरागिणः ।*
*धर्मेतरा तत्र पुनः शरीरकं पुनः क्रिया चक्रवदीर्यते भवः ॥*
यह उत्तरगीता का श्लोक है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कर्मरूपी बीज न हो तो शरीररूपी वृक्ष उत्पन्न ही न हो, उग ही न सके। अर्थात् जीव के शरीर धारण करने का कारण प्रारब्ध-भोग के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। कर्माशय न हो तो फिर प्रारब्ध का निर्माण ही कैसे हो, जिसको भोगने के लिये जीव को भोगानुरूप शरीर धारण करना पड़ता है? सुख प्राप्त करने की आशा से जीव अहंकारपूर्वक कर्म करता है और परिणाम में जिस कर्म के फलस्वरूप सुख की अनुभूति होती है, उसमें उसका राग हो जाता है और जहाँ दुःख का अनुभव होता है, उसके प्रति द्वेष हो जाता है। *'सुखानुशयी रागः, दुःखानुशयी द्वेषः ।'* आगे चलकर इन राग-द्वेष के जोड़ों से धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य आदि के अनेक द्वन्द्व उत्पन्न हो जाते हैं और जीव जन्म-मरण के चक्र में जकड़ जाता है। बीज से जैसे वृक्ष उत्पन्न होता है और वृक्ष में से फिर अनन्त बीजशक्ति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार कर्म का फल भोगने के लिये शरीर उत्पन्न होता है और शरीर से फिर असंख्य कर्म होते हैं, जिनको भोगने के लिये जीव को अनेक शरीर धारण करने पड़ते हैं, इस प्रकार वर्तमान में हमने जो शरीर धारण किया है, वह प्रारब्ध-कर्म का फल भोगने के लिये ही है। अतएव प्रारब्ध का स्वरूप क्या है, इसको देखनेका प्रयत्न यहाँ किया जायगा।
*प्रारब्ध भी है तो कर्म ही, अर्थात् वस्तुतः 'प्रारब्धकर्म' यह शब्द प्रयोग होना चाहिये, परंतु कर्म शब्द अध्याहार रह जाता है और केवल प्रारब्ध शब्द रूढ़ि रह गया है।*
गीता कहती है कि *'न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्'* (३/४) अर्थात् कोई देहधारी क्षणभर भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता तथा पुन: *'शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः'* (३/८) अर्थात् शरीर का निर्वाह भी कर्म किये बिना नहीं हो सकता। इस प्रकार कर्म करना तो अनिवार्य है, अतः पहले कर्म का स्वरूप समझना चाहिये। तभी प्रारब्ध का स्वरूप समझ में आयेगा।
क्रमशः.......✍
*🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*

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