Explore

Search

August 30, 2025 1:07 am

लेटेस्ट न्यूज़

કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

Advertisements

श्री सीताराम शरणम् मम, भाग 166 भाग3 तथा अध्यात्म पथ प्रदर्शक 83: Niru Ashra –

[] Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣6️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 3

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

हे राम ! शम्बूक के वध की ग्लानि आपके मन से जा नही रही …..इसलिये अब मैं तो यही कहूँगा कि आप “अश्वमेध” यज्ञ करें ।

इससे आपकी प्रजा भी प्रसन्न होगी ………और आपके राज्य में सबकुछ अनुकूल रहेगा ……………

इस बात से सन्तुष्ट दीखे राजा राम ।

और हाँ शम्बूक वध की ग्लानि भी आपके मन से निकल जायेगी ।

ये बात मुस्कुराते हुये ऋषि अगस्त्य नें कहा था ।

राजाराम का चित्त अब प्रसन्न हो गया था ………………

मैं अब “अश्वमेध” करूँगा ऋषि ! आपकी आज्ञा का पालन करूँगा ।

सिर झुकाकर श्रीराम नें ऋषि को प्रणाम किया और वापस अयोध्या लौट आये थे ।

पुत्री सीता ! अयोध्या आकर गुरु वशिष्ठ जी को सारी बात बताई ……….आप आज्ञा दें गुरुवर ! मैं अश्वमेध करना चाहता हूँ ।

राजा राम नें प्रार्थना की ………..।

बहुत प्रसन्न हुए गुरु वशिष्ठ ……………हाँ अश्वमेध करना ही चाहिये राघवेन्द्र आपको ……..।

प्रसन्नता पूर्वक अपनें महल में चले आये थे राजा राम ।


क्या अश्वमेध यज्ञ करनें जा रहे हैं आर्य श्रीराम , लक्ष्मण के प्रसन्नता का ठिकाना नही था ………आप सच कह रहे हैं प्राणनाथ !

उर्मिला पहली बार नाच उठी थी ……..श्रुतकीर्ति …माण्डवी सब प्रसन्न हो गयी थीं …….आर्य ! यज्ञ कर रहे हैं ।

पर तुम लोग इतनी प्रसन्न क्यों हो ? लक्ष्मण नें पूछा ।

यज्ञ बिना धर्मपत्नी के कैसे सम्भव है ?

तो क्या हमारी जीजी आयेगीं अयोध्या ? श्रुतकीर्ति नें उछलते हुए पूछा …………..।

और क्या ! आएँगी ही …….उनके बिना आये यज्ञ कैसे सम्भव है ?

पुत्री ! सीता ! ये बात अयोध्या में फ़ैल गयी है …………कि राजाराम यज्ञ करेंगें …………और अपनी धर्म पत्नी सीता को वनवास से बुलवायेंगें ………….।

महर्षि वाल्मीकि प्रसन्नता से ये बात बता रहे थे ……..पर मुझे नही लग रहा था कि अब मैं अयोध्या जाऊँगी ………..अब मुझे लग क्या रहा था ? मैं बिना कुछ बोले बैठ गयी थी धरती पर …..और अपनी माँ धरती को सहला रही थी ………।

शेष चरित्र कल…..!!!!

🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹
Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ८३*

               *🤝 ४. चिन्तन  🤝*

                        _*प्रारब्ध*_ 

   अब यह देखना है कि कौन-से कर्म संचित में शामिल नहीं होते। बेसमझ बालक और ज्ञानी- आत्मज्ञानी के द्वारा होनेवाले कर्म संचित में नहीं जाते; क्योंकि वे कर्म कर्तापन के अहंकार और फलाशा से रहित होते हैं, इस कारण उनकी गणना कर्मों में नहीं होती। इस कारण भुने हुए बीज के समान उनमें भावी अंकुर ही नहीं निकलता और संचित में जाने का कोई प्रयोजन नहीं रहता। जो कर्म श्वासोच्छ्वास की क्रिया के समान फल की आशा के बिना सहज भाव से होते हैं, वे भी संचित में नहीं जाते; क्योंकि भविष्य में उनको कोई फल नहीं देना होता। ये कर्म कैसे होते हैं, इसका बहुत सुन्दर चित्र श्रीयोगवासिष्ठ में इस प्रकार खींचा गया है-

गम्यदेशैकनिष्ठस्य यथा पान्थस्य पादयोः।
स्पन्दो विगतसंकल्पस्तथा स्पन्दः स्वकर्मसु ॥
हम घरसे बाजार जाने के लिये निकले। यह संकल्प हुआ कि पैर अपने-आप हमको बाजार ले जाते हैं और वहाँ जाकर खड़े हो जाते हैं। बीच में दूसरा कोई संकल्प नहीं करना पड़ता, यह प्रतिदिन के अनुभव की बात है। श काम-धन्धे के लिये जानेवाले लोगों को भी ऐसा अनुभव रोज होता है। इसलिये श्रीवसिष्ठ महाराज कहते हैं कि इस प्रकार कोई संकल्प किये बिना जो-जो कर्म होते हैं, वे कर्म कोई फल नहीं देते, इसलिये उनको संचित में जाने की जरूरत नहीं होती।
प्रारब्ध का स्वरूप जानने से पहला और सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि मनुष्य जब निश्चय कर लेता है कि प्रारब्ध में जो भोग लिखाकर लाये हैं, उससे अधिक किसी भी काल में मिलेगा ही नहीं, तब वह यथाप्राप्त सुख-दुःख में समता रखना सीखता है और यों होनेपर उसमें सन्तोष-वृत्ति पैदा होती है। सन्तोष ही सुखी जीवन का रहस्य है, इसलिये उसका जीवन सुखमय स्थिति में बीतता है। योगसूत्र कहता है— ‘संतोषादनुत्तमसुखलाभः ।’ सन्तोष ही वास्तविक और बड़े-से-बड़ा सुख है। श्रीभर्तृहरि भी कहते हैं-
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः ॥

  जिसकी तृष्णा विशाल है, यानी कभी पूरी होती ही नहीं, वही सच्चा दरिद्र है और जब मन में सन्तोष होता है तो गरीबी या श्रीमन्ताई-ये शब्द निरर्थक हो जाते हैं। श्रीतुलसीदासजी भी कहते हैं-
 *'जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान ।'*

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
admin
Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

Leave a Comment

Advertisement
Advertisements
लाइव क्रिकेट स्कोर
कोरोना अपडेट
पंचांग
Advertisements