श्री सीताराम शरणम् मम, भाग 166 भाग2 तथा अध्यात्म पथ प्रदर्शक: Niru Ashra –

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Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग 1️⃣6️⃣6️⃣🌺
मै जनक नंदिनी ,,,
भाग 2

 *(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*

🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐

“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे

मैं वैदेही !

राजा राम नें ऋषि अगत्स्य को अपनें हृदय की बात बताई ।

हे राम ! ये क्यों भूल रहे हो कि आप एक राजा भी हो ….प्रजा का मंगल देखना ये भी तो आपका कार्य है ना !

एक सामान्य मानव के लिये ये भले ही अमर्यादित हो ……..पर आप तो सम्राट है ……..और वो भी चक्रवर्ती सम्राट ।

क्या भूल गए उन दो ब्राह्मण बालकों को ……….जिनकी मृत्यु इसी के कर्म से हो रही थी …….और ऐसे ही कितनें अनिष्ट , आपदा , का सामना करना पड़ता आपकी प्रजा को …….ये क्या उचित होता ।

ऋषि अगत्स्य समझाते जा रहे थे …….हे राम ! दुरात्मा का वध करनें से हजारों पुण्यात्माओं की रक्षा होती हो …….तो उस दुरात्मा के वध को ही हमारे शास्त्रों में उचित कहा है ।

हे पुत्री सीता ! ऋषि अगत्स्य समझा रहे थे राजा राम को ……..पर श्रीराम का हृदय अत्यन्त कोमल है…….वो शम्बूक के वध का प्रायश्चित्त करना चाहते थे……इस बात को ऋषि अगत्स्य ने समझ लिया …………..

हे राम ! शम्बूक के वध की ग्लानि आपके मन से जा नही रही …..इसलिये अब मैं तो यही कहूँगा कि आप “अश्वमेध” यज्ञ करें ।

इससे आपकी प्रजा भी प्रसन्न होगी ………और आपके राज्य में सबकुछ अनुकूल रहेगा ……………

इस बात से सन्तुष्ट दीखे राजा राम ।

क्रमशः….
शेष चरित्र कल…..!!!!

🌹🌹जय श्री राम 🌹🌹

] Niru Ashra: 🌼🌸🌻🌺🌼🍁🌼🌸🌻🌺🌼

        *💫अध्यात्म पथ प्रदर्शक💫*

                      *भाग - ८२*

               *🤝 ४. चिन्तन  🤝*

                        _*प्रारब्ध*_ 

   कर्म का सर्वप्रथम सिद्धान्त यह है-
   *अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।*
   *नाभुक्तं क्षीयते  कर्म  कल्पकोटिशतैरपि ॥*
   'जो शुभाशुभ कर्म किये होते हैं उनके फलस्वरूप सुख-दुःख के भोग भोगे बिना छुटकारा नहीं; क्योंकि कोटि-कोटि कल्प बीत जानेपर भी भोगे बिना कर्म का नाश नहीं होता। कर्म का फल भोगने से बचने का कोई उपाय नहीं है।'
   यह बात योगदर्शन में बहुत ही सुन्दर रीति से बतलायी गयी है- *'क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ।'* क्लेश है मूल में जिसके अर्थात् क्लेश है उद्भवस्थान जिसका-ऐसे जो कर्मसमूह हैं, वे ही वर्तमान जन्म तथा भावी जन्म देनेवाले हैं। इससे अगले सूत्र में कहते हैं-
   *'सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ।'*
   जबतक यह कर्माशयरूपी बीज है, तबतक उसके फलरूप में जीव को शरीर धारण करने पड़ते हैं और उस उस शरीर के जन्म के पहले ही उसके भोग का निर्माण हो जाता है। उसीके साथ भोग के अनुरूप योनि निश्चित होती है और भोग के अनुसार आयु की मर्यादा भी निश्चित हो जाती है। इस प्रकार जबतक कर्मबीज है, तबतक शरीर धारण करना अनिवार्य है और शरीर है तबतक कर्म भी अनिवार्य है। इस प्रकार जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। यों योगदर्शन भी, जन्म-मरण के चक्र का कारण कर्म है, यह प्रतिपादन करता है।
   *अब यह देखना है कि प्रारब्ध कैसे बनता है? इससे उसका कार्यक्षेत्र ठीक समझ में आ जायगा। हमने देखा कि कर्म करना अनिवार्य है तथा उसका फल भोगना तो उससे भी अधिक अनिवार्य है। इस प्रकार जबतक शरीर है, तबतक कर्म तो प्रतिदिन हुआ ही करेंगे। इस प्रकार प्रतिदिन होनेवाले कर्म को 'क्रियमाण' कर्म कहते हैं।*
   इन क्रियमाण कर्मों में कुछ तो इतने क्षुद्र होते हैं कि यहीं फल प्रदान करके समाप्त हो जाते हैं। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो तात्कालिक फल नहीं दे सकते, परंतु परिपाक होनेपर फल देते हैं, ऐसे कर्म परिपक्व होनेतक *'चित्त' नाम के गोदाम में इकट्ठे होते जाते हैं। इस प्रकार गोदाम में इकट्ठे हुए कर्मों को *'संचित कर्म'* कहते हैं। यह बात दो-एक दृष्टान्तों के द्वारा समझिये। पानी पीने के लिये प्यास लगी। बैठकर घड़े से पानी लेकर पी लिया। अब यह पानी पीने के लिये किया हुआ कर्म, पानी पीने के साथ यहीं समाप्त हो गया; क्योंकि पानी पी लेना ही उसका फल था, परंतु जब तुम पानी पी रहे थे, उस समय एक अभ्यागत आया और उसने पानी पीने के लिये माँगा। तुमने उसको आदर से बैठाकर ठण्डा पानी बड़े प्रेम से पिला दिया। इसके बदले उसने चाहे तुम्हारा उपकार भी माना हो तो भी इतने से इस कर्म का फल नहीं मिल गया। दूसरे को सुख पहुँचाने वाले कर्म का फल तो उसके पाककाल में ही मिलता है। इसलिये यह कर्म संचित में शामिल हो जायगा और पाककाल की राह देखेगा। तुमने भोजन करने के लिये रसोई बनायी, तैयार होनेपर भोजन करने बैठे और भोजन किया; इसलिये रसोई बनानेका कर्म भोजनरूपी फल देकर यहीं समाप्त हो गया, परंतु उसी समय कोई अतिथि आया और उसको तुमने आदरपूर्वक भोजन कराया, तो उस कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, बल्कि वह परिपक्व होने के लिये संचित में जाता है और पाककाल में किसी अन्य देह का प्रारब्ध बनकर भविष्य में फल देता है।
  *इस प्रकार संचित में ढेर के ढेर कर्म इकट्ठे होते जाते हैं और पाककाल तक वहीं पड़े रहते हैं। ऐसे संचित में पड़े हुए कर्म की गति भी बड़ी विचित्र होती है। उनमें से कुछ ऐसे होते हैं कि एक ही कर्म का फल भोगने के लिये जीव को एक से अधिक देह धारण करने पड़ते हैं।*
   दूसरे कुछ ऐसे भी कर्म होते हैं कि एक ही देह में अनेक कर्मों के फल भोग लिये जाते हैं। जब वर्तमान शरीर का प्रारब्ध समाप्त हो जाता है, तब वह नाश को प्राप्त हो जाता है और उसी समय संचित में जो-जो कर्म फल देने के लिये तैयार हुए रहते हैं, उनको अलग कर लिया जाता

है, इसके बाद उस भोग के अनुरूप एक या अधिक देह निश्चित हो जाती हैं और भोग के अनुसार उन देहों की आयु भी निश्चित हो जाती है। इस प्रकार परिपक्व हुए कर्मों का फल भोगने के लिये जो देह उत्पन्न होती है, उस देह के ये कर्म ‘प्रारब्ध’ कहलाते हैं। इसलिये जिन प्रारब्ध कर्मों का फल भोगने के लिये ही देह उत्पन्न होती है, उनको भोगे बिना कैसे काम चल सकता है? तीर हाथ से छूट जानेपर जैसे वह किसी भी प्रयत्न से लौटकर नहीं आता, उसी प्रकार जिस प्रारब्ध के भोगने के लिये शरीर उत्पन्न हुआ है, उसको भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता।

   क्रमशः.......✍

  *🕉️ श्री राम जय राम जय जय राम 🕉️*
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