🌹 प्यासी आत्मा के लिए एक कुंआ नहीं, कुएं पर कुएं चले आये🌹 रविदास,भाग-16
जय श्री कृष्ण जी।
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मीरा जी को प्रथम गुरु तो राव दूदा जी ही मिले संत प्रेमी के रूप में।पुष्कर जी में जो कोई भी संत आते थे तो पुष्कर जी के हर पुजारी व गलीयों में रावदूदा जी की संत भक्ति की ही चर्चा सुनने को मिलती।इसलिये रावदूदा जी से मिलने संत बरबस मेड़ता में आ ही जाते थे।
🟩एक दिन वृंदावन के एक प्रसिद्ध भक्त गिरधरदास जी श्रीकृष्ण की मूर्ति लिये पुष्कर जी आये और फिर मेड़ता में आये।
राव दूदा जी उन्हें सप्रेम महल में ले आये,जह कई बड़े बड़े संत निवास,उनकी रसोई आदि बनी हुई थी।अतः गिरिधरदास जी को भी संत निवास में ठहराया।
मीरा जी जब दादू से मिलने आई तो दादू गिरिधरदास जी की सेवा में नियुक्त थे,मीरा जी अभी अंदर भी नहीं प्रवेश कर पाई कि उनकी नजर गिरिधर की मूर्ति पर पड़ी तो सांसें रुक गयी और आंखों से अश्रुपात होने लगा।मीरा को देखकर गिरधर की मूर्ति चंचल हो उठी और हिलनी आरम्भ हो गयी।संत गिरधरदास जी ने देखा कि मूर्ति बार बार हिल रही है, मानो भूकम्प आ गया हो,उन्होंने मूर्ति को अपने हाथों से पकड़ लिया और कहने लगे कि अच्छा जी❗भोग देखकर मचलने लगे।रावदूदा जी भी समझ नहीं पाए कि मूर्ति क्यों हिल रही है, वे संत जी व मूर्ति के भोग के लिये रसोई आदि की तैयारी के लिये खड़े हुए कि मीरा को देखा,जिसकी आंखें अश्रु से भरी हुई थी।
दादू समझ गए कि हमारी पौत्री भक्ति में भर गई मूर्ति देखकर।अतः मीरा को गोद में उठाकर वे अपने कमरे में ले आये लेकिन मीरा बार बार गिरधर की मूर्ति लेने की जिद कर रही थी।दादू ने बहुत समझाया,बेटी❗ये मेहमान हैं कल चले जायेंगे,इनकी साधना में विघ्न न पड़े,इसलिये वहां नहीं जाना तुम क्योंकि तुम बोलती बहुत हो,प्रश्नों की झड़ी लगा देती हो तो उनकी भक्ति में विघ्न पड़ेगा।
परन्तु जब दादू के पास शाम को अन्य लोग बैठे थे तो मीरा जी गिरिधरदास जी के पास आकर एकदम स्पष्ट बोली कि आप ये मूर्ति कहाँ से लाये, मुझे दे दो,आप वहीं से दूसरी ले लेना,जहां से ये वाली लाये थे।गिरिधरदास जी ने कहा कि बेटी ये मूर्ति तमाम उम्र मेरे साथ ही रही,अतः यह नहीं दूंगा,तुम्हारे दादू तुम्हें दूसरी लाकर दे देंगे।लेकिन मीरा मूर्ति पकड़कर बैठ गयी,नहीं जी,मैं तो ये ही लेकर जाऊंगी।संत जी ने डांट दिया तो मीरा उदास होकर रोती हुई अपने कमरे में आकर रोती रोती सो गई।रात को गिरधर दास जी के सपने में आकर ठाकुर जी बोले,तुम मुझे लेकर नहीं आये यहाँ, मैं तुम्हें वृंदावन से पुष्कर जी व मेड़ता में लेकर आया हूँ और अब मैं उस मीरा के पास ही रहूंगा,यह मुझे बहुत प्यारी है, इसका मेरा पूर्व जन्म का प्यार है।अब चुपचाप मीरा को मुझे सौंप देना।
🟧गिरधर जी बोले,ठीक है ठाकुर जी,उस बच्ची के भाग्य से आज मुझे आपके साक्षात दर्शन हो गए,मेरा जीवन धन्य हो गया,अब मैं आपके इस साक्षात रूप को हृदय में धारण करके ही जीवन बिताऊंगा।
ठाकुर जी गिरधर के हृदय में समाहित हो गए और बोले कि अब तुम्हें मूर्ति की जरूरत नहीं,तुम पर मेरी कृपा हमेशा रहेगी, जब चाहो,हृदय में मेरे दर्शन हो जाया करेंगे।
🏵️अगले दिन मीरा बेचैन हुई फिर वहीं संत के कमरे के बाहर आकर खड़ी हो गयी।उसे डर था कि साधु महाराज कहीं डांट न दें।लेकिन गिरिधरदास जी ने उन्हें देख लिया और गोद में लेकर बोले,आ बिटिया❗अब ये गिरधर तेरे पास ही रहेंगे।
🏵️मीरा बोली कि ये तो बहुत आंख चलाता है मुझ पर,इसके साथ खेलकर मुझे बड़ा आनन्द आएगा।
🟧गिरधरदास जी ने देखा कि सचमुच मूर्ति की पुतलियां हिल रही थी,पलकें झपक रही थी बार बार पुतली मीरा को देख रही थीं।
ये मूर्ति पहली बार जीवंत देखी तो गिरिधरदास जी ने मीरा के कोमल चरण पर अपने हाथ लगाए और उसकी पग धूल अपने माथे से लगाई।बेटी❗तेरी भक्ति मुझसे ऊंची हैं, मूर्ति व मूर्तिमान दोनों ही मेरे लिए आज हृदय में आ गए।ले अब ये मूर्ति तू रख ले,इनकी सेवा अब तेरे हवाले।
🏵️मीरा बोली,बाबा❗इनकी सेवा कैसे होगी,मुझे कुछ नहीं आता,आप सिखाते जाईये।
🟧गिरिधरदास बोले,बेटी,तेरी दृष्टि से इनकी आंखें चंचल हो उठी तो तेरे भाव से ही ये भाव ग्रहण करेंगे,इसमें सीखने की कोई आवश्यकता नहीं तुझे।तुम इनकी आत्मवत सेवा करो।जो खुद खाओ,सो खिलाओ,जो पियो,सो पिलाओ,जब सोवो,तो इन्हें ऐसे सुलाओ,जैसे तुम अपने को को ही सुला रही हो,तुम्हें तो ये खुद ही सिखा देंगे,बल्कि मैं तो कहता हूँ कि तू जो भी प्रेम से भेंट करेगी,ये उसी में राजी रहेंगे।हम तो संयम नियम ही निभाते रहे,भाव क्या है, ये तो तुमसे ही पता चला।
कहकर गिरिधरदास मीरा के शीश पर हाथ से पुचकारते हुए चले और गिरधर को मुड़ मुड़कर देखते हुए चले।
🛑राव दूदा ने कहा कि मूर्ति छूट गयी आपके कक्ष में,मैं लाकर देता हूँ।
🟧नहीं दूदा जी राव❗मैंने मूर्ति नहीं छोड़ी,मूर्ति ने मुझे छोड़ दिया,अब उस पर मीरा का अधिकार है, रात की सारी बात बताकर संत गिरधर दास जी विदा हो गए।
🏵️मीरा जी को आधार मिल गया,प्रेमी,मित्र,सखा,दिलदार मिल गया।जाकर मूर्ति को एक चौकी पर बिठाया,अपनी अलमारी से सबसे कीमती चूनर निकाली, उसे बिछा कर मूर्ति विराजमान की और चरणों में माथा टेका तो सारे दिन रात बेहोश रही।
राव दूदा जी ने उनकी ये स्तिथि चारभुजारानाथ के सामने भी देखी थी,सो भाव समाधि पढ़कर उन्होंने रात भर उनकी सम्भार की।मीरा की माता कुछ नहीं समझती थी इन बातों को।बस राव दूदा के संग ही मीरा रहती थी अधिक।मूर्ति से मीरा इतनी अधिक संगदिल हो गयी कि उन्हें वह जीवंत ही नजर आते थे।
🌞अब मीरा से मिलने तीसरे गुरु पधारे,ये उस समय के सबसे बड़े योगाचार्य थे परमहंस निवृत्तिनाथ जी,जो योगी ज्ञानेश्वर जी व बहन मुक्ताबाई के बड़े भाई व गुरु भी थे।
वे भी वृंदावन से पुष्कर जी आये तो गिरिधरदास जी ने कहा कि पुष्कर जा रहे हो तो मेड़ता जरूर जाना।वहां राजा रावदूदा जी की पौत्री मीरा जी से जरूर मिलना, दिव्या शक्ति ही है वो।
निवृत्तिनाथ जी पुष्कर जी आये,तो उनकी हर जगह चर्चा हुई तो राव दूदा जी ने अपने बेटे को लेने भेज पुष्कर जी और बड़े सम्मान के साथ निवृत्तिनाथ जी आये।महल में बड़े जोरो से उनका स्वागत हुआ।
मीरा को देखकर निवृत्तिनाथ जी समझ गए कि अद्भुत तेज से व्याप्त यह एक परम योगिनी धरा पर आई है।मीरा जी ने उनके चरण छुए तो मानो निवृत्तिनाथ जी के अंदर से उन्हें करंट लग गया हो,वह झँझरित हो उठी और आंखें ऊपर चढ़ने लगीं।मीरा को राव दूदा जी गोद में उठाकर उसके बिस्तर पर लिटा आये।दो दिन बाद निवृत्तिनाथ जी जाने लगे तो राव दूदा जी ने उन्हें रोक लिया कि मेरी पौत्री को आप योग की शिक्षा देते जाईये,वह प्रेमी भक्त है, यदि आपसे योग सीख लेगी तो उसकी ऊर्जा नियंत्रित हो जाएगी,नहीं तो मुझे चिंता है कि कहीं वह प्रेम में बाँवरी होकर अनियंत्रित न हो जाये।मैं उसका विवाह भी करना चाहता हूं,वह योग सीख लेगी तो गृहस्थ व भक्ति संतुलित हो जाएगी,अन्यथा वह बचपन में बिखरकर पागल सी न हो जाये।लड़की की जाती है, मुझे इस की चिंता लगी रहती है क्योंकि यह असाधारण कन्या जन्मी हमारे घर में।
🔮निवृत्तिनाथ जी ने निवेदन स्वीकार किया और आसन व प्राणायाम आदि सिखाये,जिससे मीरा की कुंडलनी जाग्रत हो उठी और उसका ध्यान अन्तःस्थ हो उठा।
छह महीने बाद निवृत्तिनाथ जी लौट गए मीरा को आशीर्वाद देकर।
🟠अब चौथे गुरु का आगमन मेड़ता में हुआ।
यह भी उस काल के सबसे बड़े संगीताचार्य जी थे,वृंदावन के संत बिहारीदास जी।पांचवे नम्बर पर दीक्षित गुरु रविदास जी मिले थे।
लेकिन बिहारीदास जी ने मीरा जी के सुर को शास्त्रीय विधा दी,उन्हें संगीत में पारंगत किया।मीरा संगीत के लिये तड़फती थी कि कोई मुझे गाने का अभ्यास कराए,इसलिये भगवान ने उनके दिल की सुनी और बिहारीदास जी का आगमन हो गया।
क्रमशः●●●●●●●●●●
जय श्री राधे राधे जी।
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