*श्रीकृष्णचरितामृतम्*-!! दावानल बिहारी !!-भाग 7: Niru Ashra

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!! दावानल बिहारी !!

भाग 7

क्या छबि थी तात ! उद्धव भाव विभोर होकर बोले ।

शताधिक फण थे उस कालियनाग के ……..उस पर त्रिभंगी मुद्रा से खड़े थे वनवारी……..अधरों पर बाँसुरी रखे हुए थे …….मुस्कुराहट अन्य दिनों की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही थी……..नाग मणियों की बहुमूल्य माला नाग पत्नियों नें स्वयं अपनें हाथों से पहनाया था …..उसकी चमक अद्भुत थी ।

आजा ! आजा ! सब ग्वाल सखा पुकार उठे थे ……….उनको जो प्रसन्नता हो रही थी उसका वर्णन करना शब्दों में असम्भव ही है ।

मैया यशोदा के देह में तो मानों प्राणों का पुनः संचार हो गया था ।

लाला ! आजा !

वो भी पुकारनें लगी थीं ।

बलभद्र अपनें वक्ष को चौड़ा करके चल रहे थे ……सबको मानों ये बताना चाहते थे कि ……देखा ! मैने जो कहा था वही सच हुआ ना !

नन्दबाबा तो इतनें प्रसन्न थे कि अतिप्रसन्नता के कारण उनके मुख से शब्द भी नही निकल रहे थे ……………

बाबा !

कालीय नाग के फण से ही कन्हैया अपनें बाबा से बात करनें लगे ।

बाबा ! आप चिन्ता मत करो ….ये कालीय नाग एक करोड़ नीलकमल के पुष्प आज ही मथुरा में पहुँचा देगा……..नन्दबाबा नें जैसे ही अपनें पुत्र के मुख से ये सुना तो आनन्दाश्रु उनके नेत्रों से बह चले थे ।

मनसुख बोला …….लाला ! अब तौ आजा ! या नाग के ही फण में ठाडौ रहेगो !

मनसुख की बातें सुनकर कन्हैया मुस्कुराये …….और नाग के फण से ही कूदे …………सीधे अपनें ग्वाल सखाओं के मध्य में ।

सबसे प्रथम बलराम नें अपनें अनुज को हृदय से लगाया था ।

फिर तो मैया यशोदा ……बाबा नन्द ………सखा वृन्द सब ।

दूर खड़ी है …………….कोई अत्यन्त सुन्दरी ………………..

वो कौन है ? श्रीदामा नें आगे आकर कहा ……..मेरी बहन है …….उसनें जब सुना कि तू कालीदह में कूद गया ………वो उसी समय बरसानें से आगयी थी ।

कन्हैया नें देखा अपनी प्राणप्रिया श्रीराधा को ।

श्रीदामा के पीठ में हाथ रखते हुए अपनी प्रिया को देखते हुए बोले ……पर श्रीदामा ! मैं तेरी गेंद नही ला पाया !

पागल ! तेरे लिये मेरे प्राण भी न्यौछाबर लाला ! गेंद क्या चीज है ।

श्रीदामा बोलता रहा …….कन्हैया आगे बढ़े , श्रीराधा शरमा रही हैं ।

श्रावण मास में बुलवाया है मैने इस कालीय नाग को राधे ! इसी का झूला डालेंगे कदम्ब की डार पे…….सबके सामनें ही अपनी श्रीजी को हृदय से लगा लिया था उस नट नागर नें ।

*क्रमशः….

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