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August 30, 2025 1:03 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 144 !!(1),महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (119),: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 144 !!(1),महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (119),: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

Niru Ashra: 🌲🍁🌲🍁🌲🍁🌲

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 144 !!

श्रीराधारानी द्वारा द्रोपदी को “प्रेमतत्व” की शिक्षा
भाग 1

🌹🙏🌹🙏🌹

यज्ञ की पूर्णाहुति हो चुकी थी …….ब्राह्मणों को दान- दक्षिणा वसुदेव जी द्वारा दिया जा रहा था …………एक तरफ खड़े थे पाण्डव ……पर पाण्डवों की दृष्टि श्रीराधारानी पर ही थी ……….तभी ललिता सखी के कान में श्रीराधारानी नें कहा ……..मुझे यहाँ सबकी दृष्टि चुभ रही है …..मुझे यहाँ से ले चलो ………..ललिता सखी नें हाथ पकड़ा और पीछे अष्ट सखियाँ श्रीजी को लेकर उनके शिविर में चली गयीं थीं ।

आप प्रसन्न हैं ना स्वामिनी ! श्याम सुन्दर से मिलन हो गया ना आपका ! रंगदेवी नें पूछा था ।

मेरी प्यारी सखियों !…….”प्रेम हर जगह नही बहा करता”…………प्रेम के लिये स्थान की भी अपनी महत्ता होती है ।

हँसी श्रीराधारानी ……..यहाँ शंख ध्वनि हो सकती है …..पर प्रेम की वंशी ध्वनि तो वृन्दावन में ही होती है …………..

यहाँ कहाँ मिलन ? मिलन तो वृन्दावन का ही है ………

सखियों ! मुझे अब याद आरही है अपनें वृन्दावन की ……….मुझे याद आरहा है अपना बरसाना ……………मुझे अब ले चलो वहीँ ।

एकाएक भावुक हो उठीं थीं श्रीराधारानी …………

पर ये क्या ? किसी सुन्दरी नें पीछे से चरण छू लिए थे श्रीराधारानी के ……….चौंक गयीं श्रीराधा …….कौन ? कौन हो तुम ?

मैं द्रोपदी ………आपके दर्शनों की अभिलाषा से आयी हूँ ।

हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव से कह रही थीं ।

ओह ! द्रोपदी ? श्रीराधारानी नें हृदय से लगा लिया था ।

तुम मेरे श्याम सुन्दर की सखी हो ना ? चिबुक में हाथ रखते हुए बड़े प्रेम से श्रीराधा बोलीं थीं ।

मेरा सौभाग्य है कि ………श्रीकृष्ण नें इस “कृष्णा” को अपनी सखी माना…….मुझ से मित्रता की…….मैं अपनें आपको धन्य मानती हूँ ।

द्रोपदी कितनी शान्त भाव से बोल रही थीं ।

हे राधिके ! आपके विषय में कौन नही जानता ……….सखा कृष्ण नें ही कई बार आपकी चर्चा की है……..और चर्चा करते हुए बड़े भावुक हो उठते हैं………पर मैने उनकी बातों को कभी गम्भीरता से नही लिया था…….किन्तु ! एक दिन मेरे पतिदेव अर्जुन वृन्दावन चले गए मैने सुना ……..वृन्दावन क्यों गए होंगें …….मैं सोचती रहती थी ……कई दिनों के बाद मेरे पतिदेव लौटकर आये………तब उन्होंने आपके बारे में जो बताया वो विलक्षण था………..आप ब्रह्म की आल्हादिनी हैं ……आप ही प्रेम हैं ……आप सौन्दर्य की देवी हैं ………..हे राधिके ! बहुत कुछ कहा था मेरे पति अर्जुन नें …………आप प्रेम का साकार रूप हैं ………और मैं क्या कहूँ ……….तब से मेरे मन में यही कामना थी ………कि आपके दर्शन कर लूँ एक बार ……….आपके चरण की धूलि अपनें माथे से लगा लूँ ………मेरी इच्छा पूरी हो गयी ……ये कहते हुए द्रोपदी श्रीराधारानी के चरणों में गिर गयी थीं ।

हे अर्जुनप्रिया ! उठो ……….हे याज्ञसेनी ! बताओ क्या जानना चाहती हो …….पर एक बात कहूँ ? मुझे तुमसे शिकायत भी है ……श्रीराधारानी नें कहा था ।

क्रमशः …..
शेष चरित्र कल-

☘️ राधे राधे☘️
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (119)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों में दास्य का हेतु-1

कुण्डल नाचते हैं तो उनकी कपोलों पर पड़ रही परछाईं भी नाचती दीखती है। क्यों न हो कृष्ण स्वयं भी तो नृत्यकलाप्रवीण हैं। इस प्रकार दोनों कुण्डलों की जो श्री है, शोभा है, वह दोनों गण्डस्थलों पर पड़ती है- ऐसा मुखारविन्द है। और श्रीकृष्ण! तुम्हारे अधरों की सुधा लोभजनक है- अधरसुधम् वीक्ष्य। देखो, यह अधरसुधा सायुज्य-मुक्ति को प्राप्त होकर भी भीतर नहीं रहना चाहती, छलकती है। अब महाराज, ‘अधर’ शब्द का ऐसा-ऐसा अर्थ किया है कि अगर वृन्दावन होता तो एक दो अर्थ और सुना देते।

‘कुण्डलश्रीगण्डस्थलाधरसुधं’ उनके अधरों में ऐसी सुधा है जो छलककर कपोलों में चली जाती है। इसमें ऐसा है नारायण! कि गण्डस्थल पर अधरसुधा का वर्णन- यह स्वाभाविक नहीं है। यह तो कहीं से आयी हुई मालूम पड़ती है। तो कुण्डल में लक्ष्मीजी हैं- ‘मण्डितं कनककुण्डललक्ष्म्या’ लक्ष्मीजी ने देखा कि हृदय पर तो मैं स्वर्णिम रेखा बनकर बैठी हूँ और चरणों में रज बनकर बैठी हूँ लेकिन इतने से ही श्रीमती पत्नी का धर्म पूरा नहीं हुआ।

पत्नी का धर्म पाँव की धूल बनने से पूरा नहीं होता, वक्षस्थल की शोभा बनने से भी पूरा नहीं होता; तब? ‘कुण्डलश्रीगण्डस्थलाधरसुधं’ तब लक्ष्मीजी कुण्डलों में आकर बैठ गयीं और बारंबार उसके प्रतिबिम्ब के द्वारा भगवान ने कपोलों का स्पर्श करने लगीं।

अधरसुधा का अर्थ होता है कि अमृत जिसके सामने फीका पड़ जाता है। गोपी कहती हैं कि इस अधरसुधा को हमने देखा भर ही है- इसमें लिया-दिया कुछ नहीं- बस देख-देखके ही हम तुम्हारी दासी हो गयी हैं। हम दासी होवेंगी।+

यह नहीं, हमको दासी बनाओ यह बात भी नहीं, वे कहती हैं कि अब दासी बनाना तुम्हारे हाथ में नहीं है , वह तो हमारे हाथ में आ गया। पहले चाल तुम्हारे हाथ में थी कि तुम स्वीकार करो या न करो; लेकिन बाबा, अब तुम चाहे स्वीकार करो, मत करो- हम तुमसे त्रिवाचा भरवाने नहीं आयी हैं कि तुम हमसे यह कहो कि ‘तुम हमारी दासी हो, दासी हो, दासी हो, और हम तुमको अब कभी नहीं छोड़ेंगे, नहीं छोड़ेंग, नहीं छोड़ेंगे; हम तुमसे यह नहीं कहेंगी कि इसके लिए तुम अग्नि की सौगन्ध करो या गणेश जी को मनाओ और उनके सामने वायदा करो कि हम अब तुमको कभी नहीं छोड़ेंगे- हम तो अपनी ओर से यह बोलती हैं कि ‘भवाम दास्यः’ हम तो तुम्हारी दासी हैं ही चाहे तुम हमको स्वीकार करो या हमको तुम इसी क्षण में छोड़ दो।

हम सापेक्षा प्रेम करने वाली नहीं है। यह बात आगे चलकर बहुत अच्छा रासपञ्चाध्यायी में है। वहाँ आया है कि जो प्रेम करने पर प्रेम करते हैं वे तो ऐसे हैं जैसे पशु-पक्षी आपस में प्रेम करते हैं। और जो-’

भजतोऽपि न वै केचित् भजन्त्यभजतः कुतः ।
आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुहः ।।

प्रेम न करने वाले से प्रेम करना, यह तो वात्सल्य में होता है जैसे माता-पिता प्रेम करते हैं, जैसे सन्त प्रेम करते हैं, जैसे चातक प्रेम करता है, जैसे कुमुदिनी प्रेम करती है- यह एकांकी प्रेम है। यह ऊँची बात है। और दोनों ओर से प्रेम करना यह मामूली बात है, इसमें दोनों का स्वार्थ है। गोपियों का प्रेम कोई संसारियों का, कोई भोगियों का, (कोई रोगियों का, काम-रोगियों का प्रेम) नहीं है; गोपियों का प्रेम तो गोपियों का प्रेम है; उसमें और क्या बात है, यह प्रसंग फिर सुनावेंगे।++

गोपियों में दास्य का हेतु-2

वीक्ष्मालकावृतमुखं………पुलकान्यविभ्रन वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्रीगण्डसथलाधरसुधं हसितावलोकम् ।
दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ।।
का स्त्र्यंग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलैत्त्रिलोक्याम् ।
त्रैलोक्य सौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ।।

‘भवाम दास्यः’ हम तुम्हारी दासी हो रही हैं, पहले श्लोक में कहा था ‘देहि दास्यम्’ हमें सेवा का अवसर दो, हमें दास्य दो; अब यह नहीं कहती हैं कि हमको दास्य दो; गोपियाँ भगवान श्रीकृष्ण से कहती हैं कि हम तुम्हारी दासी हैं- जैसे मीरा बोलती हैं : मीरा दासी जनम-जनम की। हम तो दासी हैं ही । दासी होना रस की उत्पत्ति के लिए आवश्यक है, क्योंकि रस की गति छोटे की ओर होती है। जो बड़ा बनता है या बराबरी करता है या नीचे दबाता है, या डण्डा दिखा के प्रेम लेना चाहता है, उसके प्रति रस का प्रवाह नहीं होता। दास्य सब रसों का मूल है; दास्य में श्रृंगार भी है; और दास्य में जो दास्येजनित सुख में स्थिति है वह शान्त रस भी है। तो असल में जीवन में जो रस का उदय होता है वह निरहम् होने से होता है; अहं का जितना परित्याग होगा रस का उतना ही उदय होगा; वेदान्त की छाया समझो इसको। यदि अंतःकरण निरहम् हो जाय तो उसमें ब्रह्म का आविर्भाव हो जाय, और यदि अंतःकरण निरहम् हो जाय तो उसमें रस का आविर्भाव हो जाय रसो वै सः ब्रह्म रसस्वरूप है।

दास्य शब्द का संस्कृत भाषा में अर्थ है- अपने को उपक्षीण कर देना; किसी के पास ले जाकर अपने-आपको गला देना। तो दास्य माने किसी के स्वामित्व में अपने अहं को गला देना। और इसी अहं के गलने से शान्ति भी आवे, सख्य भी आवे, वात्सल्य भी आवे, श्रृंगार भी आवे; और फिर रस-बिन्दु से बनी अनेक रेखाएँ आकृतियाँ आवें। यदि दास्य नहीं आया- माँ, माँ तो बनती है पर बच्चे के प्रति स्नेह-सेवा नहीं बरतती, मित्र मित्र तो बनता है परंतु अपने सखा के प्रति मैत्री और सेव नहीं देता, कोई पत्नी पति से प्रेम तो करती है परंतु उसको अपना प्रेम और सेवा नहीं देती है- तो रस का उदय नहीं होगा। प्रेम की जड़ विश्वास है, और प्रेमी की अभिव्यक्ति सेवा है। प्रेम सेवा के रूप में प्रकट होता है और विश्वास में से निकलता है।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 36 )

गतांक से आगे –

!! पद !!

  • तिलकनि जू की *

अधिकारि मृगनेंनी विसाला जयंती विजया जया।
बीना बिरजा अष्टमी बनबेलि केलिकलामया ॥

  • रसालिका जू की *

अलबेलिअंगा बालमति सुखसदनि स्यामा सहचरी ।
बिधुवदनी सौंदर्यका रम्या सुरदनी रसभरी ॥

  • बरबेनिका जू की *

सिंगारसुंदरि रायबेली दर्पिका कंदर्पिका।
पुन्यपुंजा भागपुंजा प्रेमपुंजा परमिता ॥

  • सौरसुगंधा जू की *

बृद्धिमान्या रिद्धिरूपा सक्तिरूपा सक्तिनी ।
अवतंसि रहस्यासहचरि पारंगमा रमणस्तनी ॥

  • कामिला जू की *

अणिमावली महिमावली अरु उरबसी बसकारिनी।
सुष्टवेसा सारपुंजा सुकुंतला सिंगारिनी ॥

  • कामनागरी जू की *

क्षेमधामा मोहिताभा मंजुला सारज्ञनी।
अलकनंदा रुक्मकाँगी सेवती सीमंतिनी ॥

  • नागरबेली जू की *

राजहंसी हंसिनी मोरीमयोरी मेंनिका।
कुसुमकलिका कलाकंदा अरबिंदा आनंदिका ॥

  • सुसोभना जू की *

रागरंगा रंगरागा रोहिनी संमोहिनी ।
अमरबेलि सुअभरनी पुनि स्वरनबेलि सुलच्छिनी ।

*ये अद्भुत मार्ग है , रस मार्ग । क्या कहें इसके विषय में । मैं श्रीजनकपुर धाम में हूँ …कहने की आवश्यकता नही कि यहाँ की उपासना भी सखीभाव की ही है । शायद श्रीराम भक्ति की धारा में यहीं से सखीभाव का प्राकट्य है । और एक मात्र जनकपुर की उपासना में ही सखीभाव पाया जाता है । श्रीरघुनाथ जी यहाँ पूरे शृंगार रस में भींगें हैं ..इसलिए यहाँ प्रधान श्रीराम न होकर सिया जू हैं ..और सखियाँ दोनों दुलहा दुलहन को कोहवर में लाड़ करती रहती हैं । मैं दूधमति के तट में बैठकर जब महावाणी जी का चिन्तन करता हूँ ….तो रस तत्व में कोई भेद मुझे मिलता नही है । वैसे भी रस तत्व तो एक ही है । अस्तु ।

कल जब मैं युगल सरकार की छठी सखी श्रीचित्रा सखी जी का वर्णन कर रहा था ….और उनके परिकर का …तब मुझे बहुत अद्भुत लगा ….कि श्रीचित्रा सखी और इनकी परिकर की यही सेवा है -बन ठन के रहना , सजना , सुन्दर बनना ….पूरा शृंगार करना , और युगल के आस पास ही रहना …और सुन्दर बनकर युगल की मीठी बातें सुनना …..उन्हें देखना , और अपने को दिखाना …ताकि सुन्दर सखियों को देखकर युगल को सुख मिले । उफ़ ! इस रस पूर्ण साधना की आप कल्पना कर सकते हैं ? ना भजन , न पूजा-पाठ , न ध्यान ….बस अपने को उनके लिए सजना । हर क्रिया उनको ध्यान में रखकर करना । ये साधना है – रस साधना । गलती हुयी ….कि मात्र प्रस्थान त्रयी ( गीता , ब्रह्मसूत्र और उपनिषद ) को ही हमने सब कुछ मानना आरम्भ कर दिया …क्या सनातन की अविरल बहने वाली धारा में और कुछ नही था ? उन सब पर भी तो चिन्तन होता । सनातन ने तो स्वभाव के अनुसार साधना पद्धति बताई है …यही मनोविज्ञान भी था हमारे सनातन धर्म का …किन्तु हमने क्या किया । उस को भुला दिया । हमारे यहाँ रस साधना जैसी अनेक साधन पद्धतियाँ थीं , और बड़ी प्राचीन ये पद्धति थी ….मनुष्य के सहज – मोह , आसक्ति , अहंकार आदि को ही सीढ़ी बनाकर ईश्वर तक पहुँचने की पद्धति बताई थी । ये कहाँ गयीं ?

हे रसिकों ! ये रस पद्धति भले ही आज लुप्त प्राय हो गयी है …किन्तु मानव जाति को आभारी होना होगा श्रीवृन्दावन के रसिकों का ….जिन्होंने इस अद्भुत रसोपासना को संजोकर रखा …अनधिकारी के हाथों में न जाये …और अधिकारी इसका पूरा लाभ लें , इस पर भी विशेष ध्यान दिया गया । अस्तु ।

                                                          - हरिशरण 

सुन्दर सखियाँ , अति सुन्दर सखियाँ …..सब सज रहीं हैं …..मुख्य छठी सखी जी , युगल सरकार की अष्टसखियों में छठी सखी …श्रीचित्रा सखी जी । इनका हृदय आनन्द से भरपूर था ….ये सजी थीं ….और अभी भी सज ही रहीं थीं । हरिप्रिया जी ने मुझे इनकी अष्ट सखियों में प्रथम सखी जी को दिखाया ….श्रीचित्रा सखी जी की प्रथम सखी ….वो रहीं …..मैंने दर्शन किए ….एक बात समझने की है ….श्रीचित्रा सखी जी की समस्त सखियाँ काम कला में भी पारंगत हैं …युगल को अपनी बातों से मिलन के लिए प्रेरित करती रहती हैं ।

“तिलकनी”जी ….ये श्रीचित्रा जी की प्रथम सखी हैं …..इनकी भी अष्ट सखियाँ …जिनके नाम हैं ….हरिप्रिया जी ने बताया ….मृगनयनी जी , जयन्ती जी , विजया जी , जया जी , बीना जी , विरजा जी , बनवेली जी और केलिकलामया जी । ये सब सखियाँ हंसमुख …रस माधुर्य से भरी ..यौवन मत्त थीं ।

वो दूसरी सखी हैं …..श्रीचित्रा सखी जी की दूसरी सखी ….”रसालिका” जी । इनकी आठ सखियाँ हैं …जिनके नाम हैं ….अलबेलि जी , बालमति जी , सुख सदनी जी , श्यामा सहचरी जी , विधुबदनी जी , रम्या जी , सुरदनी जी और रसभरी जी ….मैंने इनके दर्शन किए तो ये अति सुषमा से भरी , अति उन्मत्त और सुख सनी थीं ।

हरिप्रिया जी ने मुझे बताया ….वो तीसरी सखी हैं …श्रीचित्रा सखी जी की तीसरी सखी ….”वरबेनिका” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं …जो इनके साथ ही हैं …..शृंगार सुन्दरी जी , रायबेली जी , दर्पिका जी , कनदर्पिका जी , पुण्यपुंजा जी , भाग्य पुंजा जी , प्रेम पुंजा जी और परमिता जी ।

ये चौथी सखी थीं ….श्रीचित्रा सखी जी की चौथी सखी ….”सौरसुगंधा” जी । मुझे हरिप्रिया जी ने बताया ….इनकी अष्ट सखियाँ हैं ……वृद्धिमान्या जी , रिद्धि रूपा जी , शक्ति रूपा जी , सक्तिनि जी , अवतंसिका जी , रहस्या सहचरी जी , पारंगमा जी और रमणस्तनी जी । इन सखियों में चपलता थी जिसके कारण ये और सुन्दर लग रहीं थीं ।

पाँचवी सखी हैं ये , श्रीचित्रा सखी जी की पाँचवीं सखी ….”कामिला” जी । हरिप्रिया बोलीं …इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं ….वो रहीं …हरिप्रिया जी ने संकेत में मुझे दिखाया ।

अणिमावली जी , महिमा वलि जी , उरवलि जी , बस करिनी जी , सुष्टु वेशा जी , सार पुंजा जी , सकुंतला जी और सिंगारिनी जी ।

और वो रहीं छठी सखी …..श्रीचित्रा जी की छठी सखी …..”काम नागरी” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं ….क्षेम धामा जी , मोहिताभा जी , मंजुला जी , सार ज्ञनी जी , अलकनंदा जी , रुक्मकांक्षि जी , सेवती जी और सीमंतिनि जी ।

हरिप्रिया अत्यंत प्रमुदित होकर बोलीं ..ये रहीं ..सातवीं सखी श्रीचित्रा जी की …”नागर वेलि”जी ।
इनकी अष्ट सखियाँ हैं ……राजहंसी जी , हंसिनी जी , मोर मयूरी जी , मेनिका जी , कुसुम कलिका जी , कलाकन्दा जी , अरविंदा जी और आनंदिका जी ।

इन सब सखियों को देखकर मेरा हृदय प्रेम पूरित हो गया था …मैं उस वातावरण को , प्रेम पूर्ण वातावरण को देखकर गदगद था । अन्तिम में हरिप्रिया जी ने कहा …ये रहीं श्रीचित्रा सखी जी की आठवीं सखी …”सुशोभना” जी । इनकी अष्ट सखियाँ हैं ….रागरंगा जी , रंगरागा जी , रोहिणी जी , सम्मोहिनी जी ,अमर वेलि जी , सुअभरनी जी , स्वर्णबेलि जी और सुलक्षिणा जी ।

मैं इन सब प्रेम मूर्तियों के दर्शन कर रहा था …और वो सब अपना शृंगार करके प्रिया लाल को रिझाने चल पड़ीं थीं ।

शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
🪻🪻🪻🪻🪻🪻
श्लोक 6 . 43
🪻🪻🪻🪻
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन || ४३ ||

तत्र – वहाँ; तम् – उस; बुद्धि-संयोगम् – चेतना की जागृति को; लभते – प्राप्त होता है; पौर्व-देहिकम् – पूर्व देह से; यतते – प्रयास करता है; च – भी; ततः – तत्पश्चात्; भूयः – पुनः; संसिद्धौ – सिद्धि के लिए; कुरुनन्दन – हे कुरुपुत्र |

भावार्थ
🪻🪻
हे कुरुनन्दन! ऐसा जन्म पाकर वह अपने पूर्वजन्म की दैवी चेतना को पुनः प्राप्त करता है और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से वह आगे उन्नति करने का प्रयास करता है |

तात्पर्य
🪻🪻🪻
राजा भरत, जिन्हें तीसरे जन्म में उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म मिला, पूर्व दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए उत्तम जन्म के उदाहरणस्वरूप हैं | भरत विश्र्व भर के सम्राट थे और तभी से यह लोक देवताओं के बीच भारतवर्ष के नाम से विख्यात है | पहले यह इलावृतवर्ष के नाम से ज्ञात था | भरत ने अल्पायु में ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिए संन्यास ग्रहण कर लिया था, किन्तु वे सफल नहीं हो सके | अगले जन्म में उन्हें उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेना पड़ा और वे जड़ भरत कहलाये क्योंकि वे एकान्त वास करते थे तथा किसी से बोलते न थे | बाद में राजा रहूगण ने इन्हें महानतम योगी के रूप में पाया | उनके जीवन से यह पता चलता है कि दिव्य प्रयास अथवा योगाभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता | भगवत्कृपा से योगी को कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के बारम्बार सुयोग प्राप्त होते रहते हैं |

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