श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! उपासना किसकी, देवता की या भक्त की – “गोवर्धन पूजन” !!
भाग 2
कन्हैया…….यशोदा मैया नें रसोई से बाहर निकाल दिया कन्हैया को……वे रोते रोते बाबा बृजराज के पास गए ।
बड़े प्यार दुलार से अपनी गोद में बिठाया बाबा नन्द नें ……..फिर ताजा माखन खिलाया ……हाँ अब बताओ ! मेरे युवराज को किसनें मारा ?
आँसू पोंछते हुए कन्हैया बोले …….”मैया नें” ।
अरे ! सुनो ! मुझे तिल जौ और समिधा इनकी मात्रा ज्यादा चाहिए ………यज्ञ होगा और वर्षों की अपेक्षा इस बार ज्यादा बड़ा यज्ञ होगा ……अपनें सेवकों को बृजराज नें आज्ञा दे दी थी ।
बाबा ! क्या हो रहा है इस बार हमारे वृन्दावन में ?
सफेद बृजराज की दाढ़ी से खेलते हुए नन्दनन्दन नें पूछा था ।
मेरे लाल ! हम सब बृजवासी मिलकर इस बार देवराज इंद्र की पूजा करनें जा रहे हैं ………अपनें लाला को चूमते हुए नन्द बाबा नें कहा ।
क्यों ?
बड़ी मासूमियत से कन्हैया नें नन्दबाबा के मुख में देखते हुए पूछा ।
हाँ , बाबा ! क्यों ? इन्द्र की ही पूजा क्यों ?
प्रश्न सुनकर चौंक गए नन्दबाबा भी ……..क्या मतलब , क्यों ?
अरे मेरे लाल ! इन्द्र भगवान हैं ……..उनकी हम उपासना करेंगे पूजा करेंगे तो वे खुश होंगे ….और खुश होंगे तो वर्षा होगी …….और हम तो कृषक हैं ना लाला !
बाबा ! इन्द्र देवता है, हाँ देवता का राजा …….यही ना ?
बाबा ! पर इन्द्र भगवान नही है …….क्यों की जो भगवान होता है उसकी पूजा करो या न करो ….वो प्रसन्न होता ही है ।
कन्हैया अपनें बाबा बृजराज को समझा रहे हैं ।
इन्द्र एक देवता है …….इससे ज्यादा और कुछ नही ।
वर्षा इन्द्र के कारण नही होती ………कन्हैया नें अपनी बात कह दी ।
फिर किसके कारण होती है ये वर्षा ? बृजराज नें पूछा ।
गोर्वधन पर्वत के कारण ……वनों के कारण ……..यमुना के कारण …..हाँ बाबा ! यही सच है …………कन्हाई उठकर खड़े हो गए ……बाबा ! इन्द्र अगर हमारी पूजा से प्रसन्न होता है और पूजा न करनें से अप्रसन्न ……तो इसका मतलब …..वो अहंकारी है …….फिर अहंकारी की पूजा क्यों ? नही बाबा ! अहंकारी व्यक्ति कभी भी मेरी दृष्टि में पूज्य नही है ………….और इन को देखो ………मेरे गिरिराज गोवर्धन को …………ये तो भक्त हैं …..परम भक्त ………फल देते हैं …..जल देते हैं …………सबको छाँव देते हैं …………पर कभी आपसे पूजा की माँग की है !…………नही बाबा ! नही ………इनकी तलहटी में हम सब बृजवासी सुरक्षित हैं …………हमारे गौ वत्स सब सुरक्षित हैं …………बाबा ! हमारे पूज्य होनें चाहियें ये गोवर्धन पर्वत ।
तुम कहना क्या चाहते हो ? बृजराज नें कन्हैया से ही पूछा ।
मैं कहना चाहता हूँ अहंकारी की नही ….एक भक्त की पूजा करो बाबा !
मैं ये नियम समस्त जगत को बतानें आया हूँ …………..भक्त सबसे बड़ा होता है …….भक्त वो है …..जो भक्ति से भरा है …और भक्ति का अभिप्राय है सेवा ……….निष्काम सेवा …….क्या गोवर्धन की तरह कोई सेवा करता है ? पक्षियों की सेवा , वनों की सेवा , पशुओं की सेवा …..हम बृजवासियों की सेवा ……….और कुछ नही चाहते ये गोवर्धन पर्वत हमसे, ……निष्काम सेवा – बस ।
बाबा ! तब क्या हमें पूजा इनकी नही करनी चाहिए ? कन्हैया नें बाबा से ही अब पूछा ।
बाबा बृजराज चुप हो गए थे ………क्यों की बात सही थी कन्हैया की ।
*क्रमशः…
