श्रीकृष्णचरितामृतम्-! श्रीकृष्णचन्द्र जु द्वारा शिव धनुष भंग !!-भाग 1: Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! श्रीकृष्णचन्द्र जु द्वारा शिव धनुष भंग !!

भाग 1

“शिव धनुष यही है”

………एक मथुरा के नागरिक नें श्रीकृष्ण और उनकी मण्डली को दिखाया । सब लोग उस विशाल वेदिका में रखे शिव धनुष को देख रहे थे ………..द्वार लगा हुआ है …….भीतर कोई जा नही सकता …..प्रमादरहित होकर सैनिक लोग धनुष की सुरक्षा में लगे हैं ।

हटो हटो,

एक दो बार आकर लाठी दिखाई थी कंस के सैनिकों नें ।

“मामा जी कौ धनुष है देखवे तो दै”………मनसुख बोल उठा था ।

हाँ हाँ ठीक है …….आगे जाओ …..तुम बालकों के मतलब का नही है ये धनुष ………सैनिकों नें आगे बढ़ जानें के लिये कहा ।

आप इधर आइये ………मथुरा के नागरिक नें श्रीकृष्ण को एक तरफ ले जाकर बैठाया था ।

ये जो यज्ञ हो रहा है ……इसी धनुष के लिये ? उस नागरिक से श्रीकृष्ण प्रश्न करते हैं ।

हाँ , इसी धनुष के लिये ………कहते हैं ये धनुष जड़ नही है चैतन्य है …….किसी के हाथों भारी हो जाता है तो किसी के हाथों हल्का ।

शिव धनुष है ये ………और भगवान परशुराम नें राजा कंस को ये धनुष प्रदान किया था …………वो नागरिक बोलता गया ……….कंस का कहना है कि ये धनुष बलि माँगता है ……….इसलिये इस धनुष को बलि चढानें के लिये ही कंस ऐसे यज्ञ का आयोजन करता है ।

पर “औढ़रदानी” का धनुष भला बलि क्यों माँगनें लगा ?
श्रीकृष्ण बोले ।

हाँ , आप सही कह रहे हो……बड़े बड़े मथुरा के विद्वान् भी यही कहते हैं …….नागरिक नें कहा ।……फिर वो विद्वान् समझाते क्यों नही राजा कंस को ? श्रीदामा नें पूछा ।

अपनें प्राण किसे प्यारे नही होते ! कितना भी बड़ा विद्वान् हो प्राणों का मोह तो रहता ही है ……कंस को समझाना मतलब अपनें प्राणों का मोह त्याग देना ……”वो मार देगा”…….नागरिक नें दो टूक कहा ।

“अच्छा , यज्ञ के विषय में बताओ”………..श्रीकृष्ण नें धनुष यज्ञ के बारे में ही सुनना चाहा था ।

हाँ, करीब बारह वर्ष हो गए धनुष यज्ञ नही हुआ ……उससे पहले होता था …….इसलिये तो इस बार कंस नें धनुष यज्ञ ही विशेष रखा है ।

करते क्या है इस धनुष यज्ञ में ? कपोल में हाथ रखकर श्रीकृष्ण पूछ रहे हैं ………वो नागरिक उत्तर दे रहा है ।

रंगेश्वर महादेव का पूजन चलता रहता है …………उधर धनुष का पूजन भी किया जाता है ……….नागरिकों को बुलाया जाता है ………हाँ, समस्त मथुरा की प्रजा को उपस्थित होना ही है इस यज्ञ में ………….

फिर ? श्रीकृष्णचन्द्र जु पूछते हैं ।

फिर “धनुष उठाओ” …………किससे उठेगा धनुष ? नागरिक सामान्य ही तो हैं ……..और ये धनुष तो असामान्य है ……….जो इसे छू लेता है उसकी आधी शक्ति ये खींच लेता है ……ऐसा ये धनुष है ।

फिर ? श्रीकृष्ण को ये सब जानना रुचिकर लग रहा है ।

फिर किसी से धनुष उठता नही है ……….तब राजा कंस स्वयं आता है और जैसे तैसे धनुष को उठाता है ………फिर उसमें बाण लगाता है ।

बाण भी चलाता है इस धनुष से ? मनसुख नें पूछा ।

हाँ …..बाण लगाकर वो छोड़ देता है ।

पर छोड़ता कहाँ है, बाण का लक्ष्य तो होगा ? मनसुख नें ही पूछा ।

नागरिकों के ऊपर …….और जो मर जाए उस बाण से …उसी की बलि चढ़ गई, यज्ञ पूर्ण हुआ ।……..मथुरा का नागरिक ये सब कहकर एकाएक चुप हो गया …….जब श्रीकृष्ण नें देखा कि …सामनें एक सैनिक खड़ा है ……उसी को देखकर ये नागरिक बेचारा डर से चुप हो गया था ।

लाल लाल आँखें दिखाईँ उस नागरिक को सैनिक नें ….कल तेरी बलि चढ़ेगी ….समझे ? धनुष के बारे में क्या बता रहा था तू ?

वो बेचारा नागरिक तो डर गया ………..श्रीकृष्ण नें उसके हाथ को पकड़ा ….और सैनिक की ओर देखते हुये बोले ……….मैं कृष्ण ! राजा कंस का भान्जा ……..ये बात बड़े प्रेम से और मुस्कुराकर बोले थे ।

हृदय में रस घोल दिया था उस सैनिक के, श्रीकृष्ण की वाणी नें ।

क्रमशः …

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