श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! मूर्तिमयी ममता – “उद्धव प्रसंग 13” !!
भाग 1
मैं मूर्तिमयी ममता को अपनें आँखों के सामनें देख रहा था ।
वो बैठीं थीं दधिमन्थन करनें ………..वो बीच बीच में हंसती थीं …..अपनें लाला के किसी लीला का चिन्तन करते हुये …….
उद्धव ! उद्धव ! मुझे नन्दबाबा नें झकझोरा था ……….
मैने बाबा कि ओर देखा ………..तो बाबा बोले …..ब्रह्म मुहूर्त का समय होनें वाला है ……….क्या यमुना स्नान के लिये तुम चलोगे ?
मैनें वात्सल्य की साकार मूर्ति कि ओर देखा ……….फिर बाबा से बोला …..आप जाइए ……मैं स्वयं स्नान के लिये चला जाऊँगा ।
बाबा जब उठे यमुना जानें के लिये…..तो मैया झुंझला के बोली …..सुनिये !…….मत उठाइयेगा लाला को…..उसे सोनें दीजिये ….दिन भर खेलता रहता है…….रात में थोड़ी देर ही सो पाता है ……उसमें भी ये ब्रह्ममुहूर्त ब्रह्म मुहूर्त करके उसे जगा देते हैं ……फिर वो बालक ही तो है…….जिद्द करता है – मैं भी जाऊँगा ….मैं भी जाऊँगा ।
बाबा नें मेरी ओर देखा ……उनके नेत्र फिर भर आये थे …….पर बहने नही दिए……अच्छा ! मेरे सिर में हाथ रखते हुये वो महामना नन्द बाबा यमुना स्नान के लिये चले गए थे ।
तात ! वसुदेव और नन्दबाबा में बहुत अंतर था……देवकी और मैया यशोदा में बहुत अंतर था……उद्धव विदुर जी को ये प्रसंग सुनाते हुये बोले थे ।
वसुदेव जी के चरण भी जब छूते थे श्रीकृष्ण तो मैने उनके मुखमंडल में संकोच सा देखा था …..देवकी माता के चरण जब छूते तो वो भी संकोच करती थीं ……ये बात अब मैं समझ पा रहा हूँ …………कारण ये था ….कि पिता वसुदेव नें चतुर्भुज के रूप में श्रीकृष्ण को कारागार में देखा था ……माता देवकी भी साथ थीं ………..इसलिये श्रीकृष्ण भगवान है …ये बात वसुदेव और देवकी मानते हैं …………और मथुरावासी भी मानते ही हैं …………पर यहाँ कि स्थिति अलग थी …………यहाँ मैया यशोदा भगवान तो क्या ! सुकोमल बालक के सिवा और कुछ भी माननें को राजी ही नही है ।
माधुर्य का सागर यहाँ लहरा रहा था……..पर तात ! मैं बात कर रहा था ऐश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्ण की ……..यहाँ किस की समझ में आती मेरी बातें ।
…मैं श्रीकृष्ण को भगवान मानकर बोल रहा था …..और यहाँ उसे “लाला” ” कान्हा” “कन्हाई” …..यही माना जा रहा था ।
मैया यशोदा की हंसी नें मुझे फिर जगाया…..मैं तो खो गया था ।
“पता है…..एक दिन मैं दधि मन्थन कर रही थी ……लाला आगया …….मेरी मथानी पकड़ कर बोला……..माखन दे ………..अब मैं कहाँ से माखन देती उसे ………….फिर मैने उसे चन्दा दिखाया …….नभ में चन्दा ……….पर लाला तो चंचल …….कहनें लगा “चन्दा दे” ….ये कहते हुए मैया हंस रही हैं ……..ओह ! उनका हँसना ………….
फिर मैने उससे कहा ……..बहु ला दूँगी ………तेरी जैसी छोटी ।
वो तो फिर मचल गया ……कहनें लगा बहु दे ..अभी दे …….मैने उसे लाख समझाया ………….पर माना नही …………
यशोदा मैया कहते कहते भूल भी जाती हैं कि मैं क्या कह रही हूँ ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
