श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! मूर्तिमयी ममता – “उद्धव प्रसंग 13” !!
भाग 2
मैया यशोदा की हंसी नें मुझे फिर जगाया…..मैं तो खो गया था ।
“पता है…..एक दिन मैं दधि मन्थन कर रही थी ……लाला आगया …….मेरी मथानी पकड़ कर बोला……..माखन दे ………..अब मैं कहाँ से माखन देती उसे ………….फिर मैने उसे चन्दा दिखाया …….नभ में चन्दा ……….पर लाला तो चंचल …….कहनें लगा “चन्दा दे” ….ये कहते हुए मैया हंस रही हैं ……..ओह ! उनका हँसना ………….
फिर मैने उससे कहा ……..बहु ला दूँगी ………तेरी जैसी छोटी ।
वो तो फिर मचल गया ……कहनें लगा बहु दे ..अभी दे …….मैने उसे लाख समझाया ………….पर माना नही …………
यशोदा मैया कहते कहते भूल भी जाती हैं कि मैं क्या कह रही हूँ ।
अरे ! देखकर आती हूँ अब तो जाग गया होगा ………ये कहते हुये वो उठीं …….और पालनें के पास जैसे ही गयीं ……..मैं देख रहा हूँ …………पालनें को टटोला था मैया ने……..पर वहाँ कोई नही है ……..
वो धड़ाम से फिर मूर्छित होकर गिर गयीं थीं ।
उद्धव ! आज भी मुझे यहीं दिखाई देता है मेरा लाला ।
उन्हें कुछ देर बाद होश आया था……तब वो झटपट उठकर अपनें को सम्भालते हुये बैठ गयीं थीं …….उनके वक्ष से दूध की धार बह चली थी ……..मूर्च्छा के समय लाला नें ही आकर दुग्ध का पान किया होगा ।
अब बहने की बारी थी नेत्रों कि ……….वो बस बह चले ।
उद्धव ! यही आँगन है जिस आँगन में कभी मेरे लाला कि किलकारियाँ गूँजती थीं ……….पर आज सूनसान है ये आँगन ।
एक दिन यहीं इसी आँगन में माखन रोटी खा रहा था मेरा लाला ………..ठुमक ठुमक नाच भी रहा था ………….तभी एक काक आया और लाला के हाथों से माखन रोटी लेकर उड़ गया ।
वो बहुत रोया था उस दिन …………..मैने उससे कहा …दूसरी रोटी ले ले ……और माखन ले ले …..पर नही ……..उसे काक के ऊपर रिस आरही थी ।………..पर उस दिन की बात मैं भूल नही सकती …..यशोदा मैया बोलीं ………उस दिन उद्धव ! …….. .बस फिर हिलकियों से रोना मैया का शुरू हो गया…….उस दिन उद्धव ! एक मटकी के लिये मैने अपनें लाला को ऊँखल से बांध दिया …….यही हाथ थे ……..अपनें हाथों को पत्थर में मारनें लगी थीं मैया ………….
उद्धव! इसलिये वो मथुरा चला गया …….अब शायद वो नही आएगा ……..पर उद्धव ! उसको कहना …………मैया तुझे अब नही मारेगी ……..कसम खाती हूँ मैं अब मैं कभी नही मारूँगी लाला को ………….उसे जो करना है करे ……….मटकी फोड़ दे . ……पूरे वृन्दावन की मटकी फोड़ से ………..सब गोपियों की मटकी फोड़ से………पर आजा …….आजा लाला ! आजा !
ये कहते हुये मैया फिर रोनें लगी थीं ………मैं स्तब्ध – चकित था ।
सेविकाएँ आगयीं …….मैया यशोदा को वो सब सम्भाल रही थीं ।
मैने उन मूर्तिमयी ममता के चरणों में वन्दन किये ………अरुणोदय होनें वाला था ……नन्दबाबा भी यमुना स्नान करके आगये थे ……मैने बाबा से कहा …….मैं स्नान सन्ध्या इत्यादि करके आता हूँ …………बाबा नें मुझे आज्ञा दी …….मैं चल दिया था …..ओह ! ये वृन्दावन ।
शेष चरित्र कल –
