श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! अद्भुत भ्रमरगीत – “उद्धव प्रसंग 17” !!
भाग 1
प्रेम की साधनावस्था में कुछ मर्यादायें होती हैं…….साधक उन मर्यादाओं का पालन करता हुआ दिखाई देता है …….पर सिद्धावस्था में सारी मर्यादायें टूट जाती हैं……….वहाँ केवल प्रियतम , साधनावस्था में प्रियतम मात्र प्रशंसा का पात्र बना होता है …….प्रिय, प्रेष्ठ, नाथ, बल्लभ, रमण, बस यही पुकार चलती है ………पर सिद्धावस्था में …………इन मर्यादाओं का टूटना स्वाभाविक सा लगनें लगता है ……..फिर जहाँ साधनावस्था में स्तुति ही थी ……..वहाँ सिद्धावस्था में गालियां भी प्रियतम को मिलती हैं ………क्यों की गाली देनें के लिये अब ‘कोई और” बचा ही नही ……..अब तो वही वही है ……….फूल प्रियतम है ……..तो काँटें भी प्रियतम है …….अब अच्छा ही नही …..बुरा भी प्रियतम हो गया है ।
श्रीराधारानी प्रेम की सिद्धावस्था हैं ………तात ! भ्रमरगीत कोई सिद्ध प्रेमी ही गा सकते हैं ………इस तरह की भाषा सिद्धों की ही होती है …..साधक तो प्रार्थना करता है …..पर सिद्ध ………….अब सुनो तात ! भ्रमर गीत ………उस गुन गुन करते हुये भ्रमर को श्रीराधारानी नें जो सुनाया …………मैं तो उस भाव समुद्र की थाह ही न पा सका था ।
उद्धव विदुर जी को अब ये अद्भुत प्रेमगीत सुना रहे थे ।
गुन गुन गुन ………..
वो भ्रमर फिर लौट आया था ……..और श्रीराधारानी के चरणों को चूमनें लगा था ……………….
हट्ट ! अरे कपटी के यार ! तू फिर आगया …….मैने कहा ना ! तू जा यहाँ से ……..क्यों बार बार आरहा है रे ! जा !
श्रीराधारानी डाँटते हुये कहती हैं ।
ओ ! अब मैं समझी तू ये गुन गुन करके हमें अपनें मित्र की कथा सुना रहा है ! पर नही , हमें नही सुननी ……बहुत सुन लिया ……बहुत गा लिया ……….बहुत देख लिया तेरे यार को …….अब बस हमें क्षमा कर और जा ………..अपनें मित्र को कह दे …….वहाँ कथा सुनाकर कोई लाभ नही है …………क्यों की वो सब जानती हैं ………जब यशोदा मैया के यहाँ बधाई हो रही थी ……..तब से जानती है ……जब माखन चुराकर खाता था तब से जानती हैं ………..इसलिये अब रहनें दे …..नख से सिख तक कपट के सिवा और क्या है तेरे मित्र में बता भौरें !
गुन गुन गुन ……( पर कपट कहाँ किया मेरे सखा नें ….आपको वो अभी भी चाहते हैं इसलिये तो मुझे भेजा है आप लोगों के पास )
मानों वो भौरा श्रीराधारानी से कह रहा है ।
सूखी हंसी हंसती हैं श्रीराधारानी ……….कपट क्या किया ?
अरे ! इस जनम की छोडो तेरा यार तो जनम जनम का कपटी है ……हर जनम में कपट का ही तो काम किया है ……………..
गुन गुन गुन ……..( कैसे ? )
बलि के पास गया ये तो सीधे विष्णु के रूप में नही गया ……….वामन बनकर गया …………वामन के भेष में ही इसनें बेचारे बलि को लूट लिया ……..तीन पग भूमि कहकर बाद में विराट बन गया ……..और विराट के पाँव से नापनें लगा भूमि ……….ये क्या कपट नही है ?
उद्धव विदुर जी को कहते हैं – तात ! मैं आश्चर्य चकित ………क्या सोचकर आया था मैं कि इन सबको बताऊंगा कि श्रीकृष्ण भगवान है ……पर इनको तो पता है कि वामन श्रीकृष्ण ही बने थे …….अब आगे सुनो तात ! क्या कहतीं हैं श्रीराधारानी उस भौरें से ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
