श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! पाण्डवों के श्रीकृष्ण – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 47 !!
भाग 2
आप सखाओं की बातें अगर पूरी हो गयीं हों तो हम भी कुछ कहें , युधिष्ठिर महाराज आगे बढ़ते हुए बोले थे । अरे , आप लोग कब आए ? श्रीकृष्ण उठ गए और सबको देखकर प्रसन्न हो रह हैं । आप कब आए द्वारकेश ! भीम ने भी आगे बढ़कर पूछा , रात्रि में आया था पर आप लोगों को कष्ट होगा इसलिय जगाया नहीं , पर मुझे तो जगा देते केशव ! अर्जुन बोले थे , अर्जुन के कन्धे में हाथ रखते हुए श्रीकृष्ण बोले – तुम , तुम कहाँ थे अर्जुन , तुम तो कृष्ण बन चुके थे , अर्जुन नें अपना सिर झुका लिया था ।
भुआ कहाँ हैं वो मेरी प्यारी भुआ कुशल तो है ना ? श्रीकृष्ण ने इतना पूछा ही था की – तुम्हारी भुआ ठीक है गोविन्द ! कुन्ती माता उसी समय वहाँ उपस्थित हो गयीं थीं चरण वंदन किए श्रीकृष्ण नें अपनी भुआ के।
अब देखो ना , ये तुम्हारे भाई पाण्डव राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं मैंने इनसे कहा एक बार श्रीकृष्ण से तो पूछ लो तो भीम कहने लगा यज्ञ के विरोध में श्रीकृष्ण जा ही नहीं सकते ।
कुन्ती भुआ अपने प्यारे भतीजे श्रीकृष्ण से अपने हृदय की सारी बातें बता रही थीं , तात ! इन लोगों का और है ही कौन सिर्फ़ सिर्फ़ एक मात्र श्रीकृष्ण के सिवा । उद्धव विदुर को ये प्रसंग बता रहे थे ।
क्या तुम लोगों को पता है राजसूय यज्ञ में समस्त पृथ्वी के राजाओं के ऊपर विजय पाया जाता है या वो तुम्हें इस यज्ञ को करनें की अनुमति दें , तभी ये यज्ञ सम्भव है , श्रीकृष्ण भीमसेन की और देखकर बोले थे । हाँ , पृथ्वी के समस्त राजा हमारे आगे नतमस्तक हैं , भीम ही बोला था बाक़ी अब सुन रह थे , अरे वाह ! भीमदादा ! तुमने तो अद्भुत वीरता का परिचय दे दिया पृथ्वी के समस्त राजाओं को जीत लिया ! श्रीकृष्ण की ये बात कुछ व्यंग जैसी लगी भीम को तो भीम ने तुरन्त सफ़ाई भी दे दी – कुछ मित्र राजा थे ही और कुछ राजाओं को राजसूय यज्ञ का निमन्त्रण भेजा तो उन्होंने स्वीकृति दे दी , भीम सेन नें कहा ।
तो जरासन्ध नें भी स्वीकृति दे दी होगी ? श्रीकृष्ण नें पूछा ।
जरासन्ध ? भीम युधिष्ठिर की और देखने लगे थे फिर बोले – एक राजा के न मानने से क्या होता है , ना भीम ! एक भी राजा तुम्हारे विरोध में अगर खड़ा है तो राजसूय यज्ञ नहीं हो सकता , श्रीकृष्ण नें कहा । तो मैं आज ही जाता हूँ मगध और जरासन्ध को युद्ध में पराजित करके आता हूँ , भीम की इस बात पर श्रीकृष्ण हंसे फिर बोले – भीम ! तुम क्या समझते हो जरासन्ध को , वो साधारण है , अरे ! तुम जैसों को वो एक ही बार में मसल देगा ।
भीम चुप हो गया था । तो फिर जरासन्ध को हम कैसे हराएँगे ? अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा ।
बस एक ही उपाय है , श्रीकृष्ण बोले …..अर्जुन ! तुम्हें तो पता है ना , मैंने इस जरासन्ध को सत्रह बार हराया है पर अठारहवीं बार में इसनें एक लक्ष ब्राह्मणों को मुझे युद्ध में हरानें के लिए मंत्र जाप में लगा दिया था और उनसे कहा था कि श्रीकृष्ण हारना चाहिए अगर नही हारा तो मैं तुम सब को मार दूँगा , उन बेचारे ब्राह्मणों की रक्षा के लिए मैंने रण को छोड़ दिया था , श्रीकृष्ण इतना बोल कर चुप हो गए थे ।
तो जरासन्ध को हम कैसे मारें ? अर्जुन ने पूछा ।
प्रिय अर्जुन !
ब्राह्मण के प्रति उस दिन से जरासन्ध के मन में अपार श्रद्धा है हमें इसी का लाभ लेना है ।
कैसे ? भीम ने पूछा ।
हे भीम ! जरासन्ध किसी से नहि मिलता वो बस ब्राह्मणों से ही मिलता है और उन्हीं की माँगों को मानता है । तो ? भीम नें पूछा ।
तो तुम ब्राह्मण बनकर जाओगे जरासन्ध के पास और उससे वचन लोगे पहले कि तुम जो माँगोगे वो देगा , श्रीकृष्ण की बातें सब ध्यान से सुन रहे हैं , हे भीम ! फिर जब वो तुम्हें वचन दे दे तब युद्ध को दान में माँग लेना ।
ठीक है । भीम ने हाँ कह दिया ,
पर तुम अकेले नहीं जाओगे , अर्जुन जाएगा तुम्हारे साथ और मैं भी जाऊँगा । श्रीकृष्ण नें कहा……आप ? सब चौंके , आप जाएँगे मगध ?
हाँ , पर ब्राह्मण का भेष धारण करके , हम तीनों ब्राह्मण बनकर जाएँगे ।
श्रीकृष्ण इतना ही बोले , फिर द्रोपदी की और देखते हुए कहा – सखी ! बाल भोग नहि कराओगी , हम स्नान करके आ रहे हैं , द्रोपदी मुस्कुराते हुए गयी बाल भोग तैयार करने इधर श्रीकृष्ण अपने पाण्डवों के साथ यमुना स्नान के लिए चल दिए थे ।
कब जाना है मगध ? भीम नें पूछा था ।
आज ही, बाल भोग करके , फिर हंसते हुये श्रीकृष्ण बोले – भीम ! कोई कष्ट ?
हंसते हुये भीम नें कहा आप साथ हैं तो क्या कष्ट ।
सब नें बड़े प्रेम से यमुना स्नान किया था ।
शेष चरित्र कल
