श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “भूमा पुरुष”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 80 !!
भाग 1
नाम मात्र के लिए रथ की रज्जु अर्जुन ने सम्भाली थी ….बाकी तो अश्व ऐसे दौड़ रहे थे जैसे इन्हें मार्ग का पूरा पता हो ….अर्जुन बारम्बार श्रीकृष्ण को देख रहे थे पीछे मुड़ मुड़ के।
पृथ्वी कम समाप्त हो गयी अर्जुन को पता भी न चला ……अब तो सामने अगाध जल राशि थी ।
समुद्र को सामने देख अर्जुन भयभीत हो गए ….अब अश्व कैसे चलेंगे ….पीछे मुड़कर जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण की और देखा ही था …कि सामने सागर में से उसके “अधिदैव” प्रकट हो गये थे ।
कोई सेवा नाथ ! हाथ जोड़ कर सामने आ खड़ा हुआ था सागर का अधिदैव रूप ।
नही , बस हमें मार्ग देते चलो …….आदेशात्मक भाषा थी वासुदेव की ।
फिर क्या था सागर के मध्य से दो भाग हो गए और मार्ग बनता चला गया ।
एक सागर कहाँ था, ऐसे तो सप्त सागर थे सब को पार किया ……अर्जुन के कुछ समझ में नही आरहा है …वो बस अश्वों की रज्जु नाम मात्र के लिए पकड़े हुए हैं ।
सप्त पर्वतों को भी पार करना था ….पर्वत के भी अधिदैव प्रकट होकर श्रीकृष्ण सेवा के लिए आतुर हो उठे थे ….किन्तु श्रीकृष्ण को अभी कहीं रुकना नही था ….पर्वतों ने भी सागर की तरह मार्ग दे दिया ।
क्षण में ही अश्वों ने उन सप्त पर्वतों को भी पार कर लिया …पर ये क्या ….अश्व तो अब नभ में उड़ने लगे थे …..भय के कारण अर्जुन स्वेद से नहा उठे थे ….स्वेद पोंछने का भी समय अर्जुन को नही मिल रहा था ……भयभीत अर्जुन काँप उठे …..जब लोकालोक पर्वत को उड़ते हुये अश्वों ने पार किया था । न …हीं……..अर्जुन चिल्ला उठा क्यो की अब आगे घोर अन्धकार था …..पर ये अश्व अभी भी अधर में दौडे जा रहे थे ……..”मुझे कुछ दिखाई नही दे रहा”…..अर्जुन बोलते जा रहा है ….पर श्रीकृष्ण उसकी बात सुन ही नही रहे ।
अर्जुन को ज़्यादा विचलित देखा तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया – “प्रकाश करो”।
और अर्जुन को अपनी आँखें मूँदनी पड़ी थीं ….क्यो की एकाएक इतना प्रकाश छा गया था मानों हज़ारों सूर्य उदित हो गए हों ।
अश्व अभी भी रुके नही हैं ……….किन्तु गति उनकी कुछ कम हो गयी थी ।
अर्जुन तब स्तब्ध- चकित हो गए जब उन्होंने देखा कि अब जो मण्डल शुरू हो रहा था ….वो मणिमाणिक्य से खचा हुआ था ….मणिस्तम्भ वहाँ नाना रंगों के थे ….उन सब से प्रकाश किरणें फूट रही थीं ….आनन्द ही आनन्द था उस मंडल में …..ये कौन सा लोक है ?
आश्चर्य के साथ अर्जुन ने पूछा , पर श्रीकृष्ण बस मुस्कुराए ।
अश्व रुक गए थे …..अपने प्रिय सखा अर्जुन का हाथ पकड़ कर श्रीकृष्ण रथ से नीचे उतरे ….और पैदल चल दिए ।
अर्जुन इस समय कुछ बोलने की स्थिति में नही हैं, वो बस जहां श्रीकृष्ण ले जा रहे हैं वही चला जा रहा है ।
रुक गए, अब एक दिव्य लोक में पहुँच कर दोनों सखा ।
ये क्या है ? ये कौन सा लोक है ? यहाँ के देव कौन हैं ? अर्जुन के बहुत प्रश्न थे , पर श्रीकृष्ण कुछ नही बोल रहे …..अभी भी चले जा रहे हैं ।
आइए मेरे नर नारायण !
मुस्कुराते हुए उन प्रेमपुरुष ने श्रीकृष्ण और अर्जुन का स्वागत किया ।
अर्जुन तो देखता रह गया ……ये तो मेरे श्रीकृष्ण की तरह ही हैं ….अर्जुन श्रीकृष्ण को देखता है फिर उन पुरुष को …..मनमोहिनी मुस्कान थीं उन पुरुष की …….पीताम्बर भी धारण कर रखी थी उन्होंने ….वो बस दोनों को देख रहे थे ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल


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