श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “द्वारिका में ऋषि दुर्वासा”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 81 !!
भाग 1
“हे कृष्ण ! तुम्हारी द्वारिका में हम चतुर्मास रहेंगे क्या हमारी सेवा करोगे ? “
ऋषि दुर्वासा आज द्वारिका पधारे …और द्वारिका में आते ही सीधे श्रीकृष्ण के महल में पहुँच गए थे। श्रीकृष्ण ने जब उनकी चरण वन्दना की …..तब उन्होंने ये प्रश्न किया था ।
हमारा सौभाग्य होगा ऋषि ! श्रीकृष्ण ने भी हाथ जोड़कर कहा ।
“चातुर्मास करेगा ये ऋषि”……ऋषि दुर्वासा इस बात को भी क्रोध में भरकर बोले थे ।
चातुर्मास ही क्यों जब तक इस कृष्ण का शरीर रहेगा तब तक ये आपकी सेवा करता रहेगा …आप सेवा का अवसर तो प्रदान करें …..विनम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण ने कहा था ।
कृष्ण ! तुम जानते हो मैं कितना क्रोधी हूँ …..क्या तुम मेरी सेवा कर सकोगे ?
भगवन् ! क्रोध नही वो तो आपकी करुणा बरसती है ….पर लोग समझ नही पाते ।
कृष्ण ! अकेले तुम नही …सपत्नीक मेरी सेवा करोगे …..रुक्मणी आगे आईं थीं और ऋषि के आगे उन्होंने अपना सिर झुका दिया था ।
ऋषि उछलते हुए श्रीकृष्ण के पर्यंक में जाकर सीधे लेट गए ।
मुझे राजसी वस्त्र पहनाया जाए ………सीधे बोलने लगे थे अब दुर्वासा ….श्रीकृष्ण ने तुरन्त धारण करवाया । इस तरह कभी भी ये कुछ भी कह देते ।
कभी अर्धरात्रि को ही उठकर बैठ जाते और कहते मेरे लिए छप्पन भोग लाओ ……
रुक्मणी लक्ष्मी की अवतार हैं इनके संकल्प मात्र से सब कुछ हो जाता है ।
वो कभी भी कुछ भी माँग सकते थे …….येसे येसे फल की माँग करते जो उस ऋतु में उपलब्ध ही नही होते ….किन्तु लक्ष्मी रूपा रुक्मणी के लिए ये असम्भव कहाँ था ।
सावधान होकर सेवा करनी थी इन ऋषि दुर्वासा की श्रीकृष्ण और रुक्मणी को ।
“हम आज रथ में चलेंगे”……दुर्वासा को पता नही आज क्या सूझी ।
आपके सामने रथ तैयार है भगवन् ! श्रीकृष्ण का रथ सामने खड़ा ही था ।
दुर्वासा रथ के पास गए और दूसरी आज्ञा दे डाली थी ……”रथ से अश्वों को हटाया जाए”…..
दुर्वासा की हर आज्ञा का पालन रुक्मणी या स्वयं श्रीकृष्ण को ही करना था ।
हटा दिए अश्व……..कृष्ण ! अब तुम और स्वयं रुक्मणी अश्वों के स्थान में जुतो ।
ये क्या आज्ञा थी ? श्रीकृष्ण पुत्र प्रद्युम्न को क्रोध आया दुर्वासा के ऊपर ……किन्तु श्रीकृष्ण ने रोक दिया ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
