!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! : त्रयत्रिंशत् अध्याय: Niru Ashra

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!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!

( त्रयत्रिंशत् अध्याय: )

गतांक से आगे –

आज रात्रि संकीर्तन में नही गये निमाई ..माता को समझाने में समय लग गया ..फिर जब घर का वातावरण कारुणिक देखा तो वो आज रुक गये । विष्णुप्रिया ने अपने को सम्भालते हुये भोजन तैयार किया ..भोजन बनाते विष्णुप्रिया को जब देख रहीं थीं शचि देवि तो उन्हें रोना आ रहा था।

निमाई को भोजन कराया प्रिया ने …फिर अपनी सासु माँ शचि देवि को ….फिर स्वयं निमाई की थाली में प्रसाद ग्रहण कर…माता शचि देवि को सुला कर अपने कक्ष में गयीं …सजी प्रिया …अपने केश बनाये …इत्र फुलेल लगाये …फिर हाथ में पान की डिब्बी लेकर …फूलों की माला लेकर निमाई के शयनकक्ष में आईं । प्राणबल्लभ सो रहे हैं ….गहरी नींद में हैं …ये देखती रहीं …फिर प्राणेश्वर के चरणों के निकट बैठ गयीं …अत्यन्त कोमल चरण हैं …संकीर्तन में कितना उछलते कूदते हैं …दूखते होंगे ना ! ये सोचते हुए उन युगल चरणों को अपने गोद में रख लेती है प्रिया ….और बहुत धीरे धीरे चरण चापन करने लगती हैं । मन में डर भी है कि कहीं नींद खुल न जाये …इतनी गहरी नींद शायद ही इन्हें इन दिनों में कभी आई होगी …ये सोचते हुये बहुत धीरे चरण दबा रही हैं । विष्णुप्रिया अपने को परम भाग्यशाली भी आज मानती हैं …कि ये सौभाग्य मेरे ही भाग्य में लिखा …मैं इनकी श्रीमति हूँ ….ये मेरे पति हैं ….मेरे पिता जी इस बार कह रहे थे …कि लोगों में चर्चा है ….निमाई नारायण स्वरूप हैं….वो बता रहे थे कि इनके चरणों में शंख चक्र पद्म आदि के चिन्ह हैं ….ये बात स्मरण करते ही प्रिया चरण चिन्हों को देखती है ….उसे दीख जाते हैं …वो अपने मस्तक को चरणों तक लाकर छुवाती है …फिर गदगद होकर अपने को बड़ भागी मानती है । विष्णुप्रिया निहार रही है अपने ‘प्राण’ को ….अद्भुत सौन्दर्य बिखर रहा है निमाई का ….उनके श्रीअंग से कमल की सुगन्ध प्रकट हो रही है ….उनके घुंघराले केश बिखरे हुए है , इस तरह दिव्य शोभा बन गयी है निमाई की ।

पर ये सन्यास लेंगे ? ओह ! ये बात स्मरण में आते ही प्रिया के साँस अटक गये ।

ये गृह त्याग करेंगे ? मेरा त्याग करेंगे ? विष्णुप्रिया के हृदय में बज्राघात हुआ ।

इनसे पूछना है मुझे ……नेत्रों से टप्प टप्प अश्रु बहने लगे …….

“शुन शुन प्राणनाथ मोर शिरे देह हाथ ,
सन्यास करिबे नाकि तुमि ?
लोक मुखे सुनि इहा , विदरिते चाहे हिया ,
आगुनिते प्रवेशिब आमि ।।”

ये कहना चाहती है …पूछना चाहती है अपने प्राणनाथ से …कि बताओ , मेरे सिर में हाथ रखके बताओ मेरे प्राण नाथ ! क्या तुम सन्यास लोगे ? मैंने सुना है …लोग कहते हैं …पर मैं तुमसे सुनना चाहती हूँ …बता दो ….मैं भी अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी ….तुम्हारे सन्यास लेते ही ।

झर झर अश्रुओं के साथ हिचकियाँ बंध गयीं प्रिया की …..बस उसी समय निमाई की नींद खुल गयी …..नेत्र खोलकर देखा ….विष्णुप्रिया को अपने पास देखते ही वो उठकर बैठ गये ।

प्रिया ! क्या हुआ , तुम रो क्यों रही हो ? मैं तो तुम्हारे पास हूँ ….फिर इतना रुदन क्यों ?

निमाई ने देखा इतने पर भी प्रिया का रुदन शान्त नही हुआ तो निमाई ने अपने हृदय से लगा लिया…..और अपने कोमल करों से अश्रु पोंछते हुये बोले – इस निशा में इतना रुदन उचित नही है ……तुम मेरी हृदयेश्वरी हो …..अब शान्त हो जाओ प्रिया !

पर निमाई ने क्या सोचा था इस तरह प्रेम संभाषण से ये रुदन रुकेगा ! प्रेम का वेग और तीव्र हो उठा ….तीव्र से तीव्रतम । कण्ठ अवरुद्ध हो गया प्रिया का …अदम्य हृदयावेग के कारण देह काँपने लगा ……प्राण पुकार उठे ….हे गौर ! बचा लो मुझे …या इस जीवन को ही ले लो ।

उन युगल चरणों को अपनी छाती से चिपका लिया प्रिया ने ……और रोते हुये बस इतना ही बोली ….नाथ ! इस दासी को इन चरणों से दूर मत करो …नही तो मर जाएगी ये ।

ओह ! क्रन्दन ऐसा था की कठोर से कठोर हृदय भी विदीर्ण हो जाये …..

निमाई स्वयं इस स्थिति का सामना नही कर पा रहे थे ….तुरन्त अपने वक्षस्थल से चादर हटाया और उससे प्रिया के अश्रु पोंछने लगे ….प्यारी ! क्या हुआ ? निमाई फिर पूछ रहे हैं ।


कातर नयनों से अपने स्वामी को देखा विष्णुप्रिया ने …..फिर नयनों को झुकाकर हाथ जोड़कर बोली ….”स्नेह और प्रेम बरसा रहे हो स्वामी ! तो मेरे सिर में हाथ रखकर सौगंध खाओ कि मुझे त्याग कर सन्यास” …….आगे ये बोल न सकी । फिर रुदन प्रारम्भ हो गया । वो विषम असह्य बात मुख से निकाल भी ना सकी प्रिया । हृदय दुःख के अथाह सागर में डूबा हुआ है …..ये सब देखकर निमाई ने तुरन्त विष्णुप्रिया को सम्भाला ….अपने हृदय से चिपका लिया उसके सिर में हाथ फेरने लगे । विष्णुप्रिया को ये सब नही …उसे उत्तर चाहिए था …जो वो पूछ रही थी ।

जब बहुत देर तक निमाई ने कोई उत्तर नही दिया तो फिर विष्णुप्रिया ने पूछा ….पूछने में भी वो करुण वाणी थी ….कि निमाई के कक्ष की दीवारें भी रो पड़ी होंगी ।

नाथ ! आप अपने भाई की तरह कहीं सब कुछ छोड़कर तो नही चले जायेंगे ?

निमाई इसका उत्तर खोज रहे हैं पर उन्हें भी नही मिल रहा ….अपनी माता को तो समझा दिया पर इसको कैसे समझायें ? क्या कहूँ ?

बहुत देर तक चुप ही रहे निमाई ….तो विष्णुप्रिया ने फिर देखा अपने ‘प्राण’ की ओर ….फिर एकाएक उनके हाथ को अपने सिर में रखते हुये बोली ….मेरी सौगन्ध खाओ ….मैं थक गयी हूँ नाथ ! लोगों के मुख से सुन सुनकर कि “तेरे पति सन्यास ले रहे हैं”….मैं मायके जाती हूँ तो वहाँ भी लोग मुझ से पूछते हैं …मैं गंगा घाट जाती हूँ तो वहाँ भी यही चर्चा …आपकी माता जी भी यही कहती हैं ….कभी सोचा आपने मुझ पर क्या बीतती होगी ? अब आप ही बता दीजिये सच बात क्या है ….सच बताइये ..क्या इस घर को , यहाँ के वैभव को , मुझे ….मैं आपके लिए हूँ इस घर में …आप चले जायेंगे तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी । और क्या , जब आप ही नही तो इस जीवन का क्या अर्थ ! मैं तो भाग्यशाली हूँ कि आप जैसे मुझे पति मिले …परम विद्वान , रूप गुण शील में आपके समान और कौन होगा ! मैं तो भाग्यशाली हूँ पर मेरे भी अपने सपने थे …उनका क्या ? मैंने भी बहुत कुछ सोचा था ….उनका क्या ? आशा थी मेरी भी कि साथ रहेंगे आपके चरणों की सेवा जीवन पर्यन्त मिलती रहेगी तो ये दासी आपकी धन्यता का अनुभव करेगी , किन्तु ………निमाई प्रिया के इतना बोलने पर भी मौन ही रहे …..तो विष्णुप्रिया ने निमाई के चरणों की ओर देखते हुये कहा ….इनको आप वनों में ले जायेंगे …इतने कोमल चरणों को ? मैं अभी आपके चरण चाँप रही थी तो डर लग रहा था कहीं मेरे कठोर करों से आपके कोमल चरणों को कोई कष्ट न हो ….नाथ ! सन्यास मत लीजिये । विष्णुप्रिया ने फिर रोते हुये कहा – चलिये मेरी छोडिए किन्तु अपनी बूढ़ी माता का तो ध्यान रखिये ….माता की सेवा से बढ़कर और कुछ है क्या ? आप धर्म का सार जानते हैं …मैं तो एक स्त्री जात हूँ …मैं क्या आपको धर्म सिखाऊँगी ….किन्तु बूढ़ी माता का त्याग ये तो धर्म की श्रेणी में नही ही आता होगा ।

विष्णुप्रिया की इन बातों का निमाई क्या उत्तर देते । ओह ! विष्णुप्रिया बेचारी , जिसकी आयु इस समय चौदह वर्ष मात्र है …..

शेष कल –

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