उद्धव गोपी संवाद
(भ्रमर गीत)
४७ एवं ४८
कोहू कहै अहो मधुप, तुम्हें लाज हू न आवत।
स्वामी तुम्हरौ कान्ह,कूबरी दास कहावत।।
यहां ऊंची पदवी हती, गोपीनाथ कहाइ।
अब जदुकुल पावन भयौ,दासी जूंठन खाइ।।
– मरत कहा बोल कों।।
भावार्थ:-
भंवरा के मिस करिके, गोपियां ऊधौ जी को सुना रही हैं कि अरे भंवरे, तुम्हें जरा भी लाज नहीं आती कि तुम्हारे स्वामी कृष्ण वहां कूबरी के दास कहलाते हैं। यहां तो इतना ऊंची पदवी थी कि गोपीनाथ कहलाते थे।अब उस दासी की जूंठन खाकर के यदुकुल को पवित्र कर रहे हैं।
कोई कहै रे मधुप,कोंन कहै तोहि मधुकारी ।
लिए फिरत विष जोग गांठ,प्रेमी बधकारी।।
रूधिर पान कियौ बौहौत कै,अधर अरून रंगरात।
अब ब्रज में आए,कहौ करन कौन सी घात।।
– जात किन्ह पातकी?
भावार्थ:-
गोपियां कह रही हैं कि,अरे भंवरे कौन तुम्हे मधुर कहता है, अपने जिये में जोग रुपी विष की गठरी लिए फिरते हो और प्रेम की बातें करते हो। बहुत से जीवों का रक्त पान करके ही तुम्हारे अधर लाल हुए हैं।अब ब्रज में कौन सी घात करने आये हो।
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