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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 47 !!
प्रेम की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडी
भाग 2
हाँ सच्चे दाता कहाँ याद रखते हैं ………..वो तो नकली दानी होते हैं जो एक रूपये भी दें तो दुनिया को बताते हुए चलते हैं ……श्रीराधा रानी मुस्कुराते हुए बोल रही थीं ।
तो क्या ये घाव मैने दिया है ? श्याम सुन्दर नें श्रीजी से ही पूछा ।
नही नही ……ये घाव कहाँ है प्यारे ! ये तो घाव में लगाये जाने वाला शीतल लेप है ………….श्रीराधा नें कहना जारी रखा ।
आप मुझे व्यंग कर रही हैं ! या मेरा मन रखनें के लिये ये सब बोल रही हैं ? श्याम सुन्दर नें पूछा ।
नही नही ………..आपका मन रखनें की हिम्मत मुझ में कहाँ ?
आप तो दुनिया का मन रखते हो ………..दुनिया के मन को चुरानें वाले हो ……”माखन चोर” ऐसे ही तो नही कहते तुम्हे !
माखन चोर यानि – मन चोर …..
……हँसते हुए बोल रही थीं श्रीराधा रानी ।
अब देखो ना ! माखन में पहला अक्षर “म” है ….और अंतिम अक्षर है “न” …..हो गया ना मन ……………
अब तुम कहोगे ……..बीच का “अ” और “ख” …….इसका क्या ?
तो बड़ी सहजता से श्रीराधा रानी बोलीं …….प्यारे ! बीच का अक्षर हुआ “अख” ….अख यानि आँख…….अरे मेरे श्याम ! यानि तुम ऐसे चोर हो ….”.जो अख मिलाके मन को चुरा लेते हो”……बड़े विचित्र हो…….खूब हँसी श्रीराधा रानी ।
आप कुछ ज्यादा नही बोल रहीं ……..आपनें तो हमें सबसे बड़ा चोर ठहरा दिया…….श्याम सुन्दर नें कहा ।
मेरे चोर कहनें का बुरा न मानना श्याम ! …………..कोई सोना चुराता है ….कोई चाँदी ……पर तुम बड़े विचित्र चोर निकले ………मन को ही चुरा लेते हो …….वाह जी ! वाह ! श्रीजी नें श्याम को और छेड़ा ।
अब देखो ! श्याम सुन्दर ! मन को चुरानें से सारे झंझट खतम ।
ये संसार नाम रूप में ही तो फंसा है ना ? और नाम रूप, देश काल में है …..और देश काल मन में है ………..अगर मन को ही कोई चुरा ले ….तो “नाम रूप” रूपी ये प्रपंचमय जगत खतम…….देश काल खतम ।
क्यों की ये सब मन में ही रहते हैं ना ! पाप पुण्य खतम …….वाह ! श्रीराधा जी स्वयं बोल रही हैं …..और आनन्दित हो रही हैं ।
अरे ! प्रियतम ! स्वर्ग नरक खतम…….क्यों की इन सबका कारण ही मन है ……बन्धन मुक्ति खतम……मन ही है सबका कारण ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल…🙏
💕 राधे राधे💕
