!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 62 !!-वज्रनाभ के प्रश्न , महर्षि शाण्डिल्य के उत्तर भाग 3 : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 62 !!

वज्रनाभ के प्रश्न , महर्षि शाण्डिल्य के उत्तर
भाग 3

तुमनें एक प्रश्न और रखा मेरे सामनें …….. …..कृष्ण अगर मथुरा में ही बुला लेते इन बृजवासियों को तो ?

बुला लेते ………पर क्या ये बृजवासी वहाँ जाते ? श्रीराधारानी मथुराधीश के दर्शन करतीं ? क्या उन गोपियों को रुचिकर लगता वो राजसी भेष कृष्ण का ?

हँसे महर्षि शाण्डिल्य ………हे वज्रनाभ ! तुमनें अंतिम प्रश्न किया कि ….मथुरा में ही बसा लेते इन वृन्दावन वासियों को भी ।

हे वज्रनाभ ! तुम प्रेम के सिद्धान्त को अभी तक समझ नही पाये ।

ऐसे कैसे रह जातीं श्रीराधा रानी मथुरा में ?

ऐसे कैसे रह जातीं मैया यशोदा ,नन्द बाबा , ग्वाल बाल गोपियाँ ?

कृष्ण रसिक शेखर हैं ……”रस सिद्धान्त” को इनसे ज्यादा और कौन समझता है वज्रनाभ !

अगर कृष्ण मथुरा में बसा भी लेते इन सबको ……….तब तो एक बड़ा संकट खड़ा हो जाता ……..”प्रेम का संकट” !

जिन गोपियों नें अपनें सामनें जिसे नचाया …….जिसे बाँधा ……जिसे अधिकार से चूमा ………आलिंगन किया ……….उसकी दया पर पलेंगीं ये गोपियाँ ? श्रीराधा ? ऐसा कृष्ण कर ही नही सकते थे ।

कोई उपाय नही था कृष्ण के सामनें …………श्रीराधा और अन्य बृजवासियों को उनकी विरह वेदना के साथ छोड़नें के सिवा ।

“प्रेम” कोई दीन हीन नही है…….प्रेम की अपनी ठसक है ……होनी भी चाहिये ………

मैने सुना था वज्रनाभ ! कि एक बार बस एक बार ……गोपियाँ मथुरा गयी थीं …….श्रीराधा रानी नहीं ……..अन्य गोपियाँ ……….उन गोपियों की मुखिया बनके गयी थी चन्द्रावली सखी ……..मथुरा गयीं ……

पर पता है वज्रनाभ ! वो सब कृष्ण से बिना मिले ही आगयीं ………….

लोगों नें पूछा उनसे ………जब गयी थीं मथुरा तो मिल भी लेतीं ।

तब चन्द्रावली का उत्तर था – नही हम तो “गोपाल” से मिलनें गए थे ….”मथुराधीश” से नही ………वहाँ हमारा “गोपाल” नही है …..वहाँ तो राजा है मथुराधीश है ………..फिर हमें क्या काम राजा से ।

हे वज्रनाभ ! बाकी सब लीला है…..मैने तुम्हे पहले भी कहा ही था ।

हाँ …….उद्धव जी को भेजा वृन्दावन कृष्ण नें……….

ये भी तब किया जब उनसे रहा नही गया था ………….असह्य हो गया श्रीराधा का वियोग कृष्ण को ………तब उन्होंने अपनें मित्र उद्धव जी को भेजा था …………..उद्धव आये थे …….महर्षि नें कहा ।

मुझे उस प्रसंग को भी सुनना है ………हे गुरुदेव ! आपनें मेरी जिज्ञासा शान्त की……..अब मुझे उद्धव और श्रीराधारानी का प्रसंग सुनाइये…….अब मैं स्पष्ट समझ गया कि …….विशुद्ध प्रेम की परिभाषा समझानें के लिये “श्रीराधा प्रेम” को जगत में लाये थे कृष्ण …..ताकि स्वार्थ से , राग द्वेष , अहंकार में रचे पचे मनुष्य समझ सकें कि प्रेम क्या होता है !

वज्रनाभ का प्रश्न सुनकर महर्षि बड़े प्रसन्न हुए ।

शेष चरित्र कल ..

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