!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( चिद् घन श्रीवृन्दावन – “श्रीवृन्दावन अति रम्य” )
गतांक से आगे –
प्रेम जितना घनीभूत होता जाएगा , ये श्रीवृन्दावन का क्षेत्र और सिमटता जाएगा । श्रीवृन्दावन का अत्यधिक सूक्ष्म प्रदेश निकुँज ही है । यहाँ बात स्थूल श्रीवृन्दावन की नही हो रही …वैसे स्थूल से ही हम सूक्ष्म में पहुँचते हैं …बिना स्थूल के सूक्ष्म तक जाने का कोई उपाय भी नही है ।
किन्तु प्रश्न उठता है कि जिस श्रीवृन्दावन का वर्णन हित चौरासी और महावाणी जी आदि में आता है …स्थूल में तो वो श्रीवृन्दावन दिखाई नही देता ? आखिर वो रसिकों का श्रीवृन्दावन है कहाँ ?
ये स्थूल श्रीवृन्दावन में ही वो सूक्ष्म श्रीवृन्दावन छुपा है ….वो दिव्य है ….वो अनादि है । हाँ इस स्थूल श्रीवन में माया का प्रभाव दिखाई दे सकता है …क्यों कि सूक्ष्म दिव्य को स्थूल बनाने में हमारा हाथ है …हम माया के द्वारा प्रेरित हैं …इसलिए श्रीवन हमें वैसा दिखाई नही देता जैसा वो है ….इसका कारण ही है ….माया का आवरण । किन्तु आप अगर माया का चश्मा उतार फेंके ….( जैसे प्रतीक रूप से यहाँ के बन्दर भी चश्मा हटाने के लिए कहते हैं ) और दिव्य प्रेम का चश्मा लगायें तो पक्का समझिये ….आपको दिव्य श्रीवृन्दावन के दर्शन हो जायेंगे । दो श्रीवृन्दावन हैं …एक भौतिक जो हमें दिखाई दे रहा है ….ये हमारे द्वारा निर्मित है ….इसलिये ये मिथ्या है । आप कहोगे कैसे ? तो सुनिये – यहाँ अत्याधुनिक भवनों को हमने बनाया …ये मिथ्या है ….क्यों कि ये कल नही रहेंगे । गन्दगी, जो दिखाई देती है …वो हमारे द्वारा फैलाई गयी है , मिथ्या है ।
किन्तु जो चिद् रूप श्रीवृन्दावन है ….वो युगल सरकार की नित्य विहारस्थली है …..नही नही आप ऐसा मत सोचना कि ये दिव्य श्रीवृन्दावन आकाश में या पाताल में है …नही , ये यहीं है …हमारे द्वारा निर्मित ये भौतिक श्रीवृन्दावन जब हट जायेगा तो वो प्रकट हो जाएगा । मतलब ? मतलब ये कि आपके द्वारा निर्मित ये भवनों का वन , ट्रेफ़िक , गन्दगी का ढेर …भौतिकवाद का विस्तार …ये जब हटेगा , या आप इन सबको हटाकर देखोगे तो आपको वो चिद घन श्रीवृन्दावन प्रत्यक्ष हो जाएगा ।
हमारे रसिकों ने अनुभव करके कहा है – वो दिव्य श्रीवृन्दावन महाप्रेम और रस से भरा हुआ है ….यहाँ का कण कण प्रेम का विस्तार करता है । यहाँ की वायु प्रेम पूर्ण है …यहाँ का अणु परमाणु प्रेम से सिक्त है जो सबको अपने में ले लेता है ।
हमें देखना है उस श्रीवृन्दावन को । ये प्रश्न आज शाश्वत ने पागल बाबा से किया था ।
ऐसे नही देख सकते है ….बाबा बोले । माया से जो बंधे हैं …काम, कर्म और कुसंग से जो पीड़ित हैं …काल , जंजाल के ज्वर ने जिन्हें जकड़ा हुआ है ….जिन्होंने रसिकों को न समझा है न उनका कभी संग ही किया है ….शाश्वत ! श्रीवृन्दावन उनसे बहुत दूर है ।
हाँ , तुम्हें अगर दिव्य श्रीधाम को देखना है …उसमें प्रवेश करना है ….तो रसिकों की दृष्टि पानी होगी ….वास्तव में रसिकों की दृष्टि मिलने पर ही वो चिद घन श्रीधाम तुम्हें दिखाई देने लगेगा ।
कुछ सोचकर बाबा फिर बोले – एक काम करो शाश्वत ! यहाँ के ब्रजवासियों के प्रति भगवद् भाव रखो , यहाँ के बृजवासी श्रीश्याम सुन्दर के ही परिकर हैं …यहाँ दिखाई दे रही स्त्रियाँ सखियाँ हैं …हमारी श्रीजी की ये सखियाँ हैं …..यहाँ वृक्ष लता आदि सब चिद हैं ..चैतन्य हैं ….ये भावना सदैव रखो …..और श्रीवृन्दावन से प्रार्थना करो ….कि आप दर्शन दो । आप अपना रूप दिखाओ …जो सनातन और अनादि प्रेम रूप है । श्री धाम जड़ नही है ….चैतन्य है …वो सुनेगा ।
राधा बाग में श्रीहित चौरासी जी की रसमयी चर्चाओं के मध्य आज कुछ प्रश्न थे जो शाश्वत ने रखे । श्रीवृन्दावन की दिव्य भूमि में ही रस केलि होती है ….यहाँ श्याम सुन्दर और श्रीराधिका जू प्रेम में थिरकते हैं …यहाँ के कण कण में प्रेम की सरिता बह रही है …यहाँ सब सखियाँ हैं ..सब । इतना स्मरण रहे कि श्रीवन जड़ नही है चैतन्य है । ये बात बाबा ने बताई ।
इसके बाद आज सत्तावनवाँ पद गाया गया …..गौरांगी ने अपने सुमधुर कण्ठ से गान किया ।
प्रथम जथामति प्रणऊँ , श्रीवृन्दावन अति रम्य । श्रीराधिका कृपा बिना सबके मननि अगम्य ।।
वर यमुना जल सींचन , दिन ही शरद बसंत । विविध भाँति सुमनसि के , सौरभ अलि कुल मंत ।।
अरुण नूत पल्लव पर , कूजत कोकिल कीर । निर्तनि करत सिखी कुल, अति आनन्द अधीर ।।
बहत पवन रुचि दायक , शीतल मंद सुगन्ध । अरुण नील सित मुकुलित , जहां तहां पूषण बंधु ।।
अति कमनीय विराजत , मंदिर नवल निकुँज । सेवत सगन प्रीति जुत , दिन मीनध्वज पुंज ।।
रसिक रास तहाँ खेलत , श्यामा श्याम किशोर । उभय बाहु परिरंजित , उठे उनिंदे भोर ।।
कनक कपिस पट शोभित , सुभग साँवरे अंग । नील वसन कामिनि उर , कंचुकी क़सूँभी सुरंग ।।
ताल रवाव मुरज डफ , बाजत मधुर मृदंग । सरस उकति गति सूचत , वर बाँसुरी मुखचंग ।।
दोउ मिलि चांचरि गावत , गौरी राग अलाप । मानस मृग बल बेधत , भृकुटी धनुष दृग चाप ।।
दोउ कर तारिनु पटकत , लटकत इत उत जात । हो हो होरी बोलत , अति आनन्द कुलकात ।।
रसिक लाल पर मेलत , कामिनि वन्दन धूरी । पिय पिचकारिनु छीरकत तकि तकी कुमकुम पूरी।।
कबहुँ कबहुँ चन्दन तरु , निर्मित तरल हिंडोर । चढ़ी दोऊ जन झूलत , फूलत करत कलोल ।।
वर हिंडोर झकोरनि , कामिनि अधिक डरात । पुलकि पुलकि वेपथ अँग , प्रीतम उर लपटात ।।
हित चिंतक निज चेरिनु , उर आनन्द न समात । निरखि निपट नैंननि सुख , तृण तोरत बलि जात ।।
अति उदार विवि सुंदर , सुरत सूर सकुँवार । श्रीहित हरिवंश करौं दिन , दोउ अचल बिहार । 57 ।
प्रथम जथामति प्रणऊँ………….
इस दिव्य पद का अब पागल बाबा ध्यान कराते हैं ।
!! ध्यान !!
सुन्दर श्रीधाम वृन्दावन है …..ये चैतन्य है …..यहाँ का अणुपरमाणु सब चैतन्य हैं । यहाँ की वायु भी चैतन्य है …तो लता पता भी चैतन्य हैं । यमुना बह रही हैं …..यमुना भी चैतन्य हैं । यहाँ की अवनी भी चैतन्य है ….अवनी मणि माणिक्य से खचित है ….अरे ! यमुना के घाट भी तो मणियों से बने हैं । हाँ , जब हवा चलती है तो रज उठता है …वो रज कपूर को पीस कर फैलाया गया हो ऐसा अनुभव में आता है । यहाँ एक ऋतु नही हैं …यहाँ एक काल भी नही है ….यहाँ ऋतुएँ बदलती रहती हैं …एक दिन छ ऋतुएँ भी आ सकती हैं ….आती हैं । यहाँ ऋतु भी चैतन्य है ….जब सखियों की इच्छा होती है ….होली खिलायें युगलवर को तो वसन्त प्रकट हो जाता है …. जब इच्छा होती है सखियों को होली खूब खेल लिए अब थोड़ा झूलन हो जाये …तो सावन आ जाता है । रास के लिए शरद प्रकट हो जाता है । वैसे तो दो ऋतुएँ यहाँ सदैव रहती ही हैं ….किन्तु अन्य ऋतुएँ आती जाती रहती हैं ।
आज प्रभात में ध्यान में बैठी है हित सखी …..वो निहार रही है श्रीवृन्दावन को …..वो प्रणाम करती है ….क्यों की उसका कहना ये है इसी भूमि में हमारे युगलवर विहार करते हैं तो ये भूमि कितनी दिव्य होगी ।
किन्तु । इस प्रेम भूमि में उसी का प्रवेश है …जिसके ऊपर स्वामिनी जू की कृपा हो ।
सामने हित सखी की प्रिय सखियाँ बैठी हैं …..सब आनंदित हैं अपनी सखी को सुन रही हैं ।
अरे सखियों ! ये श्रीवृन्दावन अगम्य है ….यहाँ आना तो अगम्य है ही …बाकि बिना स्वामिनी की कृपा के इस श्रीधाम के विषय में कोई सोच भी नही सकता । सोच भी तभी आती है जब स्वामिनी की कृपा हो । “श्रीवृन्दावन” कहो । क्यों कि ये कहना हमारे युगलवर को सुख पहुँचाता है ।
सारी सखियाँ …प्रेम से “श्रीवृन्दावन” कहने लगीं ।
तभी सामने यमुना जी की ओर ध्यान गया हित सखी का , निर्मल यमुना बह रही हैं …सखी बोली ….इसी प्रेम के जल यानि यमुना जल से ये श्रीवृन्दावन सिंचित है ….आहा ! तभी तो ये प्रेम से भरा हुआ मत्त है ।
यहाँ पुष्प तो देखो , हर ऋतु के पुष्प हर ऋतु में खिलते हैं …और युगल को कमल पुष्प देखने की इच्छा है और उनके सामने गुलाब खिला है …तो सखी ! वो गुलाब कमल बन जाएगा । क्यों की यहाँ सब चैतन्य ही है ।
अरे देखो यहाँ के कुँज निकुँज ! हित सखी कहती है । कितने सुन्दर हैं ….लता पत्रों से आच्छादित यहाँ के कुँज युगल को सुख देने का निरन्तर प्रयास करते रहते हैं । जो पुष्प लता में चाहिए वही पुष्प लता खिला देती है । यानि युगल के मन से सब कुछ यहाँ संचालित है सखी !
अन्य सखियाँ आनंदित होकर सुन रही हैं ……..
तभी युगल सरकार वन विहार को निकले …..हित सखी कहती है …..देखो तो कितने सुन्दर लग रहे हैं ….पीताम्बर धारण किए श्याम और नीलांबर में प्रिया जी कैसे गलवैयाँ दिए झूमते हुये चल रहे हैं ।
तभी बाजे, डफ , मृदंग बज उठे हैं …..इनको सुनकर युगल के मन में होली खेलने की इच्छा प्रकट हुई ….बस फिर क्या था ! हित सखी कहती है – देखो ! अभी शरद ऋतु है ना , देख , अब वसन्त आगया । होली खेलने लगे युगल , अबीर गुलाल सखियाँ ले आयीं और “हो हो हो हो हो हो हो री” कहने लगीं ….अबीर की वर्षा हो चली , पिचकारी चल पड़ी । पिचकारी में केसरिया रंग श्यामा जू पर कितना फंव रहा है …श्याम सुन्दर पूरे भींग गये हैं । रंग ही रंग है चारों ओर ।
तभी – हित सखी बोली ….अरे ! अब इच्छा हो रही है युगल की कि सावन में झूला झूलें ….
तभी श्रीवृन्दावन में सावन छा गया …वर्षा ऋतु आगयी । हिंडोला कदम्ब में पड़ गया ….और अब दोनों झूला झूलने लगे …..झोंटा ज़्यादा होता है तो प्यारी जू डर जाती हैं ।
ये आनन्द देख कर सब गदगद हो रही हैं ……सखियाँ जय जयकार कर रही हैं । तृण तोड़ कर बलि बलि जा रही हैं । ये सब देखकर हित सखी भाव उन्माद के कारण आशीष की वर्षा युगल के ऊपर करने लगती हैं । वो भाव में कहती है …ऐसे ही खेलो , हे रसिकवर ! तुम दोनों ऐसे ही नित्य विहार करते रहो । जुग जुग जीयो प्यारे ! जुग जुग जीयो ।
हित सखी के साथ सब आनंदित होकर युगल को आशीर्वाद देती हैं ।
पागल बाबा भी भाव उन्माद में हैं …..वो इसके बाद कुछ नही बोल रहे ।
गौरांगी आज का पद फिर दोहराती है …….
प्रथम जथामति प्रणऊँ………
आगे की चर्चा कल –


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