!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( महारास – “रास में रसिक मोहन बने भामिनी” )
गतांक से आगे –
उस परब्रह्म का विलास रस है ….वही विलास रस घनीभूत हो जाता है ….तो रास होता है …वही रास जब अपने चरम पर पहुँचता है तो महारास कहलाता है । रस अनेक प्रकार के हैं ….रस के प्रकार साहित्यकारों ने गिनाये हैं । शान्त से लेकर शृंगार तक । पर ये सर्वमान्य है कि शृंगार रस सर्वोच्च रस है । शृंगार रस की महादेवि श्रीराधिका जू हैं और देवता श्याम सुन्दर । इस शृंगाररस का धाम श्रीवृन्दावन है और सखियाँ इस रस की उत्कर्षिणी हैं ।
रास में रसिक मोहन बने भामिनी ।
सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन , मत्त मधुकर निकर शरद की जामिनी ।।
त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमणि दवन , तहाँ ठाणे रवन संग सत कामिनी ।
ताल वीना मृदंग सरस नाचत सुधंग , एक ते एक संगीत की स्वामिनी ।।
राग रागिनी जमी विपिन वरसत अमी , अधर विंविंन रमी मुरली अभिरामिनी ।
लाग कट्टर उरप सप्त सुर सौं सुलप , लेत सुंदर सुघर राधिका नामिनी ।।
तत्त थेई थेई करत गतिव नौतन धरत , पलटि ड़गमग ढरत मत्त गज गामिनी ।
धाइ नव रँग धरी उरसी राजत खरी , उभै कल हंस हरिवंश घन दामिनी । 68 !
रास में रसिक मोहन बने भामिनी ……………
बाबा आज कुछ नही बोल रहे …..बस भाव जगत में लीन हैं ….इसलिये वो सीधे हमें ध्यान में ले जाते हैं ….इस पद का गायन गौरांगी ने किया …..इस पद में महारास का वर्णन है ।
!! ध्यान !!
आज श्रीवृन्दावन फूल रहा है ….श्रीवृन्दावन के वनों में फूलों की भरमार है । सुगन्ध की वयार चल पड़ी है ……पुष्पों में भ्रमर गुंजार कर रहे हैं …वो भ्रमर झुण्ड के झुण्ड हैं । मोर बोल रहे हैं ….कोयल कहुंक रही है । ये सब क्यों न हो …श्रीवृन्दावन में शरद ऋतु जो छा गया है ।
सामने एक वृक्ष है , कदम्ब का वृक्ष ….उसमें तोता बहुत हैं …वहीं कोयल भी आ गयीं ….दोनों मिलकर प्रिया प्रियतम की लीलाओं का गान करने लगे हैं । इनको सुनकर हंस और हंसिनी उन्मत्त हो यमुना में विहार करने लगे ।
आज पता नही यमुना को क्या हो गया उसने अपने में अनन्त कमल प्रकट कर दिये हैं ……
ओह ! सामने से युगल सरकार जो आरहे हैं ।
एक कमल है जो अनेक कमलन के मध्य में खिला है …उसकी छटा सुवर्ण की है । प्रिया जी उसे देखती हैं और बस देखती रह जाती हैं । प्यारे उस कमल को देखकर कमल से ही ईर्ष्या करने लग जाते हैं । प्यारी समझ जाती हैं और अपने सिर प्रीतम के कन्धे में रखकर मुस्कुराती हैं ….और संकेत करती हैं …..प्यारे ! रास करें ? श्याम सुन्दर प्रसन्न हो जाते हैं …वो “हाँ”में सिर हिलाते हैं ….बस फिर क्या था ….हजारों सखियाँ कुँज-निकुँज से निकल कर बाहर आजाती हैं ….और सामने एक दिव्य अद्भुत रास मण्डल प्रकट हो जाता है ।
महारास आरम्भ हो जाता है …..उसका वर्णन हित सखी अपनी सखियों से करती है ।
कितने सुन्दर लग रहे हैं ना ! दोनों , अरी सखियों ! थोड़ा निहारो तो ।
शरद की रात्रि है , उस पर रमणीक यमुना का पुलिन है । रस पूर्ण सुगन्ध युक्त कमलों की सुगन्ध है …आहा ! क्या सुन्दर महारास है , हित सखी अपनी सखियों को बता रही है ।
सखी ! हवा भी कितनी सुन्दर चल रही है …..और सखियाँ भी हजारों की संख्या में एक से बढ़कर एक सुन्दर हैं ….कोई वीणा बजा रही है तो कोई मृदंग । और कोई कोई सखी तो युगल के साथ नृत्य कर रही हैं …..उन्मत्त होकर नाच रही हैं । अद्भुत रास है ये ।
अब देखो सखी ! श्यामसुन्दर ने अपने अधरों पर बाँसुरी विराजमान कर ली है ….नाद प्रकट हो रहा है बाँसुरी से …..इस नाद ने श्रीवन में अमृत घोल दिया है …..पर इससे भी ज़्यादा अमृत तो श्रीजी के आलाप ने बरसा दिया । क्या आलाप ले रही हैं ।
हित सखी उस महारास को कुछ देर तक देखती रही ….फिर बोली – अब देखो कैसे झूम झूम कर नाच रहे हैं दोनों …..थेई थेई ….शब्दों का उच्चारण करते हुए नृत्य की गति ले रहे हैं । कभी कभी गति लेकर , घूमकर जब प्रिया जू वापस अपनी जगह में एक विशेष भंगीमा में खड़ी हो जाती हैं तो श्याम सुन्दर मोहित होकर उन्हें अपने बाहों में भर लेते हैं । तब समस्त सखियाँ उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करती हैं ….हित सखी कहती है – मैं क्या कहूँ उस शोभा की ….ऐसे लग रहे हैं जैसे घन और दामिनी हों …ये आनन्द दामिनी हैं ……प्रिया जी को अपलक देखकर अपने नयनों को शीतल करती है हित सखी ।
बाबा इसके बाद कुछ नही बोलते ……..भाव में डूब गए हैं बाबा ।
गौरांगी इसी पद का गायन फिर करती है ।
रास में रसिक मोहन बने भामिनी ………
शेष कल –
