!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 87 !!-जयति जयति जय “प्रेम” भाग 3 : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 87 !!

जयति जयति जय “प्रेम”
भाग 3

वो हमें छेड़ता था …..हमारी मटकी फोड़ता था …….माखन चुराकर हमारी बुद्धि हर ली तेरे श्याम सुन्दर नें ।

वो हमें आलिंगन करता था ………….हमें छूता था …….यहाँ ! यहाँ ! यहाँ ! हमें छू छू कर ही उसनें हमारी बुद्धि हर ली ।

वो मुस्कुराता था ………..उसकी मुस्कुराहट से देव महादेव तक विचलित हो जाते थे ……..तो हम क्या हैं ?

वो हम से एकान्त में बतियाता था……..हँस हँसकर ………हमें छूते हुए …..आँखें मटकाते हुये…..बस इस तरह हमारी बुद्धि को हर ली उसनें ।

उद्धव ! हमारे पास बुद्धि नही है ………..हाँ हमारे पास हृदय है …..प्रेम से सिक्त हृदय ……….अपनें प्रियतम के लिये रोता हृदय …..अपनें प्यारे के लिये धड़कता हृदय ………..

उद्धव ! तुम्हे चाहिये ऐसा हृदय ?

श्रीराधा रानी के मुखारविन्द से ये सुनते ही ……….उद्धव का देह काँपनें लगा ………….प्रेम के लक्षण प्रकट होनें लगे उद्धव में ………नेत्रों से अश्रु बहनें लगे …….रोमान्च हो गया ……………..

जय जय श्रीराधे ! जय जय श्रीराधे ! जय जय श्रीराधे !

जोर से चिल्लाये उद्धव ।

पर श्रीराधा रानी को ऐसा लगा कि ये पुकार ….”श्रीराधे” की पुकार उद्धव नें नही लगाई है …….मथुरा में बैठे श्रीकृष्ण ही लगा रहे हैं ।

बस फिर तो जो प्रेम का उन्माद चला वृन्दावन में ! उफ़ !

श्रीराधारानी मथुरा की और देखती हैं ……………सभी गोपियाँ मथुरा की ओर देखते हुए पुकारनें लगीं ………

हा नाथ ! हा कृष्ण ! हा प्यारे ! हा जीवन धन ! हा प्राण !

ये कहते हुए सब गोपियां क्रन्दन करनें लगीं ………श्रीराधारानी – हे श्याम सुन्दर ! हे मम प्राण ! – कहते हुये देह सुध भूलनें लगीं ।

कृष्ण , श्याम, गोपाल, गोविन्द, …………बचाओ ! बचाओ !

हजारों गोपियों नें एक स्वर से पुकारना शुरू किया ।

तुम नें जल प्रलय से वृन्दावन को बचाया था गोवर्धन धारण करके ……..पर आज जो दशा , तुम्हारे वृन्दावन की हो गयी है.. …..इसके दोषी तुम ही हो …..तुमनें ही वृन्दावन को डुबोनें के लिए……..ये सब लीलायें की हैं ……..पर ऐसा मत करो ……..बचाओ ! इस वृन्दावन को ……..ये डूब रहा है विरह सागर में …….।

उद्धव को पहली बार बैचेनी होनें लगी……..वो तड़फनें लगे …….

इनसे बड़ा कौन ज्ञानी होगा ? ये अहीर की कन्याएं यही सबसे बड़ी ज्ञानी हैं ………..क्यों की इन्होनें समझ लिया …….सत्य मेरा प्रियतम ही है ………..बाकी सब मिथ्या है, झूठ है ।

उद्धव उन्माद की स्थिति में जानें लगे थे ।

मेरे स्वामी नें मुझे यहाँ ज्ञान देंनें के लिये नही भेजा था …..उन्होंने मुझे प्रेम की शिक्षा लेनें के लिये यहाँ भेजा था………..

मेरी ये गुरु हैं श्रीराधिका जी……..मुझे भी इनकी तरह तड़फ़ चाहिये …….बैचेनी चाहिये……..अपनें सनातन सखा श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण भी न रह सकूँ – ऐसी बैचेनी…….पर ये तो इन्हीं से मिलेगा……

इन्हीं के चरणों से ही प्राप्त होगा……………

इतना कहते हुए उद्धव श्रीराधारानी के चरणों में गिर गए ।

उनके ज्ञान का अहंकार मिट गया……..निरहंकारिता के कारण उद्धव सहज हो गए ……….श्रीराधा के चरणों में गिरकर वो महा ज्ञानी उद्धव यही प्रार्थना कर रहे थे कि – मुझे प्रेम की दीक्षा दीजिये ।

ज्ञान की चादर गुदड़ी बन गयी थी ………….ज्ञान की डुगडुगी थी ……प्रेम का ढोल बज रहा था ………..ज्ञान जगत के चार महावाक्य -अहं ब्रह्मास्मि, तत्वम् असि , प्रज्ञानं ब्रह्म, अयं आत्मा ब्रह्म …….

पर ये वेदान्त के महावाक्य……बृज रज में कहीं घुल मिल चुके थे ..

चरणों में गिरकर हिलकियों से रो रहे थे उद्धव ………उनका “विचार” गोपियों के “अनुभव” के आगे बह गया था ………..

हे वज्रनाभ ! जयति जयति जय प्रेम ………..

महर्षि शाण्डिल्य गदगद् भाव से इतना ही बोल सके ।

शेष चरित्र कल –

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