महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (011) : Niru Ashra

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महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (011)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

रास के हेतु, स्वरूप और काल

श्रीमद्भागवत से जब हम जाँचत हैं कि कितनी उम्र के साथ यह लीला हुई; तो सातवें बरस की उमर में गोवर्धन – धारण किया था। ‘यः सप्तहयनो बालः’- साफ-साफ लिखा है। और गोवर्धन धारण के पहले ही चीरहरण हो चुका था। गोवर्धन धारण का तो वर्णन चौबीसवें अध्याय में आया है और चीरहरण का वर्णन तो बाइसवें अध्याय में है। अच्छा! चीरहरण हो चुका था। रस की पुष्टि के लिए गोवर्धन-धारण है। अमावस्या के दिन इन्द्रयज्ञ के स्थान पर गोवर्धन की पूजा हुई और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन अन्नकूट हुआ, द्वितीया को इन्द्र को मालूम हुआ और तृतीया से सात दिन तक धुआँ धार वर्षा हुई। एक रात को सबलोग कालियदह पर सो गये, दावानल प्रकट होकर जहाँ जलाया गया।

एकादशी के दिन नन्दबाबाने व्रत किया, द्वादशी को श्रीकृष्ण वरुण लोक में गये, रोना पीटना होता रहा। इस तरह सातवें बरस की शरद ऋतु बीत गयी। आठवें वर्ष की जब शरद ऋतु आयी तब आश्विन मास में भगवान् ने रास-लीला की। श्रीजीव गोस्वामीजी ने, श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ने बहुत खोज करके कहा कि इस समय आठ बरस के थे कृष्ण और गोपियाँ। ये बालकवत् नृत्य करते हैं। इसमें कोई वासना का संबंध ही नहीं है। यह तो बालधर्म का पालन है।

दूसरा देखो- मनुष्य- धर्म का पालन, मनुष्य धर्म का पालन क्या है? ये महाराज, आदमी जो हैं ये अर्थ के दास हो गये दिन भर कमाओ पशु की तरह और शाम को चारा खाओ और सो जाओ। उसी बछिया के ताऊ जिन्दगी भर बने रहेंगे। ‘बछिया के ताऊ’ कई लोगों ने नहीं समझा होगा। बछिया माने गाय की बछिया – बछड़ी। उसका ताऊ कौन होगा? बैल ही तो होगा। जिन्दगी भर बछिया के ताऊ। हल में जोतते रहें, चरस में जोतते रहें, हेंगा खींचते रहें। बस पैसा कमाने में ही जिन्दगी भर लगे रहें और घर आयें तो कुछ खली-भूसा मिला सो पेट में डाला और सो गये।

यह कोई जिन्दगी है ! जैसे मनुष्य के जीवन में अर्थ-पुरुषार्थ है, धन कमाना और कर्म करना, वैसे ही सुख-शान्ति से रहना, आनन्द मनाना, यह भी मनुष्य का धर्म है। मनुष्य को काम-पुरुषार्थ से वंचित नहीं होना चाहि। वह गावे वह नाचे, वह हँसे, वह खेले, वह आनन्द मनावे। तो भगवान् को यह भी बताना था ग्वालों को, गोपियों को, मनुष्यों को। यह मनुष्य धर्म का पालन किया कि उसको प्रसन्न रहना चाहिए।*

अब देखो- रासलीला करके श्रीकृष्ण ने एक कूटनीति भी बरसती हैं। कंस को शंका थी कि हमको मरने वाला कहीं पैदा हो गया है। तो उसके ख्याल में तो यह था कि जो पैदा हो गया है वह कोई वीर पुरुष होगा, कोई बहादुर होगा, सो सामने आकर हमसे युद्ध करेगा और हमको मारेगा। पर श्रीकृष्ण तो इधर नचकैया बन गये। कहीं चीरहरण करें, कहीं माखन- चोरी करें, कहीं गोपियों कें साथ नाचें; तो उसको धोखा हो गया। यह कूटनीति बरत दी कि कंस को कत्तई पता न चले कि यह नचकैया ही हमको मारेगा। कंस के नाक के नीचे रहकर माखन- चोरी करते रहे, चीरहरण करते रहें, बाँसुरी बजाते रहे, रासलीला करते रहे। उसने सोचा कि यह नचनिया हमारे सामने आकर क्या खड़ा होगा। जब हम शुत्रु के बलको कम कूदते हैं तब धोखे में पड़ जाते हैं। यह रणनीति है अपने शरीर के रोग को कम समझना, इन्द्रियों के भोगाभ्यास को कम समझना और शत्रु को कमज़ोर समझना- ये तीनों बातें भूल हैं। तो कंस को ऐसे धोखे में डाला कि वह भूल गया।

अब देखो- श्रीकृष्ण ने देव- धर्म का पालन किया। यह रासलीला थी देवता- धर्म का पालन कैसे? गोपियों ने देवी की आराधना की। अब उनको देवी की आराधना से जो वर मिला, उस वर को पूर्ण करना यह भी तो देव- धर्म है न। जब उनको वरदान दे दिया कि- ‘मयेमा रंस्यथ क्षपा:’- तुम इन रात्रियों में मेरे साथ बिहार करना, तो देवता का दिया हुआ वरदान झूठा तो नहीं होना चाहिए न ! अतः देवधर्म का पालन किया। अच्छा! श्रीकृष्ण ने ज्ञानी-धर्म का पालन किया। ज्ञानी का क्या धर्म होता है? ज्ञानी का धर्म है, ज्ञानी की रहनी, स्वातन्त्र्य। भगवान् वेद-पशु नहीं हैं, वह धर्म पशु नहीं है। धर्मपशुत्व, वेदपशुत्व ईशपशुत्व, यह जो मनुष्यों में रहता है उससे वह मुकत है।– ‘रासपञ्चाध्यायी’ के त में यह बात आयी है :

यत्पादपंकजरागनिषेवतृप्ता:, योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धा: ।
स्वैरं चरन्ति मनयोऽपि न नह्यमानास्तस्येच्छायाऽऽत्तवपुष: कुत एव बन्ध: ।।

जिसका ज्ञान हो जाने पर महात्मा लोग निरंकुश हो जाते हैं, स्वतंत्र हो जाते हैं। वही परब्रह्म परमात्मा जब शरीर धारण करके आया है तो उसके लिए वेद का बन्धन, समाज का बन्धन कहाँ होगा?*

भगवान ने भगवद्धर्म का पालन किया। भगवद् धर्म क्या है? प्रेम के अधीन हो जाना। यह भगवद्धर्म है। प्रेमी के सामने मुक्त भगवान ही बद्ध हो जाता है। विरक्त भगवान भी रागी हो जाता है। पूर्ण भगवान भी नन्हा मुन्ना हो जाता है। अभोक्ता भगवान भी भोक्ता हो जाता है, अकर्ता भगवान भी कर्ता हो जाता है। भगवान उसको कहते हैं जो प्रेम परवश होवे। गोपियों के प्रेम के अधीन होकर उनके साथ रास करना यह भगवान का धर्म है। यदि भगवान डर जायें कि हमारी बदनामी होगी या सोंचे कि हम तो नित्य-तृप्त हैं, नित्यानन्द में मग्न हैं, हमको गोपियों के साथ नृत्य करने की क्या आवश्यकता; तो भगवान में असंगता तो रही, वैराग्य तो रहा लेकिन अभिमान भी हो गया। भगवान आनन्द-स्वरूप तो हैं परंतु उसका आस्वादन तभी होगा जब अपने बड़प्पन का अभिमान छोड़कर छोटे के साथ मिलेंगे। इसलिए रास के द्वारा भगवान प्रेमपरवश होते हैं, इस मर्यादा की स्थापना हुई।

अब देखो- दूसरी बातें, रस- मर्यादा का पालन किया भगवान ने। रस-मर्यादा क्या है? रस-मर्यादा यह है कि अपने हृदय में जो रस है उसको दूसरे के हृदय में स्थापित कर दिया जाए। यह रस की मर्यादा है। जैसे आपके घर में कभी मिठाई बनती हैं, बूँदी बनाते हैं, तो पहले फीकी बूँदी को घी में तलते हैं और जब चासनी में डाल देते हैं तब वह बूँदी भी रसीली बना दे, यह रस की मर्यादा है। कड़ुवे को मीठा बना दें। आज हमारे पास करैले का मुरब्बा भेजा है। तो रस की मर्यादा यह है कि वह कड़वे करेले को भी मीठा बना दे। आप कभी बनारस गये होंगे तो वहाँ बाँस का मुरब्बा बनता है और बाजार में बिकता है। तो रस की मर्यादा यह है कि बाँस जैसी सूखी नीरस लकड़ी को खाने लायक बना देता है। तो यह भगवान का रास क्या है? कि जो भगवद् रस है, भगवान का रस है, उसको गोपियों के हृदय में स्थापित करना, जनता के हृदय में स्थापित करना; उस रस का साधारणीकरण कर देना, कि जो इसको पढ़ेगा, सुनेगा, देखेगा उसका हृदय भी रसमय बन जाएगा। यह रस मर्यादा की पुष्टि हुई। रसमर्यादा की पुष्टि के लिए भगवान ने रास किया।

श्रीवल्लभाचार्य जी महाराज ने रास का प्रयोजन ही यही बताया है कि ब्रह्मानन्द भगवान में हमेशा रहता है क्योंकि स्वयं ब्रह्म है। पर जब की साधन में थक जाता है और उसको वे पुष्टि देना चाहते हैं तो भगवान के पास ब्रह्मानन्द तो स्वतः सिद्ध है तो स्वतः सिद्ध ब्रह्मानन्द से भी बड़ा जो भजनानन्द है, भक्ति आनन्द, प्रेम आनन्द, रसानन्द, उसको गोपियों के हृदय में स्थापित करने के लिए भगवान रासलीला कहते हैं।*

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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