!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
प्रेम नगर 26 – “ वेद या वेणु “
क्या चाहिये ……वेद या वेणु ?
वेद धर्म है …किन्तु वेणु प्रेम है । क्या चाहिये …धर्म या प्रेम ?
वेद के आधार पर धर्म चलता है …..धार्मिक बनता है मनुष्य । किन्तु वेणु के आधार पर प्रेमी बनता है मनुष्य । और सनातन प्रीतम की खोज में निकल जाता है ।
अच्छा सुनो ! वेद समझ में नही आती , किन्तु वेणु तो खूब समझ में आती है …है ना ?
वेद के लिए आपको ब्राह्मण बनकर जन्म लेना पड़ेगा, किन्तु वेणु को तो पशु पक्षी भी समझते हैं ।
आप स्त्री हैं या शूद्र हैं …तो आपका अधिकार नही है वेद में । फिर ये कहाँ जायें ? किन्तु क्या वेणु में ये झंझट है ? कि आप ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य हो तभी वेणु सुन सकते हो …अन्यथा नही , वेणु को तो शूद्र भी सुन सकता है ….अरे ! ये प्रेम की बाँसुरी ही ऐसी है …..कि सबको अपनी ओर खींच रही है । अद्भुत है ।
हे रसिकों ! सीधी बात ये है कि प्रेमनगरी में वेद का शासन नही है, वेणु का शासन है ।
यानि धर्म नही , यहाँ तो सर्वत्र प्रेम है । प्रेम का शासन है ।
वेण एव समभूदथवेणुर्यो बलाद्वदति धर्ममधर्मम् ।
व्रीडयेव विदितासदुदंत: स्वाभिधानमपिधातुमुदन्त: ।।
अर्थ – यह वेन राजा ही मानो वेणु बनकर आया है । और अब ज़बर्दस्ती अधर्म को धर्म बता रहा है ….इसने अपना रूप भी बदल लिया है ताकि कोई इसे पहचान न पाये । अपने नाम के आगे इसने उकार जोड़ लिया है ….ये “णत्व उत्व” की ओढ़नी ओढ़े वेन ही अधर्म का प्रचार कर रहा है । ये बात वृन्दावन में नयी नयी आयी सती गोपी दूसरी से कहती है …क्यों की ये वेणु उसके सतीत्व को मिटाने में लगा हुआ था ।
प्रेमनगर में वेद का शासन नही है …..यहाँ तो वेणु का शासन है । ब्रह्मा धर्म के प्रवर्तक हैं …..तो ये वेणु प्रेम की प्रवर्तक । ब्रह्मा बेचारे वेद के माध्यम से धर्म की स्थापना में जुटे रहते हैं ….लेकिन ये वेणु तो एक ही बार में जो बजती है …..उससे सारा धर्म उतार देती है । सतीयों का सतीत्व छीन लेती है …..लज्जाशील की लज्जा को हर लेती है ……तभी तो इस प्रेम नगर में हाहाकार मच गया ….कि ये कौन है वेणु ? कहाँ से आयी है ? और ये चाहती क्या है ?
एक परम सती गोपी थी …..उसका सब कुछ हर लिया था इस वेणु ने ….यहाँ तक कि अपने पति को ही भूल बैठी थी ये ….बस इसके मन में श्याम सुन्दर छा गये थे ….इसने बहुत कोशिश की ….बहुत मन को समझाया …..किन्तु वेणु तो अधर्म पर ही उतर आयी है …..तब वो सती गोपी बिलखते हुए कहती है ……..
अरी सखी ! क्या कहूँ ……मुझे तो लगता है ये वेणु नही वेन का ही अवतार है ।
पुराणों में एक राजा वेन हुआ जो बड़ा ही अधर्मी था …उसने अधर्म का ही प्रचार किया । उसने अपने राज्य में ये ढिंढोरा पिटवा दिया था …..कि कोई यज्ञ नही करेगा , कोई दान नही करेगा कोई भगवान नही है ।
अरी सखी ! ये वेणु भी वही राजा वेन है ….जो रूप बदलकर आया है ………
तभी दूसरी सखी हंसने लगी ….मेरी गुरु तो अनुसूइया माता थीं ….मैंने उन्हीं को गुरु बनाकर अपने पति की सेवा करनी आरम्भ की थी ….पति को ही भगवान , देवता मानती थी …किन्तु इस वेणु ने तो मेरे धर्म का सत्यानाश ही कर दिया है । अब क्या कहें ! देखो धर्म के प्रवर्तक हैं ब्रह्मा …किन्तु अधर्म की प्रवर्तक है ये वेणु । ये कहते हुए गोपी खूब हंसती है …..
अब किसकी बात मानी जाये ? ब्रह्मा के तो चार मुख है …..किन्तु इस वेणु के तो आठ मुख है …अब जो बात ज़्यादा मुख से कही गयी हो उसकी मान्यता ज़्यादा होती है ….इसलिये ।
तुरन्त एक सखी फिर बोल उठी …..तुम क्या मानोगी ? वेणु तुमसे मनवायेगी ….ये बड़ी जिद्दी है ….तुम कितनी भी धर्म को मानने वाली सही ….किन्तु ये तुमसे अधर्म करवा कर ही रहेगी ।
कैसे ?
तो यह सखी तुरन्त बोली …..तुम क्या पति की सेवा करती हो ? कहाँ ? अब तो लगता है …आहा ! श्याम सुन्दर ही हमारे पति हैं …..फिर मन में तर्क भी उठते हैं कि हमारे पतियों के भी पति तो श्याम सुन्दर ही हैं ना ! फिर श्यामसुन्दर ही हमारे पति कैसे नही हुए ?
तो पहली सखी खूब हंसीं और बोली …..ये सब बाँसुरी का ही कमाल है ….कि मन में धर्म की धारणा बदल रही है ……अब नही लगता कोई डर । ना नर्क का ना पाप का । अब तो लगता है …इन सांसारिक पतियों की सेवा से अगर स्वर्ग मिले तो वो स्वर्ग तो रहने ही दो …..हमें तो साँवरे के रंग में रंगना है …..उसको आलिंगन करके अगर पाप लगे ….तो पाप ही पाप करती रहेंगी …..आहा ! उसके आलिंगन का सुख ….सखी ! हमसे तो ना छोड़ा जाएगा ।
एक सखी बहुत देर से गम्भीर बैठी थी ….तभी बाँसुरी बज गयी ….और पूरे प्रेमनगर में उसकी ध्वनि फैल गयी ……सबमें चीख पुकार मच गयी है …..कोई कहती है ….आहा ! श्याम सुन्दर के अरुण अधर …..वैरन वेणु हर समय चिपकी रहती है …..इन अधरों का पूरा रस यही ले जाएगी ….अरी ! हमारे लिए भी थोड़ा छोड़ दे । कोई कह रही है …ये क्या बात हुई …सुख तो ये ले रही है …ये वेणु मज़े से श्यामसुन्दर के अधरों का तकिया बनाकर उसमें पौड़ी हुई है …..श्याम सुन्दर से अपनी सेवा करवा रही है ….इसके पाँव श्यामसुन्दर दबा रहे हैं अपनी उँगली से …पलकों से पंखा कर रहे हैं …..सौत बाँसुरी ।
एक अन्तिम गोपी जो अभी तक बोली नही थी ….वो भी बोल उठती है …..देखो तो …इतने सुख मिलने के बाद भी बाँसुरी न स्वयं सोती है न हमें सोने देती है ।
वंशी ! उलटि विरंचि कि सृष्टी।
जे जे धर्म-अधर्म चतुर्मुख , गाये रही न दृष्टी ।।
अष्टमुखनि तू उचरि विरोधनि , तौऊ लागति मृष्टी।
निज हित मुखर करत मनमानी , जड़ चेतन आकृष्टी ।।
सब कुछ इस वंशी ने ही किया है …..जो जो ब्रह्मा ने धर्म बताये …इस बैरिन बाँसुरी ने सबको पलट दिया है । ओह !
इसलिए सखी ! इस प्रेम नगर में अधर्म ही अब धर्म बन बैठा है ।
शेष अब कल –
