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August 29, 2025 11:32 pm

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🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 विरही- गोपी- उध्धव छे- संवाद-३०🦚🌹 भ्रमर -गीत🌹: Niru Ashra

🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 विरही- गोपी- उध्धव छे- संवाद-३०🦚🌹 भ्रमर -गीत🌹: Niru Ashra

🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 विरही- गोपी- उध्धव छे- संवाद-३०🦚
🌹 भ्रमर -गीत🌹

🪷 आवेशित अवस्था में उद्धवजी🪷

🪷 गोपियों के प्रेम हृदय की बातें और ज्ञान योग न समझाने की बातें सुन उद्धव आक्रोशित हो आवेश में कहते हैं कि तुम सब समझती क्यों नहीं हो ?
🪷 योग ज्ञान की अवज्ञा किस लिए किये जा रही हो।
🙏 उद्धव और आगे कुछ बोलने से पहले गोपीजन कहने लगे :

💥 उद्धव आप श्रीकृष्ण के सच्चे सखा हो। जब तो आप भी श्याम जैसे हठी, निर्मोही लगते हो। यदि हमसे अविवेक बात हो गई हो तो हम दंडवत कर क्षमा मांगती हैं।
उद्धव अब मन में विचारने लगे कि गोपीजनों में ये कैसा परिवर्तन?
उद्धव ! हम आपसे एक-दो बातें पूछना चाहती हैं। क्या आप जवाब देवेंगे ?
👉 १. क्या स्वप्न में मिली धन सम्पत्ति भोगी जा सकती है?
👉 २. कोई उड़ते पक्षी को डोरी से बाँध सकता है?
👉 ३. आकाश के तारे तोड़ घर में कोई रख सकता है?
४. घुएं से भरे कमरे में कोई बैठना चाहेगा या बैठ सकता है ?
५. कागज की नाव में बैठ क्या कोई पार उतर सकता है?
छोटे बालकों के खेल सा समझ उद्धव हर प्रश्नों का अंर्तमन से नकारात्मक जवाब समझते जा रहे और बहुत ही सहज खेल तर्क तरीके से गोपीजनोंने विचारने को मजबूर कर दिया और मन ही मन कहते हैं ऐसे प्रेमी जीवों को कैसे, क्या जवाब दूँ?
हैं!
👉 हे उद्धवजी! सुनिये

👉 १. दाख, खारक की मिठास छोड़ भंवरा पेड़ की कठोर डाल से कुतर-कुतर अपना घर बनाता है। प्रेम के कारण कमल पंखुड़ी में रस पीने कैद हो जाता है। पंतगें, कीट दीपक को मित्र समझ ज्योत आग में जल जाता है।
👉 २. जिसको सगुण मन भाता है, उसे निर्गुण नहीं पसंद होता। हम प्रेमासक्त गोपियों का आप यदि श्रीप्रभु के दर्शन करवा सकें तो आपका बहुत उपकार होगा। आपका जिंदगी भर उपकार नहीं भूलेंगी किन्तु फिर से उद्धव उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं।
उद्धव आपको निर्गुण मन भाता और हमें सगुण फिर ज्ञान द्वारा निर्गुण, निराकार, निरंजन को समझाने का कहते हैं। वैसे उसी समय उद्धव की बात काटते कहती हैं, ये तुम्हारा निर्गुण, निराकार, निरंजन क्या है?
और कहती:
निराकार मतलब जिसके हाथ- पैर, मुँह, कान, आँख नहीं होते तो हमारा प्रियतम तो साकार, प्रत्यक्ष अनुभवी है हम गोपियाँ। हमें लगता है आप और कोई बात कह रहे हो। 🪷 विरही गोपी-३१🪷🪷 क्रिष्णा 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷

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Author: admin

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