महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (021) : Niru Ashra

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महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (021)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

रास की दिव्यता का ध्यान

बोले- यों निकलती हैं कि श्यामसुन्दर की दृष्टि पड़ जाएगी तो वे खुश हो जाएंगे; और कहीं हमको मैली-कुचैली देखेंगे, हमारी साड़ी मैली देखेंगे, हमारे बाल बिखरे देखेंगे, हमारी आँख में आँसू देखेंगे, हमारे मुँह सूखे देखेंगे तो उनको बड़ा दुःख होगा। राम-राम, मैं उनको दुःख देने के लिए प्रेम थोड़े ही करती हूँ। मैं तो उनको सुख पहुँचाने के लिए प्रेम करती हूँ- ‘निजांगमपि या गोप्यो ममेति समुपासते’ गोपी कहती हैं- यह शरीर कृष्ण का है, यह शरीर कृष्ण के सुख के लिए है, कृष्ण की प्रसन्नता के लिए है। यह गोपी का प्रेम है।

श्रीराधारानी श्रीकृष्ण से कब रूठती हैं? मान का प्रसंग देखो- कितना बढ़िया है, वह कहती हैं कि हमको देखकर उनको जो सुख मिलता है- हमारा यह श्रृंगार, हमारा यह सौन्दर्य, हमारा यह माधुर्य, हमारा यह रूप, जिसको देख करेक उनको प्रसन्नता होती, आज उन्होंने यह माधुर्य, हमारा यह रूप, जिसको देख करके उनको प्रसन्नता होती, आज उन्होंने नहीं देखा- तो आज उनको दुःख हुआ होगा; आज मेरे देखे बिना उनको दुःख हुआ, इसलिए मैं दुःखी हूँ। यह प्रेम का स्वभाव है।

हमारे एक मित्र हैं; उनके घर में मैं अतिथि था। एक दिन उनकी पत्नी रूठ गयीं। तो आखिर मैंने पूछा उनकी लड़की से- आज माँ तुम्हारी कैसे रूठ गयी? क्या चाहिए उसको? बोली- वाह! हमारी माँ कुछ ऐसी है क्या कि अपने लिए रूठेगी! अपने लिए लेने को को रूठेंगी। माँ इसलिए रूठीं कि पिताजी आज लोगों से बात करते रह गये, दातून नहीं की, स्नान नहीं किया, चाय नहीं पी; तो उनको कहीं जुकाम न हो जाय, कहीं बुखार न आ जाय, कहीं तकलीफ न हो जाए, इसके लिए माँ रूठी है कि अब कल से ऐसा नहीं करना। अपने लिए हमारी माँ नहीं रूठती, पिताजी को सुख पहुँचाने के लिए हमारी माँ रूठती है। मान का भी एक रहस्य होता है। स्वार्थ-ग्रन्थि को सींचने के लिए मान होता है। श्रीकृष्ण के हृदय को विकसित करने के लिए मान होता है, यह गोपियों का जीवन है-

निजांगमपि या गोप्यो ममेति समुपासते,
ताभ्य: परं न मे किञ्चिन्निगुढप्रेमभाजनम् ।

श्रीकृष्ण कहते हैं- अरे अर्जुन! इसीलिए गोपियाँ हमारे निगूढ़ प्रेम की अधिकारिणी हैं, गुप्त प्रेम की अधिकारिणी हैं।*

जहाँ अपना स्वार्थ है, वहाँ अपनी तीन चीज देखना – 1. अपनी स्वार्थ- सत्ता में प्रियतम छूट गया। प्रियतम सत्य नहीं रहा, अहं सत्य हो गया। 2. यदि प्रियतम की बुद्धि अपनी बुद्दि नहीं तो उसको कर दिया जड़ और स्वयं ज्ञानी चैतन्य बन गये। और 3. यदि उसका सुख नहीं हमारा सुख, तो प्रियतम को दुःख कर दिया और स्वयं सुख बन गये। सच्चिदानन्द प्रियतम है, यह बात छूट गयी।

तो ‘ता: वीक्ष्य’ अब ऐश्वर्य माधुर्य की बात सुनाता हुँ। पहले ऐश्वर्य की बात करूँ। ईश्वर के लिए भोग संसार में कोई वस्तु हो सकती है? क्योकि वह तो देश- काल- वस्तु से अपरिच्छिन्न है। जो सब जगह हो, सब समय हो, सब में हो, वह ईश्वर। ईश्वर जो आनन्द का मालिक है, आनन्द रूप है, उसके लिए भोग्य क्या संसार में कुछ हो सकता है? वह क्या किसी के शरीर के भोग के बिना दुःखी हो जाएगा? वह क्या किसी के देखे बिना दुःखी हो जायेगा? उसके लिए कौन सी ऐसी गन्ध है जो आकर्षित कर सके, कौन सा ऐसा रस है जो आकर्षित कर ले? कौन सा- ऐसा रूप है जो अपनी ओर खींच ले? कौन सा स्पर्श है जो अपनी ओर खींच सके? कौन सी ऐसी मीठी आवाज है कि जिसके सुनने के लिए ईश्वर व्याकुल हो जाए? ईश्वर के अन्दर व्याकुलता उत्पन्न कर सके, ऐसी वस्तु सृष्टि में है कोई? यह ऐश्वर्य की बात है। कहा- हनीं, नहीं है। तब ईश्वर क्या करता है? फिर ईश्वर लोगों के प्रेम को कैसे स्वीकार करता है? वल्लभाचार्य जी महाराज ने स्थान स्थान पर इसका निरूपण किया है।

अब ‘ताः वीक्ष्य’ में उसको देखो- ‘ताः वीक्ष्य, रात्रीः वीक्ष्य, शदोत्फुल्लमल्लिका वीक्ष्य’। वीक्ष्य का एक विशेष अर्थ है- ‘विशेषण ईक्षित्वा’ विशेष रूप से देखकर। ईश्वर देखता है, ईश्वर की नजर जिसको जैसा बनाना चाहे उसको वैसा बना दे। ईश्वर ने कहा- मैं आनन्द की गठरी अपने शिर पर लिए बैठा हूँ, उसको उतारना चाहिए। उतारो, उतारकर क्या करोगे? कहा- आनन्द का जो सार है, आनन्द का जो परिपूर्णतम रूप है, उसको गोपियों में रखूँगा। आनन्द का जो परिपूर्णतर रूप है, वह रात्रि में रख दूँगा। आनन्द का जो परिपूर्णतर रूप है उसको शरदोत्फुल्लमल्लिका में रख दूँगा। वीक्ष्य का अर्थ है कि जैसा सच्चिदानन्द भगवान है पहले उसने रात को अपने हाथ से सँवारा। उसकी यह नीली साड़ी जो आसमान में है उसकी इस्तरी किया; गुड़मुड़ी साड़ी भगवान को पसन्द नहीं है। आकाश यह रात की नीली साड़ी है, इसमें ‘क्रीज’ कहीं नहीं है। अच्छा किसने सँवारा है? यह ईश्वर ने अपने हाथ से सँवारा है। ‘ता रात्रीः वीक्ष्य’- यही वीक्षण है। फिर बोले- इस नीली साड़ी में हीरे, मोती आकाश के तारे टाँक दिए।**

किसने? क्या रात्रि ने? बोले- नहीं, स्वयं ईश्वर ने ये हीरे-मोती-रूप आकाश के तारे अपने हाथ से साड़ी में है जड़ दिए और फिर उसको पहनाया। अच्छा, यह चाँदनी की शीतलता क्या रात के घर में थी? नहीं, भगवान ने स्वयं चाँदनी, उसकी शीतलता और सुगन्धित बहने वाली वायु बनायी। वीक्ष्य का अर्थ है- अपने भोग के योग्य उन्होंने रात्रि आदि को बनाया। माने उनमें अपने आनन्द का संचार किया।

स ऐक्षत एकोऽहं बहु स्याम प्रजायेय ।

भगवान ने कहा- मैं अकेला हूँ। कहा आप क्या चाहते हो?

स एकाकी नारमत ततो द्वितीयं असृजत पतिश्च पत्नी च भवताम् ।

भगवान गृहस्थ बन गये; अकेले उनको अच्छा नहीं लगा। ‘प्रजायेय’- अरे अब तो हमारे बच्चे-कच्चे होंगे। ‘प्रजायेय’ माने ‘अब मैं अनेक रूप में प्रकट होऊँगा।’ यह ईश्वर का संकल्प है। कृष्ण ने कैसे होरी मचायी-

एक ते होरी मचै नहि कबहूँ, या ते करौं बहुताई ।
यही मन में ठहराई, कृष्ण ने कैसी होरी मचाई ।।

तो वीक्ष्य का अर्थ क्या है? कि अपने बिहार के योग्य रात्रि माने काल की सृष्टि की। अपने बिहार के योग्य स्थान की रचना की। उन निषद् में ‘ऐक्षत’ माने सर्जन होता है, सृष्टि करना या बनाना। फिर उसके बाद गोपियों को बनाया। गोपियों में भगवान सांसारिक आनन्द का उपभोग नहीं करते, भवदीय आनन्द का उपभोग करते हैं। अपने हृदय का जो आनन्द है वह उनमें स्थापित किया और फिर स्वयं भोक्ता और भोग्य! वीक्ष्य माने विश्लेषण ‘ईक्षित्वा सृष्ट्वा इत्यर्थः।’ किसीमें सामर्थ्य नहीं जो भगवान्‌ को आकर्षित कर सके।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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